निजता की रक्षा करने वाला कानून पत्रकारिता के लिए कैसे बना खतरा?
पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से नए निजता कानून पर सवाल उठ रहे हैं. मीडिया समूहों को आशंका है कि इसका इस्तेमाल खबरें हटवाने और गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर करने के लिए हो सकता है

DNPA मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी
6 अक्टूबर को डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और इसके तहत 14 नवंबर, 2025 को अधिसूचित नियमों के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. DNPA भारत के 21 बड़े डिजिटल समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करता है.
इस गठबंधन में मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह के स्वामित्व वाला नेटवर्क18, गौतम अदाणी का एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट, द हिंदू, जी मीडिया, एबीपी, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, अमर उजाला, ईनाडु टेलीविजन और इंडिया टुडे समूह शामिल हैं. इनकी याचिका 698 पन्नों की है.
अलग-अलग संपादकीय विचारों और कारोबारी संबंधों वाले मीडिया समूहों का एक साथ आना अपने आप में अहम है. इनमें ऐसे कारोबारी भी शामिल हैं, जिन्हें व्यापक रूप से सरकार के करीबी के रूप में देखा जाता है. इन सभी को एक ऐसे नियामक ढांचे की आशंका एकजुट कर रही है जो पत्रकारिता के काम करने के तरीके को बुनियादी रूप से बदल सकता है.
27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. हालांकि सरकार का पक्ष सुने बिना विवादित प्रावधानों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. अगली सुनवाई 17 नवंबर को होनी है.
विवादित प्रावधानों में से ज्यादातर 13 मई, 2027 से लागू होंगे. नियमों की अधिसूचना के 18 महीने बाद इनका अमल शुरू होगा. न्यूज पब्लिशर चाहते हैं कि इससे पहले इनकी संवैधानिक वैधता से जुड़े सवालों का निपटारा हो जाए.
बड़े मीडिया समूहों का भरोसा भी शायद अब इस बात से उठ गया है कि मंत्रालय का कोई आश्वासन कानून की जगह ले सकता है. यह विवाद एक संवैधानिक दुविधा खड़ी करता है. क्या लोगों की निजता की रक्षा के लिए बनाया गया कानून ताकतवर लोगों को जनता की जायज पड़ताल से बचाने का जरिया बन सकता है?
कानून और उसकी एक बड़ी कमी
भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम एक जायज चिंता से पैदा हुआ. लोग अपनी जिंदगी का ज्यादा हिस्सा ऑनलाइन बिता रहे हैं. ऐसे में प्रौद्योगिकी कंपनियां, वित्तीय संस्थान, कारोबारी मंच और सरकारी एजेंसियां बड़ी मात्रा में निजी जानकारी जुटाती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के ऐतिहासिक के.एस. पुट्टस्वामी फैसले में निजता को मौलिक अधिकार माना था. 2023 का कानून डिजिटल अर्थव्यवस्था में इस अधिकार को व्यावहारिक सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था.
इसका मुख्य सिद्धांत सीधा है. सोशल मीडिया मंचों से लेकर ई-कॉमर्स ऐप तक, पहचान से जुड़ी निजी जानकारी जुटाने या उसका इस्तेमाल करने वाले संगठनों को आम तौर पर व्यक्ति की सूचित सहमति लेनी होगी. उन्हें बताना होगा कि डेटा का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है. डेटा को सुरक्षा में सेंध से बचाना होगा और लोगों को अपनी जानकारी से जुड़े कुछ अधिकार इस्तेमाल करने देने होंगे.
कानून ऐसे संगठन को डेटा न्यासी कहता है. इन अधिकारों में किसी भी समय सहमति वापस लेना और निजी डेटा में सुधार या उसे मिटाने की मांग करना शामिल है. कानून कुछ तय वैध उद्देश्यों के लिए बिना सहमति डेटा के इस्तेमाल की अनुमति भी देता है.
ये जिम्मेदारियां केवल गूगल और मेटा जैसी बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों तक सीमित नहीं हैं. ये किसी भी ऐसे संगठन पर लागू हो सकती हैं जो डिजिटल निजी डेटा का इस्तेमाल करता है. इसमें वह जानकारी भी शामिल है जिसे पहले कागज पर जुटाया गया हो और बाद में डिजिटल रूप दिया गया हो. इस वजह से न्यूज पब्लिशर भी कानून के दायरे में आ सकते हैं.
समस्या उन चीजों में है, जिन्हें कानून में शामिल नहीं किया गया. धारा 17 में कई तरह की छूट दी गई हैं. इनमें कुछ सरकारी एजेंसियां, कानूनी कार्यवाही, अपराधों की जांच और तय शर्तों के तहत शोध,आर्काइव तथा सांख्यिकीय गतिविधियां शामिल हैं.
सरकार संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे आधारों पर अपनी एजेंसियों को छूट दे सकती है. लेकिन जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता को स्पष्ट रूप से छूट नहीं दी गई है. अगस्त में सरकार को लिखे एक पत्र में, जिसे याचिका के साथ संलग्न किया गया है, DNPA ने शिकायत की कि सरकार ने अपने लिए व्यापक छूट रखी है जबकि प्रेस को कोई छूट नहीं मिली.
भारत में डेटा संरक्षण कानून के पहले के हर मसौदे में पत्रकारिता को संरक्षण दिया गया था. न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति ने 2018 में जो विधेयक तैयार किया था, उसमें पत्रकारिता के उद्देश्य से डेटा के इस्तेमाल को छूट दी गई थी.
2019 और 2021 के व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयकों में भी यह छूट बरकरार रही. 2022 के मसौदे में इसे हटा दिया गया. इसके बाद 2023 में लोकसभा से एक घंटे से भी कम समय में पारित कानून में इसे फिर शामिल नहीं किया गया.
DNPA का कहना है कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर ने अपने निजता कानूनों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का प्रावधान किया है. भारत में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. DNPA की ओर से अदालत में दलील दे रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि किसी ने यह नहीं बताया कि ऐसा क्यों किया गया.
यह अंतर अहम है क्योंकि पत्रकारिता सामान्य रूप से डेटा के इस्तेमाल जैसा काम नहीं है. कोई बैंक अपने ग्राहक को सेवा देने के लिए उसकी जानकारी जुटाता है. लेकिन पत्रकार किसी जानकारी को इसलिए जुटा सकता है क्योंकि उससे जुड़ा व्यक्ति नहीं चाहता कि जनता उसके बारे में जाने. पत्रकारिता को छूट नहीं मिलने पर किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाने वाला रिपोर्टर भी किसी ऐप की तरह निजी डेटा का इस्तेमाल करने वाला माना जा सकता है.
सहमति के जरिए जांच रोकने का खतरा
एक ऐसे पत्रकार की कल्पना कीजिए जो इन आरोपों की जांच कर रहा है कि किसी मंत्री ने अघोषित वित्तीय लेन-देन के जरिए संपत्तियां हासिल कीं. इस जांच के लिए निजी रिकॉर्ड खंगालने, लेन-देन का पता लगाने और इसमें शामिल लोगों की पहचान करने की जरूरत पड़ सकती है.
धारा 4 से 6 तक निजी डेटा के इस्तेमाल के लिए सहमति को मुख्य आधार बनाया गया है. हालांकि, कुछ तय अपवाद भी हैं. कोई शॉपिंग प्लेटफॉर्म यूजर से अकाउंट बनाते समय सहमति मांग सकता है. लेकिन किसी जांच में उसके निशाने पर मौजूद व्यक्ति से अनुमति नहीं मांगी जा सकती.
DNPA का तर्क है कि पत्रकारिता के लिए अलग से छूट नहीं होने पर रिपोर्टर को जांच के दायरे में आए व्यक्ति को इसकी सूचना देनी पड़ सकती है और संबंधित जानकारी के इस्तेमाल के लिए उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है. इससे जांच का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा. पहले से सूचना मिलने पर संबंधित व्यक्ति सबूत नष्ट कर सकता है गवाहों को प्रभावित कर सकता है या आगे की जांच में बाधा डाल सकता है.
27 अक्टूबर की सुनवाई में दीवान ने पब्लिशरों का पक्ष महज 11 शब्दों में रखा. उन्होंने पीठ से कहा, "अगर हम आपके बारे में रिपोर्ट करते हैं तो हमें आपकी अनुमति लेनी होगी." उन्होंने इसके नतीजों को "पूर्व-सेंसरशिप की पूरी व्यवस्था" बताया. उनका तर्क था कि अगर रिपोर्टिंग इस बात पर निर्भर करेगी कि जिन लोगों की पड़ताल की जा रही है वे इसकी अनुमति दें तो पत्रकारिता काम नहीं कर सकती.
हालांकि इस मामले में कुछ सीमाएं भी हैं. धारा 3 में उस जानकारी को बाहर रखा गया है जिसे संबंधित व्यक्ति ने पहले ही सार्वजनिक कर दिया हो या जिसे सार्वजनिक करना किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कानूनी रूप से जरूरी हो. कानून के अन्य अपवाद भी लागू हो सकते हैं. इसलिए ऐसा नहीं है कि अखबार में छपने वाले हर तथ्य के लिए अपने आप सहमति लेना जरूरी हो.
लेकिन यह छूट किसी राजनेता की अघोषित संपत्ति, किसी कंपनी के छिपे हुए भुगतान या किसी ठेकेदार के किसी अधिकारी से संबंधों पर लागू नहीं होती. खोजी पत्रकारिता का मकसद ही ऐसी जानकारियों का पता लगाना होता है.
अप्रकाशित रिकॉर्ड, लीक हुए दस्तावेजों और जांच के दौरान हासिल की गई निजी जानकारी के मामले में कानून का रुख अब भी स्पष्ट नहीं है. जब इस अनिश्चितता के साथ भारी जुर्माने का खतरा भी जुड़ा हो तो यह अपने आप में सेंसरशिप का जरिया बन सकता है.
दूसरी चिंता डेटा मिटाने के अधिकार को लेकर है. धारा 12 के तहत लोग अपनी सहमति के आधार पर इस्तेमाल किए जा रहे निजी डेटा को मिटाने की मांग कर सकते हैं. हालांकि इस पर कानूनी और अन्य वैधानिक सीमाएं लागू होती हैं.
धारा 8 में भी डेटा को सुरक्षित रखने और मिटाने से जुड़ी जिम्मेदारियां तय की गई हैं. संबंधित व्यक्ति किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेकर डेटा मिटाने की मांग कर सकता है. कानून में ऐसी मांग के खिलाफ जनहित को आधार बनाकर फैसला करने की कोई स्पष्ट कसौटी नहीं है.
सामान्य कारोबारी डेटा के मामले में ऐसी सुरक्षा उचित है. किसी कंपनी को बिना कानूनी आधार के अपने पूर्व ग्राहक की जानकारी अनिश्चितकाल तक नहीं रखनी चाहिए. लेकिन अखबारों के आर्काइव अलग होते हैं. भ्रष्टाचार, आपराधिक गतिविधियों या सार्वजनिक पद के दुरुपयोग पर छपी रिपोर्ट ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा होती है. संबंधित व्यक्ति बाद में उसे हटाना चाहे तो इससे उस रिपोर्ट का समाचार महत्व खत्म नहीं हो जाता.
प्रकाशकों को आशंका है कि लोग डेटा मिटाने की मांग का इस्तेमाल समाचार संगठनों पर वैध रिपोर्टों को हटाने या उनमें बड़े पैमाने पर बदलाव करने का दबाव बनाने के लिए कर सकते हैं. इसमें आर्काइव में मौजूद रिपोर्टें भी शामिल हैं.
कानून किसी भी प्रकाशित खबर को मिटाने का बिना शर्त अधिकार नहीं देता. लेकिन जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सुरक्षा नहीं होने से वैध डेटा संरक्षण और सच्ची खबर को दबाने के बीच की सीमा मुकदमों तथा नियामक दबाव के प्रति कमजोर बनी रहती है.
गोपनीय सूत्रों पर निगरानी का खतरा
सबसे गंभीर चिंता सरकार के जानकारी मांगने के अधिकार को लेकर है. धारा 36 के तहत केंद्र सरकार अधिनियम के उद्देश्यों के लिए डेटा संरक्षण बोर्ड, डेटा न्यासियों या मध्यस्थों से जानकारी मांग सकती है. नियम 23 और नियमों की सातवीं अनुसूची में बताया गया है कि किन उद्देश्यों के लिए ऐसी जानकारी मांगी जा सकती है. इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सरकार के कुछ वैध काम और नियामकीय जांच शामिल हैं.
याचिका में कहा गया है कि इस शक्ति के इस्तेमाल पर न तो न्यायिक निगरानी का प्रावधान है, न जरूरत और आनुपातिकता की कसौटी और न ही उस व्यक्ति को सूचना देने की बाध्यता है, जिसका डेटा लिया जा रहा है. प्रकाशकों का तर्क है कि किसी न्यूजरूम को निशाना बनाए जाने पर इसके तहत रिपोर्टर के नोट्स, संपर्कों और उस बातचीत की जानकारी मांगी जा सकती है, जिनसे गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है.
नियम 23 सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के कुछ तय आधारों पर ऐसी जानकारी मांगने के अनुरोध का खुलासा करने से रोकने की अनुमति भी देता है. मान लीजिए कि कोई अधिकारी सरकारी ठेकों में गड़बड़ियों का खुलासा करने वाले दस्तावेज किसी रिपोर्टर को देता है. अगर अधिकारी उसकी पहचान उजागर करने वाले संवादों तक पहुंच जाते हैं तो पत्रकार से सीधे सूत्र का नाम पूछे बिना भी उस व्यक्ति की पहचान सामने आ सकती है.
कानून न्यूजरूम के रिकॉर्ड को अंधाधुंध जब्त करने की स्पष्ट अनुमति नहीं देता. जानकारी मांगने की शक्ति कानून में तय उद्देश्यों से जुड़ी है. फिर भी हर मांग के लिए पहले से न्यायिक मंजूरी लेना जरूरी नहीं है. न ही गोपनीय पत्रकारिता संबंधी बातचीत को स्पष्ट सुरक्षा दी गई है.
इस अधिनियम के तहत भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड बनाया गया है. इसे शिकायतें सुनने, उल्लंघनों की जांच करने और भारी आर्थिक जुर्माना लगाने का अधिकार है. सुरक्षा के उचित उपाय नहीं करने पर एक मामले में अधिकतम 250 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है. दूसरे उल्लंघनों के लिए अलग-अलग सीमाएं तय हैं. इनमें कुछ उल्लंघनों पर 200 करोड़ रुपए तक और अन्य उल्लंघनों पर 50 करोड़ रुपए तक का जुर्माना शामिल है.
तकनीकी क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए यह रकम बहुत ज्यादा नहीं है. लेकिन स्वतंत्र और क्षेत्रीय समाचार प्रकाशकों के लिए भारी जुर्माने का खतरा भी पत्रकारिता पर दबाव डाल सकता है.
धारा 37 से एक और चिंता पैदा होती है. अगर बोर्ड किसी संस्था पर कम से कम दो बार आर्थिक जुर्माना लगा चुका हो और सामग्री को ब्लॉक करने की सिफारिश करे तो सरकार संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर देने और कारण दर्ज करने के बाद आम जनता के हित में ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने का आदेश दे सकती है.
इस प्रावधान में कुछ प्रक्रियागत शर्तें हैं. लेकिन प्रकाशक सवाल उठाते हैं कि क्या "आम जनता के हित" जैसा व्यापक शब्द अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता की पर्याप्त रक्षा करता है. उनकी नजर में यह निजता के नाम पर सामग्री हटाने की शक्ति है.
सरकार की ओर से नियुक्त डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वतंत्रता को लेकर भी चिंता है. प्रेस पर दूरगामी असर डालने वाली शक्तियों का इस्तेमाल करने वाला नियामक उस कार्यपालिका से स्वतंत्र होना चाहिए जिसके कामकाज की पड़ताल करना प्रेस की जिम्मेदारी है.
सरकार का क्या कहना है
केंद्र सरकार का कहना है कि निजता और पारदर्शिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. आलोचकों को उसका जवाब दो रूपों में सामने आया है: इन चिंताओं को खारिज किया और मौखिक आश्वासन दिया.
अगस्त 2023 में केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आलोचना को अनुचित बताया था. उन्होंने कहा कि सरकार को दी गई छूट राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी संबंधों और सार्वजनिक व्यवस्था तक सीमित है जबकि यूरोप के सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) में 16 तरह की छूट हैं. धारा 37 के बारे में उन्होंने कहा था कि इसका मकसद उन प्लेटफॉर्मों पर कार्रवाई करना है जो जुर्माना भरने के बाद भी निजता का उल्लंघन करते रहते हैं.
सरकार ने डेटा संरक्षण के व्यापक ढांचे का बचाव करते हुए यह भी कहा है कि इसे व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया. उसके मुताबिक, कानून और नियम व्यक्तिगत अधिकारों को मजबूत करते हैं, संगठनों की जवाबदेही तय करते हैं और एक संतुलित नियामक व्यवस्था बनाते हैं.
मौखिक आश्वासन 28 जुलाई, 2025 को दिया गया था. उस दिन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव एस. कृष्णन ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स, डिजिपब और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी.
अधिकारियों ने पत्रकारों से कहा कि इस कानून के तहत पत्रकार डेटा न्यासी नहीं हैं. उन्होंने यह भी कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(2) अब भी व्यापक जनहित में जानकारी देने की अनुमति देती है. मंत्रालय ने अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (FAQ) का एक सेट जारी करने का वादा किया.
पत्रकार संगठनों ने 23 अगस्त, 2025 को सरकार को 35 सवाल भेजे. कुछ ही हफ्तों में सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट कर दिया कि कानून में बदलाव नहीं किया जाएगा. नवंबर 2025 में नियम अधिसूचित किए गए तो एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि मौखिक आश्वासन कभी भी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं बने.
इस साल DNPA के साथ भी यही हुआ. उसके प्रतिनिधियों ने अगस्त की शुरुआत में लिखित ज्ञापन देने के बाद 25 अगस्त को सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की. प्रकाशकों की अदालत में दाखिल याचिका के मुताबिक, अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि प्रेस की स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी.
लेकिन इन आश्वासनों को न तो कानून में स्पष्ट छूट के रूप में शामिल किया गया, न ही कोई बाध्यकारी स्पष्टीकरण जारी हुआ. 27 अक्टूबर की सुनवाई तक केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में DNPA की याचिका पर अपना विस्तृत पक्ष नहीं रखा था.
आगे का रास्ता
प्रकाशकों की चिंताओं की पड़ताल होनी चाहिए. लेकिन इसे इस दलील के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि पत्रकारों को निजी जानकारी तक बिना किसी रोक-टोक के पहुंचने का अधिकार मिलना चाहिए. यौन हिंसा के पीड़ितों, बच्चों, आम नागरिकों और सनसनीखेज या गलत खबरों का शिकार होने वाले लोगों को मजबूत सुरक्षा की जरूरत है.
भारतीय टेलीविजन पर अदालतों में सुनवाई पूरी होने से पहले ही लोगों को दोषी ठहराया जा चुका है. ऐसे लोगों की निजी जिंदगी भी उजागर की गई है जिनकी कोई सार्वजनिक भूमिका नहीं थी. निजता एक मौलिक अधिकार है. जनहित का दावा करने भर से यह अधिकार खत्म नहीं हो जाता.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इसी दुविधा को पहचाना. उन्होंने याचिकाकर्ताओं को याद दिलाया कि निर्दोष नागरिकों के भी अधिकार हैं और अदालत को दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना होगा. उन्होंने प्रकाशकों से अपने क्षेत्र के जानकारों के रूप में दुरुपयोग रोकने के उपाय सुझाने को कहा. यह एक उचित मांग है.
इससे एक व्यावहारिक समाधान का रास्ता निकलता है. भारत को जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और सावधानी से परिभाषित छूट की जरूरत है. साथ ही, अनावश्यक रूप से किसी की निजी जिंदगी में दखल देने और अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने के उपाय भी होने चाहिए.
स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा के बिना गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने से बचाने के लिए सुरक्षा जरूरी है. नियामकीय जुर्माने भी उल्लंघन की गंभीरता के अनुपात में होने चाहिए. मुख्य अंतर किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी की रक्षा करने और ऐसे कामकाज को छिपाने के बीच है जिसका जनता के हितों पर जायज असर पड़ता है.
किसी नागरिक को अपनी निजी जानकारी का दुरुपयोग करने वाली कंपनी को रोक पाने का अधिकार होना चाहिए. लेकिन किसी मंत्री को भ्रष्टाचार का खुलासा करने से पत्रकार को रोकने का अधिकार नहीं होना चाहिए. कानून को इस अंतर को पहचानना होगा.