परिसीमन विवाद: तरक्की की सजा दक्षिण भारत को क्यों?
'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ' में परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंता और संसद में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी बनाए रखने पर चर्चा हुई जिसमें राज्यों ने प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ अपनी मौजूदा राजनीतिक आवाज और असर कम न होने देने की बात कही

कोच्चि में आयोजित 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ' में विपक्षी नेताओं ने कहा कि आने वाले परिसीमन की प्रक्रिया से दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक असर कम नहीं होना चाहिए क्योंकि इन राज्यों ने जनसंख्या पर नियंत्रण किया है और उत्तर भारत के मुकाबले बेहतर विकास किया है. वहीं दूसरी तरफ BJP और तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के प्रतिनिधियों ने दक्षिण के राज्यों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व बनाए रखने की बात कही.
29 सितंबर को 'द सदर्न चैलेंज: फेडरलिज्म, डीलिमिटेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर' सत्र के दौरान कांग्रेस की राज्यसभा सांसद जेबी माथेर ने अपनी बात रखी. उनका कहना था कि दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रित के उपाय किए और स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी तरक्की की इसलिए उन्हें इसकी 'सजा' नहीं मिलनी चाहिए.
उनका कहना था, “हम (दक्षिणी राज्यों) ने वही किया जो केंद्र ने हमसे कहा था. अब हमें उसका फायदा मिलना चाहिए. अपनी मर्जी से सीटें बढ़ाकर हमारी राजनीतिक आवाज को हमसे मत छीनिए."
इसके जवाब में BJP के लोकसभा सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार ने राय रखी कि अगर दक्षिणी राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ा दी जाएं तो लोकसभा में दक्षिण की हिस्सेदारी भी काफी हद तक सुरक्षित रहेगी और सांसदों की संख्या भी बढ़ जाएगी. उन्होंने बताया कि इससे कर्नाटक को 14 सीटें और मिलेंगी. चुनावी प्रक्रिया के साथ छेड़छाड़ के आरोपों पर वाडियार ज्यादा खुलकर बोले. इस पर दलील देते हुए उनका तर्क था, "जनता के सामने चुनावी सीमाओं में बदलाव जैसे बहाने पूरी तरह बेअसर साबित होते हैं" और इससे चुनावी नतीजों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता.
भारत राष्ट्र समिति (BRS) के पूर्व राज्यसभा सदस्य के.आर. सुरेश रेड्डी ने अपनी पार्टी का रुख साफ करते हुए कहा कि संसद में दक्षिण की मौजूदा हिस्सेदारी बनी रहनी चाहिए. रेड्डी ने जोर देकर कहा, "मौजूदा अनुपात तय कर दीजिए. आज जो व्यवस्था है, उसे वैसे ही रहने दिया जाए." साथ ही उनका यह भी मानना था कि जनता के बीच उनके प्रतिनिधियों की पहुंच और पकड़ मजबूत करने के लिए विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए.
TDP सांसद और संसदीय दल के नेता लावु श्री कृष्ण देवरायालु ने आर्थिक तरक्की को सीटें बांटने का आधार बनाने के विचार पर सवाल खड़े किए. उन्होंने समझाया कि अगर तेलंगाना में ऐसा किया गया तो इसका सीधा मतलब होगा कि इससे ज्यादातर सीटें आर्थिक रूप से मजबूत हैदराबाद के हिस्से में चली जाएंगी और ग्रामीण इलाकों का नुकसान होगा.
तमाम राजनीतिक मतभेदों के बाद भी, इस बहस ने दक्षिण में परिसीमन से जुड़े सबसे अहम मुद्दे को सामने ला दिया: संसद में दक्षिण के राजनीतिक प्रभाव और ताकत को घटाए बिना आखिर जनप्रतिनिधित्व कैसे बढ़ाया जाए.
सत्र की मुख्य बातें
जेबी माथेर:
- "दक्षिणी राज्यों को सिर्फ इसलिए सजा मिलने वाली है क्योंकि हमने उस दौर की सरकारी योजनाओं को पूरी तरह सही ढंग से लागू किया. अब इसके लिए हमें सजा नहीं दी जा सकती."
- "हम इस सरकार पर भरोसा कैसे कर सकते हैं? एक ऐसी सरकार जिसने हर संवैधानिक संस्था को अपनी कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया है."
- "दक्षिण भारत कोई खास रियायत नहीं मांग रहा है. हम सिर्फ अपने हक के मुताबिक बराबर राजनीतिक आवाज मांग रहे हैं."
यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार:
- “गेरिमैंडरिंग (चुनावी प्रक्रिया में छेड़छाड़) आदि सुविधाजनक बहाने हैं और यह बिल्कुल उसी पुरानी कहावत जैसा है- नाच न जाने आंगन टेढ़ा."
- "केंद्र और राज्य का रिश्ता एक आपसी बातचीत और तालमेल का है. ऐसा नहीं कि राज्य जाकर केवल अपनी मांगें थोप दे. यह निरंतर चलने वाली बातचीत है और हमें केंद्र के साथ यह संवाद जारी रखना होगा."
- "हमारा संघीय ढांचा जिसे सहकारी संघवाद कहते हैं, पूरी तरह मजबूत और जीवंत है और हम आगे भी इसे ऐसा ही बनाए रखेंगे."
लावु श्री कृष्ण देवरायालु:
- "हैदराबाद शहर में सीटें बढ़ेंगी और उसकी हिस्सेदारी ज्यादा हो जाएगी जबकि ग्रामीण इलाकों को नुकसान होगा. क्या आप ऐसा चाहते हैं?"
- "हमें इस सच को तोड़-मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए कि जब महिला आरक्षण बिल पास हुआ था तो उसमें साफ लिखा था कि परिसीमन के बाद ही यह आरक्षण लागू होगा. लोकसभा में सिर्फ दो सांसदों को छोड़कर बाकी सभी ने इसके पक्ष में वोट दिया था."
- "टीडीपी केंद्र के साथ किसी टकराव के पक्ष में नहीं है लेकिन साथ ही वह आंध्र प्रदेश के हितों की अनदेखी करने के हक में भी नहीं है."
के.आर. सुरेश रेड्डी:
- ''कथनी और नीयत में जमीन-आसमान का फर्क होता है. उन्होंने जो वादा किया था और जो बिल सदन में लाया गया, वे दोनों बिल्कुल अलग थे. यहीं पर भरोसे का सवाल खड़ा होता है और हम परिसीमन के शिकार हुए हैं.''
- "वोटर द्वारा अपना नेता चुने जाने की जगह नेता ही अपने वोटरों को चुन रहे थे."
- "विकेंद्रीकरण (शक्तियों के बंटवारे) में ही परिसीमन की असली आत्मा बसती है."