भारत में शिप बिल्डिंग इंडस्ट्री की एक नई शुरुआत ने जगाई बड़ी उम्मीदें
विदेशी कंपनियां भारत में आधुनिक टग जहाज बनवा रही हैं. ऐसे ऑर्डर से देश के शिपयार्ड को नई तकनीक और विदेशी बाजार से जुड़ने का मौका मिल रहा है

बंदरगाह पर तैनात एक टग जहाज (फोटो : AI)
भारत की जहाज निर्माण यानी शिप बिल्डिंग की महत्वाकांक्षा धीरे-धीरे आकार लेने लगी है. इसकी एक नई कड़ी कोच्चि में बन रहे छोटे लेकिन आधुनिक तकनीक से लैस जहाजों का बेड़ा है.
दुनिया की सबसे बड़ी टग संचालन कंपनियों में से एक स्विट्जर ने कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) में बैटरी से चलने वाले चार हार्बर टग का निर्माण शुरू कर दिया है. कंपनी के पास चार और टग का ऑर्डर देने का विकल्प है.
26 मीटर लंबे ट्रांसवर्स 2600E टग स्विट्जर के बेड़े के लिए बनाए जा रहे हैं. इससे इलेक्ट्रिक हार्बर जहाजों का एक अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर भारतीय शिपयार्ड को मिला है. यह ऐसे समय में हुआ है जब देश के अपने बंदरगाह भी पारंपरिक डीजल से चलने वाले जहाजों की जगह इलेक्ट्रिक टग का ऑर्डर देने लगे हैं.
CSL में 2 सितंबर को स्टील कटिंग के साथ निर्माण औपचारिक रूप से शुरू हुआ. पिछले दिसंबर में शिपबिल्डिंग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे. इन जहाजों में बैटरी-इलेक्ट्रिक प्रपल्शन सिस्टम होगा.
ग्रीन पावर से चार्ज किए जाने पर इन्हें बंदरगाह और टर्मिनल में जहाजों को खींचने के दौरान सीधे तौर पर शून्य उत्सर्जन के साथ चलाने के लिए डिजाइन किया गया है.
स्विट्जर में एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका की प्रबंध निदेशक डेनिज किर्दार ट्रू ने इंडिया टुडे से कहा, "CSL को चुनने से पहले हमने दुनियाभर के शिपयार्ड का मूल्यांकन किया था. कोच्चि में अब चार पूरी तरह इलेक्ट्रिक ट्रांसवर्स 2600E टग का निर्माण शुरू हो रहा है. ये दुनिया में कहीं भी बनाए जा रहे सबसे आधुनिक ग्रीन टग में शामिल हैं. और इन्हें बनाने की क्षमता भारत में ही बनी रहेगी."
यह बात उस देश के लिए महत्वपूर्ण है, जो 2047 तक दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माण देशों में शामिल होना चाहता है. फिलहाल भारत का इस उद्योग में हिस्सा बेहद छोटा है और इसका दबदबा पूर्वी एशिया के देशों का है.
2024 में चीन, दक्षिण कोरिया और जापान ने मिलकर सकल टन भार के आधार पर दुनिया के करीब 95 फीसदी जहाजों का निर्माण किया. अकेले चीन की हिस्सेदारी 54.6 फीसदी थी. इसके बाद दक्षिण कोरिया 28 फीसदी और जापान 12.6 फीसदी पर थे. भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.06 फीसदी थी.
यह अंतर बहुत बड़ा है. यही वजह है कि भारत का जहाज निर्माण बढ़ाने का प्रयास अब उन खास क्षेत्रों पर ज्यादा केंद्रित है जहां देश के शिपयार्ड तकनीक हासिल कर सकते हैं, सप्लायर तैयार कर सकते हैं और लगातार ऑर्डर हासिल कर सकते हैं. ग्रीन हार्बर जहाज ऐसा ही एक क्षेत्र बन सकते हैं.
घरेलू बाजार में इसकी मांग केंद्र सरकार के ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम (GTTP) से पैदा हो रही है. इसका लक्ष्य बड़े बंदरगाहों पर पारंपरिक डीजल से चलने वाले हार्बर टग की जगह धीरे-धीरे ज्यादा पर्यावरण अनुकूल विकल्प लाना है.
टग बंदरगाह के भीतर सबसे कम दिखाई देने वाले लेकिन सबसे महत्वपूर्ण जहाजों में शामिल होते हैं. ये आकार में छोटे लेकिन बेहद ताकतवर होते हैं. बंदरगाह में बड़े जहाजों के आने और जाने के दौरान ये उन्हें धक्का देते हैं, खींचते हैं और सही जगह पर लाते हैं.
इनका संचालन क्षेत्र भी सीमित होता है इसलिए हार्बर संचालन को इलेक्ट्रिक बनाने के लिए यह स्वाभाविक विकल्प है.
ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम को औपचारिक रूप से 2024 में शुरू किया गया था. इसका पहला चरण 2027 तक चलेगा. सरकार का लक्ष्य 2030 तक 50 ग्रीन टग को बेड़े में शामिल करना है. तब तक बड़े बंदरगाहों के कम से कम 50 फीसदी टग बेड़े को ग्रीन एनर्जी से चलाने का लक्ष्य है.
अब इस नीति के तहत ऑर्डर भी मिलने लगे हैं. दीनदयाल बंदरगाह (कांडला, गुजरात), जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (नवी मुंबई), विशाखापत्तनम बंदरगाह और वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह (तूतीकोरिन, तमिलनाडु) ने इलेक्ट्रिक टग के लिए काम के ऑर्डर दिए हैं.
भारतीय जहाज निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कार्यक्रम के तहत खरीदे जाने वाले जहाजों का निर्माण देश के शिपयार्ड में ही किया जाना है.
दुनिया की सबसे बड़ी टग संचालन कंपनियों में से एक डेनमार्क की स्विट्जर का ऑर्डर इस उभरते बाजार के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन इसमें एक अहम अंतर है. ये जहाज भारत में एक अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटर के लिए बनाए जा रहे हैं.
इस जहाज का डिजाइन पहले से ही व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल हो रहा है. स्विट्जर के मुख्य परिचालन अधिकारी कास्पर कार्लसन ने कहा कि ट्रांसवर्स श्रेणी के जहाज अब तक 3,000 से ज्यादा व्यावसायिक टोइंग ऑपरेशन पूरे कर चुके हैं. दुनियाभर में 18 और जहाज निर्माणाधीन हैं.
कार्लसन बताते हैं, "ट्रांसवर्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि हमारे ग्राहकों के संचालन में आने वाली सीमाएं दूर हों. इससे जहाजों की आवाजाही तेज और ज्यादा अनुमानित होती है. इससे बर्थ की उत्पादकता और जहाजों के आने-जाने में लगने वाला समय बेहतर होता है."
इसकी अहमियत सिर्फ इस बात में नहीं है कि टग इलेक्ट्रिक है. हार्बर टग को कम समय के लिए बहुत ज्यादा ताकत देनी होती है. उन्हें सीमित जगह वाले पानी में काम करना पड़ता है और जब भी किसी जहाज को मदद की जरूरत हो, तब उन्हें उपलब्ध रहना होता है.
स्विट्जर के मुताबिक, ट्रांसवर्स डिजाइन में दोनों सिरों वाला ढांचा और सभी दिशाओं में थ्रस्ट देने की क्षमता है. इससे पारंपरिक व्यवस्था की तुलना में इसका संचालन क्षेत्र 50 फीसदी तक ज्यादा हो जाता है.
स्विट्जर भारत में अपने शिपबिल्डिंग कारोबार का दायरा भी बढ़ा रही है. CSL में इलेक्ट्रिक जहाजों के अलावा, कंपनी ने गुजरात की स्वान डिफेंस एंड हेवी इंडस्ट्रीज को 32 मीटर लंबे चार ट्रांसवर्स 3200 टग बनाने का ठेका दिया है.
इनकी डिलीवरी 2028 की पहली तिमाही से शुरू होने वाली है. इन जहाजों को बायोफ्यूल, आईएमओ टियर III (NOx उत्सर्जन का सबसे सख्त मानक) और फायरफाइटिंग क्लास 1 के लिए तैयार किया गया है.
CSL के लिए भी यह ऑर्डर ऐसे जहाजों की श्रेणी में विशेषज्ञता हासिल करने का मौका है, जिनकी भारत को घरेलू स्तर पर आगे चलकर ज्यादा जरूरत होगी. स्टील कटिंग समारोह में CSL के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक जोस वी.जे. ने कहा, "इस तरह CSL इस क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा."
हालांकि यह बदलाव कितनी तेजी से होगा, इसकी व्यावहारिक सीमाएं भी हैं. इलेक्ट्रिक टग के लिए जहाज में सिर्फ बैटरी होना पर्याप्त नहीं है. बंदरगाहों पर चार्जिंग सुविधाओं और पर्याप्त बिजली क्षमता की जरूरत होगी.
वहीं, चार्जिंग की व्यवस्था ऐसे जहाजों के संचालन कार्यक्रम के हिसाब से करनी होगी जिन्हें कम समय के नोटिस पर भी काम के लिए बुलाया जा सकता है.
इसकी अर्थव्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी. स्विट्जर के CSL के साथ हुए ठेके की कीमत का खुलासा नहीं किया गया है. कंपनी का कहना है कि लागत जहाज की बनावट, उपकरण, वर्गीकरण और डिलीवरी के समय पर निर्भर करती है.
फिलहाल चीन, दक्षिण कोरिया और जापान के विशाल उत्पादन के मुकाबले इसका पैमाना छोटा है. लेकिन इस खास क्षेत्र में भारत के पास अब वह चीज है जो पहले नहीं थी: ग्रीन टग की घरेलू मांग, उन्हें बनाने वाले भारतीय शिपयार्ड और यहां ऑर्डर देने वाला एक अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटर.