भारत को AI में 10 गुना ज्यादा निवेश की जरूरत क्यों है?
नैसकॉम चेयरमैन श्रीकांत वेलामाकन्नी का कहना है कि महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे की सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए भारत को स्वदेशी AI क्षमता विकसित करने के साथ निवेश भी 10 गुना बढ़ाना होगा

हाल ही में एंथ्रोपिक (Anthropic) के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम माइथोस (Mythos) ने दुनिया भर की सरकारों, कंपनियों और तकनीकी जगत में चिंता पैदा कर दी. भारत में भी यह बहस अब केवल सिलिकॉन वैली बेंगलुरु तक सीमित नहीं रही है. हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा कि इस क्षेत्र में दांव बहुत बड़ा है और इसके संभावित जोखिम भी काफी गंभीर हैं.
बीते दिनों इंडिया टुडे के स्मार्ट मनी फाइनेंशियल समिट में नैसकॉम के चेयरमैन और भारत की प्रमुख AI कंपनी फ्रैक्टल (Fractal) के सह-संस्थापक श्रीकांत वेलामाकन्नी ने कहा कि माइथोस जैसे अत्यधिक सक्षम AI सिस्टम का उभरना वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव है. वह ‘माइथोस स्केयर: भारतीय बाजारों के लिए चुनौती कितनी वास्तविक है?’ विषय पर आयोजित सत्र में हिस्सा ले रहे थे.
वेलामाकन्नी के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में AI मॉडल में जबरदस्त बदलाव आया है. पहले ये सिस्टम केवल दस्तावेजों का सार निकालने और सवालों के जवाब देने तक सीमित थे लेकिन अब ये एजेंटिक मॉडल बन गए हैं. एजेंटिक मॉडल का मतलब यह है कि वह तकनीक जो सिर्फ सवालों के जवाब नहीं देते, बल्कि इंसानों की तरह खुद फैसले लेने की क्षमता रखते हैं.
जो तर्क कर सकते हैं, जटिल समस्याओं को कई चरणों में हल कर सकते हैं, बाहरी टूल का उपयोग कर सकते हैं और किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वतंत्र रूप से काम कर सकते हैं. नई पीढ़ी के AI सिस्टम जैसे माइथोस की यही क्षमता उन्हें बेहद शक्तिशाली और संभावित रूप से खतरनाक बनाती है. माइथोस को लेकर चिंता एंथ्रॉपिक के जरिए किए गए एक आंतरिक परीक्षण के बाद बढ़ी.
इस परीक्षण में मॉडल को ऐसा काम दिया गया था, जिसे वह आवश्यक अनुमति और इंटरनेट एक्सेस के बिना पूरा नहीं कर सकता था. हालांकि, उसने खुद को कुछ अतिरिक्त अधिकार दिलाने और बाहरी सिस्टम तक बिना जरूरी अनुमति पहुंच बनाने का तरीका खोज लिया. उसने सारा काम पूरा किया, अपने काम के सबूत मिटा दिए और शोधकर्ताओं को सफलता की सूचना भी दे दी.
हालांकि, एंथ्रॉपिक ने आखिरकार इस मॉडल को सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया लेकिन इस घटना ने AI की बढ़ती क्षमताओं और डिजिटल ढांचे पर उनके संभावित खतरे को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी. वेलामाकन्नी ने कहा कि यह मामला केवल एक AI मॉडल का नहीं है, बल्कि तकनीकी शक्ति के बदलते संतुलन का है.
उन्होंने कहा, "आज तकनीक एक नया भू-राजनीतिक हथियार बन गई है, जिसके जरिए शर्तें तय की जा सकती हैं. 500 साल पहले जिन देशों के पास बेहतर तकनीक थी, वे दूसरे देशों पर शासन करने में सफल रहे थे." उनके अनुसार AI उसी वास्तविकता का नया रूप है.
चर्चा का बड़ा हिस्सा साइबर सुरक्षा पर केंद्रित रहा. अब AI सिस्टम सॉफ्टवेयर की कमजोरियों की पहचान कर उन्हें इंसानों की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से इस्तेमाल कर सकते हैं. जो काम पहले किसी साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ को कई सप्ताह में करना पड़ता था, अब उन्नत AI मॉडल उसे बहुत कम समय में कर सकते हैं. इससे सॉफ्टवेयर बनाने के पारंपरिक तरीके की एक बड़ी कमजोरी सामने आ रही है.
दशकों से कंपनियां "पैच एंड फिक्स" तरीके पर काम करती रही हैं, यानी सॉफ्टवेयर जारी होने के बाद उसमें मौजूद कमजोरियों की पहचान कर उन्हें समय-समय पर ठीक किया जाता है. हालांकि, अब एजेंटिक AI के दौर में किसी कमजोरी के सामने आने और उस पर हमला होने के बीच का समय अब बहुत कम रह गया है. ऐसे में यह तरीका तेजी से अप्रभावी होता जा रहा है.
इसलिए नैसकॉम के चेयरमैन वेलामाकन्नी ने कहा, "किसी भी सॉफ्टवेयर कंपनी के लिए अब सुरक्षा को शुरुआत से ही डिजाइन का हिस्सा बनाना होगा. इसे बाद में जोड़ने वाली चीज नहीं माना जा सकता." उन्होंने AI आधारित साइबर सुरक्षा सिस्टम को व्यापक रूप से अपनाने की वकालत की और कहा कि केवल इंसानों पर आधारित सुरक्षा व्यवस्था AI से होने वाले हमलों का मुकाबला नहीं कर पाएगी.
भारत के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है. देश के पास दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना प्रणालियों में से कुछ हैं, जिनमें आधार, डिजिटल भुगतान प्रणाली और तेजी से तकनीक आधारित होते वित्तीय बाजार शामिल हैं. इन प्रणालियों की सुरक्षा के लिए उन्नत AI टूल की मदद से लगातार परीक्षण और मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे की जरूरत होगी.
उन्होंने कहा, "हमारी सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना का लगातार नवीनतम AI मॉडलों से परीक्षण होना चाहिए, ताकि कमजोरियों की पहचान कर उन्हें समय रहते दूर किया जा सके और उनका दुरुपयोग होने से पहले ही खत्म किया जा सके. सुरक्षा को शुरुआत से ही सिस्टम का हिस्सा बनाना होगा, बाद में जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा."
उन्होंने यह भी कहा कि अब भारत को अपनी संप्रभु AI क्षमता विकसित करने का समय आ गया है. दुनिया के प्रमुख AI मॉडलों तक पहुंच जरूरी है लेकिन हाल में उन्नत AI सिस्टम पर लगाए गए प्रतिबंधों ने यह दिखा दिया है कि पूरी तरह विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. नैसकॉम के चेयरमैन वेलामाकन्नी ने कहा कि भारत को अपने अत्याधुनिक AI मॉडल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम करना चाहिए और इंडिया AI मिशन के तहत निवेश को काफी बढ़ाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "इंडिया AI मिशन के तहत फिलहाल पांच वर्षों के लिए लगभग 10,300 करोड़ रुपये का प्रावधान है लेकिन अगर हमें अपनी 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखना है, तो अगले 3-4 वर्षों में नहीं, बल्कि हर साल 10,000 करोड़ रुपये का बजट चाहिए, यानी मौजूदा निवेश से लगभग 10 गुना ज्यादा."
अब AI केवल उत्पादकता बढ़ाने का साधन नहीं रह गया है. यह तेजी से ऐसी रणनीतिक तकनीक बन रहा है जो साइबर सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करेगा. भारत के लिए इस भविष्य की तैयारी अब बेहद जरूरी हो गई है.
इस कार्यक्रम में एक्सपर्ट की कही गई मुख्य बातें-
- AI अब केवल सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं है। आधुनिक AI मॉडल तर्क कर सकते हैं, योजना बना सकते हैं, कई चरणों वाले काम कर सकते हैं और बाहरी टूल का उपयोग भी कर सकते हैं.
- भविष्य में साइबर हमले AI बनाम AI की लड़ाई बन जाएंगे. जैसे-जैसे हमलावर AI का इस्तेमाल करेंगे, वैसे-वैसे संस्थानों को भी AI आधारित सुरक्षा प्रणाली अपनानी होगी.
- सॉफ्टवेयर में बाद में कमजोरियां ढूंढ़कर उन्हें ठीक करने वाला "पैच एंड फिक्स" तरीका अब तेजी से पुराना होता जा रहा है. किसी कमजोरी की पहचान और उसके दुरुपयोग के बीच का समय वर्षों से घटकर अब दिनों या घंटों में सिमट गया है.
- सॉफ्टवेयर की सुरक्षा शुरुआत से ही उसके डिजाइन का हिस्सा होनी चाहिए. कंपनियों को सिक्योरिटी-बाय-डिजाइन और जीरो-ट्रस्ट आर्किटेक्चर अपनाना होगा, न कि साइबर सुरक्षा को बाद में जोड़ने वाली चीज मानना चाहिए.
- AI अब एक भू-राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है, क्योंकि उन्नत AI सिस्टम तक पहुंच अब राष्ट्रीय शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक प्रभाव से जुड़ती जा रही है.
- भारत को वैश्विक AI मॉडलों तक पहुंच के साथ-साथ अपने संप्रभु AI मॉडल भी विकसित करने होंगे. महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे की सुरक्षा के लिए केवल विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा और देश को स्वदेशी AI क्षमताओं में तेजी से निवेश बढ़ाना होगा.