जुलाई में उम्मीद से ज्यादा बारिश ने बढ़ाई मौसम विशेषज्ञों की चिंता!
जुलाई में सामान्य से ज्यादा बारिश ने मौसम वैज्ञानिकों के अनुमान को गलत साबित कर दिया लेकिन यह राहत की नहीं बल्कि बदलते मानसून, बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं और जलवायु परिवर्तन की नई चुनौती का संकेत है

जुलाई ने भारत के मौसम विशेषज्ञों को चौंका दिया. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 'सुपर एल नीनो' के प्रभाव के कारण जुलाई में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया था. लेकिन इसके उलट जुलाई उम्मीद से कहीं अधिक बारिश वाला महीना साबित हुआ. इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि जलवायु परिवर्तन और समुद्र-वायुमंडल की बदलती पारस्परिक प्रक्रियाएं भारतीय मानसून का पूर्वानुमान लगाना लगातार कठिन बना रही हैं.
भारत में जुलाई के दौरान 280.5 मिमी की सामान्य बारिश के मुकाबले 283.3 मिमी बारिश दर्ज की गई. जबकि 30 जून को IMD ने अनुमान लगाया था कि जुलाई में बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94 प्रतिशत से भी कम रहेगी. जून के अंत तक मौसमी वर्षा की कमी 35.4 प्रतिशत थी, जो जून-जुलाई अवधि में घटकर 13 प्रतिशत रह गई.
जुलाई के अंत में जारी ब्रीफिंग में IMD ने कहा कि अगस्त-सितंबर के दौरान प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों, मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत के उत्तरी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत को छोड़कर देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है.
लेकिन यह पूरी तरह अच्छी खबर नहीं है. वजह यह है कि बारिश पूरे महीने समान रूप से नहीं हुई. इसके बजाय कम समय में बेहद तेज बारिश के कई दौर आए, जिनसे बाढ़, जान-माल का नुकसान और कृषि को भारी क्षति हुई.
IMD के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने बताया कि जुलाई में देशभर में अत्यधिक भारी बारिश की 269 और बहुत भारी बारिश की 918 घटनाएं दर्ज की गईं. उन्होंने कहा कि अत्यधिक भारी बारिश की घटनाएं पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक रहीं.
महापात्रा के मुताबिक इसका एक कारण 2026 में IMD के वर्षामापी नेटवर्क का विस्तार भी हो सकता है. 2015 में विभाग के पास 3,980 वर्षामापी केंद्र थे जो 2025 तक बढ़कर 6,727 हो गए. साथ ही 7,200 विकास खंडों के स्तर पर निगरानी की व्यवस्था भी शुरू की गई.
यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस में रिसर्च साइंटिस्ट अक्षय देवरस कहते हैं कि इस बार मानसून बाहरी कारकों के बजाय अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं से संचालित होता दिख रहा है, जिन पर मौसम वैज्ञानिक आमतौर पर नजर रखते हैं. निम्न दबाव वाले तंत्र इसकी आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं. वहीं एल नीनो जैसी प्रतिकूल स्थिति में मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) और हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं.
अगर ये दोनों मौसमी घटनाएं सकारात्मक चरण में हों तो वे देश में अच्छे मानसून से जुड़ी होती हैं और काफी हद तक एल नीनो के प्रभाव को कम कर देती हैं. देवसर कहते हैं, “ऐसा लगता है कि इस बार मानसून अपनी ही गति से आगे बढ़ रहा है और इसमें जलवायु परिवर्तन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता.”
महाराष्ट्र, गुजरात, असम, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश हुई. 29 जुलाई तक 15 राज्यों में सामान्य और चार राज्यों में सामान्य से अधिक या बहुत अधिक बारिश दर्ज की गई. इससे देश के कुल राज्यीय क्षेत्रफल का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा कवर हुआ.
वहीं 17 राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई, जो देश के कुल राज्यीय क्षेत्रफल का 36 प्रतिशत है. जुलाई के आखिर में गुजरात के वलसाड जिले के उमरगांव में 24 घंटे के भीतर 1,064 मिमी बारिश हुई. देवरस के मुताबिक 1901 के बाद भारत में दर्ज यह तीसरी सबसे अधिक 24 घंटे की वर्षा है.
लगातार बने मौसम तंत्रों ने पूरे जुलाई में मानसून को सक्रिय बनाए रखा. IMD के पूर्व महानिदेशक के.जे. रमेश कहते हैं कि मौजूदा मौसम मॉडल इनमें से किसी भी घटनाक्रम का अनुमान नहीं लगा सके. उन्होंने कहा, “स्पष्ट है कि कोई भी जलवायु मॉडल इन घटनाओं को पकड़ नहीं पाया.”
रमेश ने इसके दो प्रमुख कारण बताए. पहला, फिलीपींस के पश्चिम में पश्चिमी प्रशांत महासागर का गर्म होना. इससे एल नीनो के कारण बारिश में आने वाली कमी का असर काफी हद तक खत्म हो गया और म्यांमार के ऊपर एक के बाद एक तीन चक्रवाती परिसंचरण यानी दबाव के साथ घुमावदार हवालों के सिस्टम बने. इनके अवशेष उत्तर बंगाल की खाड़ी तक पहुंचे, जहां वे फिर से मजबूत हो गए. इसके बाद इन्होंने अपने रास्ते में प्रायद्वीपीय भारत के बड़े हिस्से में भारी बारिश कराई.
रमेश यह भी कहते हैं, “दूसरी ओर मानसून के दौरान पश्चिमी विक्षोभों की संख्या बढ़ने से अरब सागर से अधिक नमी महाराष्ट्र और गुजरात तक पहुंची. ये सिस्टम तिब्बत तक पहुंचे, पूर्वी हिमालय में बारिश कराई और असम में आई बाढ़ को भी बढ़ावा दिया. जलवायु परिवर्तन मानसून की प्रकृति बदल रहा है, लेकिन मौजूदा मॉडल इन बदलावों को शामिल नहीं कर पा रहे हैं.”
हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) को 'इंडियन नीनो' भी कहा जाता है. यह समुद्र की सतह के तापमान (SST) में होने वाला अनियमित उतार-चढ़ाव है, जिसमें पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक गर्म और पूर्वी हिस्सा अपेक्षाकृत ठंडा हो जाता है. इसका असर भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून की ताकत पर भी पड़ता है.
IOD के सकारात्मक चरण में पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होता है और वहां अधिक वर्षा होती है. वहीं पूर्वी हिंद महासागर का पानी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है. तटस्थ IOD मानसून के लिए नुकसानदेह नहीं होता, जबकि नकारात्मक IOD इसके विपरीत परिस्थितियां पैदा करता है. हिंद महासागर के तापमान में होने वाले बदलाव अब जलवायु परिवर्तनशीलता को समझने में लगातार अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.
IMD ने अपने बयान में कहा, “फिलहाल हिंद महासागर में तटस्थ IOD की स्थिति बनी हुई है और संकेत हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के शेष मौसम के दौरान भी यही स्थिति बनी रह सकती है. हालांकि कुछ अंतरराष्ट्रीय मौसम पूर्वानुमान केंद्रों का अनुमान है कि सितंबर 2026 के दौरान सकारात्मक IOD विकसित हो सकता है.”
यह वर्ष एक बार फिर याद दिलाता है कि भारत का मानसून अब एक नई जलवायु व्यवस्था में प्रवेश कर रहा है. एल नीनो जैसे पारंपरिक कारक अब भी महत्वपूर्ण हैं लेकिन वे अब गर्म होते महासागरों, बदलते वायुमंडलीय परिसंचरण और जलवायु परिवर्तन के साथ ऐसे तरीके से परस्पर जुड़ रहे हैं जिन्हें मौजूदा मॉडल ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं.
आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ यह अनुमान लगाना नहीं होगी कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह समझना भी होगा कि तेजी से गर्म होती दुनिया में बारिश कहां, कब और कितनी तीव्रता से होगी.