भारत में महंगाई से जल्द राहत की उम्मीद क्यों नहीं दिख रही?
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की महंगाई और सामान्य से कम बारिश की आशंका भारत में खाद्य और थोक महंगाई को ऊंचा बनाए रख सकती है

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 'शांति समझौता' टूटने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव फिर बढ़ गया है. ऐसे में बढ़ती कीमतें भारतीय नीति-निर्माताओं और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की चिंता बढ़ाती रहेंगी.
13 जून को केंद्र सरकार ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई के आंकड़े जारी किए. जून में महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत रही जबकि मई में यह 3.93 प्रतिशत थी. इसकी बड़ी वजह खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी रही. यह मई के 4.78 प्रतिशत से बढ़कर जून में 5.32 प्रतिशत हो गई. वहीं परिवहन और सेवाओं की महंगाई में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई.
इस बीच थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई जून में सालाना आधार पर बढ़कर 9.87 प्रतिशत पहुंच गई जबकि मई में यह 9.68 प्रतिशत थी. यह दो साल से अधिक समय का सबसे ऊंचा स्तर है. इसकी मुख्य वजह खाद्य वस्तुओं, पेट्रोलियम, बुनियादी धातुओं और रसायनों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी रही.
विश्लेषकों का मानना है कि CPI आधारित महंगाई बढ़ी जरूर है लेकिन यह अभी भी RBI के महंगाई लक्ष्य की निचली सीमा से थोड़ा ही ऊपर है. इसलिए इससे केंद्रीय बैंक के ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना नहीं बनती. हालांकि WPI आधारित महंगाई चिंता का विषय है, खासकर इसलिए क्योंकि पश्चिम एशिया की स्थिति तेजी से एक महीने पहले जैसी होती जा रही है. फिर भी ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फिलहाल RBI को ब्याज दरें बढ़ाने की जरूरत नहीं है.
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, "जून में 9.9 प्रतिशत की WPI महंगाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब यह पहले की तुलना में ज्यादा व्यापक हो गई है. दूसरी बात यह कि नवंबर 2025 से महंगाई लगातार बढ़ रही है. उस समय नकारात्मक महंगाई (डिफ्लेशन) की स्थिति थी, जो अब जून में इस ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. साफ है कि कम महंगाई का दौर खत्म हो चुका है."
उन्होंने कहा कि WPI महंगाई पर सबसे ज्यादा असर पश्चिम एशिया के युद्ध का पड़ा है. ईंधन से जुड़े सभी उत्पादों, जैसे पेट्रोलियम, गैस और अन्य ईंधन उत्पादों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. इस श्रेणी में महंगाई 27.4 प्रतिशत रही है जो उद्योगों की लागत बढ़ने का संकेत देती है.
इस बीच, अमेरिकी सेना ने ईरान पर फिर हमले किए हैं. ईरानी मीडिया के मुताबिक, बंदर अब्बास, किश, क़ेश्म और अबू मूसा द्वीपों पर विस्फोट हुए हैं. वहीं, तेहरान ने भी पश्चिम एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों को निशाना बनाना जारी रखा है. 14 जुलाई की रिपोर्टों के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट में UAE के दो तेल जहाजों पर ईरानी गोलीबारी हुई. इसमें एक भारतीय नाविक की मौत हो गई और चालक दल के आठ सदस्य घायल हो गए.
इन घटनाक्रमों के बाद कच्चे तेल की कीमतें चार सप्ताह के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. 14 जुलाई को ब्रेंट क्रूड 3.79 डॉलर बढ़कर 87.08 डॉलर प्रति बैरल हो गया. यह 4.55 प्रतिशत की बढ़ोतरी है और 12 जून के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है.
युद्ध का असर विनिर्मित उत्पादों पर भी पड़ा है. रसायन और उनसे जुड़े उत्पादों में महंगाई 12.8 प्रतिशत रही जबकि रबर और प्लास्टिक उत्पादों में यह 9.9 प्रतिशत रही. बैंक ऑफ बड़ौदा की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, रसायनों से जुड़ी लागत बढ़ने के कारण कपड़ा उद्योग में भी महंगाई बढ़ी है.
धातु उत्पादों की कीमतों में 12.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो वैश्विक बाजारों के रुझान के अनुरूप है. यही स्थिति बिजली मशीनरी की भी रही. खाद्य महंगाई में सबसे ज्यादा योगदान सब्जियों, फलों, अंडों, मांस, मछली और मसालों का रहा. मसालों की कीमतों में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट में कहा गया, "महीने के आखिर में हुई भारी बारिश से आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे कीमतों में बढ़ोतरी हुई."
गैर-खाद्य वस्तुओं में रेशों और तिलहनों, दोनों की महंगाई 20 प्रतिशत से अधिक रही. तिलहनों की कीमतें खाद्य तेलों के वैश्विक दाम बढ़ने के कारण बढ़ीं जबकि रेशों की कीमतों में बढ़ोतरी आपूर्ति और मांग के असंतुलन तथा निर्यात बढ़ने की वजह से हुई.
मदन सबनवीस का मानना है कि तेल की कीमतों का भविष्य उत्साहजनक नहीं है. उन्होंने कहा, "अब जब कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं तो लगता है कि सरकार कीमतें कम करने के लिए कोई प्रशासनिक कदम नहीं उठाएगी. ईंधन की कीमतों पर फिलहाल यथास्थिति बनी रहेगी."
उन्होंने अनुमान जताया कि अगले दो महीनों तक WPI महंगाई 9 से 10 प्रतिशत के बीच रह सकती है. उन्होंने कहा, "बहुत कुछ मानसून और खरीफ फसल के नतीजों पर भी निर्भर करेगा."
केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने कहा कि महंगाई का अनुमान अब भी बाहरी अनिश्चितताओं और मौसम से जुड़ी बाधाओं के जोखिम से प्रभावित है. उन्होंने कहा, "जून के मध्य में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता अल्पकालिक राहत लेकर आया था. लेकिन हाल की झड़पों ने भू-राजनीतिक चिंताओं को फिर बढ़ा दिया है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव आया है."
उन्होंने कहा कि घरेलू स्तर पर महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम सामान्य से कम बारिश और मानसून के दूसरे हिस्से में अल नीनो के मजबूत होने की बढ़ती संभावना है. सिन्हा कहती हैं, "सब्जियों, दालों और खाद्य तेलों की कीमतें मौसम से जुड़ी बाधाओं के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं और इन पर करीबी नजर रखने की जरूरत है. इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हमारा अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में WPI महंगाई औसतन 7 प्रतिशत के आसपास रहेगी."
हालांकि वे यह भी जोड़ती हैं कि पिछले अल नीनो के दौर की तुलना में भारत की स्थिति इस बार बेहतर है. इसकी वजह जलाशयों में अधिक पानी और खाद्यान्न का पर्याप्त बफर स्टॉक है.