डोकलाम के बाद चीन को रेल नेटवर्क से जवाब देने की तैयारी में भारत

पश्चिम बंगाल में वर्षों से अटकी चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे लाइन को अब नई रफ्तार मिल रही है. रणनीतिक रूप से अहम यह परियोजना डोकलाम सेक्टर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को मजबूत करने की भारत की सैन्य रणनीति का हिस्सा है

भारत LAC के पास तेजी से बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है (सांकेतिक तस्वीर)

डोकलाम में चीन के साथ सैन्य गतिरोध के नौ साल बाद भारत अब भारत-चीन-भूटान त्रि-जंक्शन के पास एक अहम रेलवे परियोजना को नई रफ्तार दे रहा है. उस दौरान पूर्वी हिमालय में सैनिकों की तेजी से आवाजाही की अहमियत सामने आई थी.

पश्चिम बंगाल सरकार का चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे लाइन के लिए भूमि अधिग्रहण में तेजी लाने का फैसला दिखाता है कि केंद्र सरकार सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने पर लगातार जोर दे रही है. यह ऐसे समय में हो रहा है, जब चीन दोनों देशों के वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है.

पश्चिम बंगाल की BJP सरकार ने करीब 20 किलोमीटर लंबी इस रेलवे लाइन के लिए लगभग 380 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण को मंजूरी दी है. भूमि अधिग्रहण की दिक्कतों के कारण यह परियोजना वर्षों से अटकी हुई थी. 

2011-12 में मंजूर हुई यह परियोजना अब फिर से पटरी पर लौट आई है. इसके पूरा होने पर रणनीतिक रूप से संवेदनशील डोकलाम सेक्टर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर तक संपर्क बेहतर होने की उम्मीद है. सिलीगुड़ी कॉरिडोर को एक संकरी पट्टी होने की वजह से भारत का 'चिकन नेक' भी कहा जाता है.

सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों में से एक है. यह पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र जमीनी मार्ग है. यह भारत-चीन-भूटान त्रि-जंक्शन के बेहद करीब स्थित है. इस कॉरिडोर को किसी भी तरह का खतरा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है. यही वजह है कि सैन्य योजनाकार इस क्षेत्र तक तेज परिवहन संपर्क को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि डोकलाम गतिरोध ने साफ संकेत दिया था कि चीन का उद्देश्य तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की चुंबी घाटी से तोरसा नाला पार कर भूटान के चेला पोस्ट तक सड़क बनाना था. इसका मकसद डोकलाम पठार पर स्थित जामफेरी रिज तक पहुंच बनाकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर को खतरे में डालना था.

भूटान के साथ सीमा विवाद अब भी सुलझा नहीं है. इसके बावजूद चीन ने पिछले कई वर्षों में डोकलाम पठार और आसपास के इलाकों में अपना इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार बढ़ाया है. 

सैटेलाइट तस्वीरों और स्वतंत्र आकलनों में भूटान के दावे वाले क्षेत्रों में सड़कों, सैन्य शिविरों, निगरानी चौकियों, स्थायी इमारतों और अन्य सहायता सुविधाओं के निर्माण का उल्लेख किया गया है. इससे साफ होता है कि चीन इस रणनीतिक त्रि-जंक्शन पर अपनी मौजूदगी लंबे समय के लिए मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.

भूटान और चीन के बीच सीमा वार्ता जारी है. लेकिन चीन जिस तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रहा है, उससे यह चिंता और बढ़ गई है कि बीजिंग धीरे-धीरे जमीनी हालात बदलने की कोशिश कर रहा है. इसी वजह से डोकलाम पठार पूर्वी हिमालय का सबसे संवेदनशील विवादित इलाका बन गया है.

चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे परियोजना को फिर से गति ऐसे समय मिली है, जब भारत सैन्य लॉजिस्टिक्स पर पहले से ज्यादा ध्यान दे रहा है. रक्षा योजनाकारों का मानना है कि भविष्य के किसी भी संघर्ष में सैनिकों, हथियारों और रसद को तेजी से पहुंचाने की क्षमता युद्धक्षेत्र की ताकत जितनी ही महत्वपूर्ण होगी. बे

हतर सड़कें और रेलवे लाइनें सैनिकों की तैनाती का समय कम करती हैं और ऊंचाई वाले इलाकों में लंबे समय तक सैन्य अभियान चलाने में मदद करती हैं.

इस बीच चीन ने तिब्बत क्षेत्र में दुनिया के सबसे व्यापक सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क में से एक तैयार किया है. 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत के साथ सैन्य गतिरोध के बाद बीजिंग ने पूरी सीमा पर निर्माण कार्य और तेज कर दिया. 

इसमें LAC के साथ सैकड़ों किलोमीटर लंबे हर मौसम में उपयोगी राजमार्ग, तिब्बत को सीमावर्ती क्षेत्रों से जोड़ने वाली नई रेलवे लाइनें, दोहरे उपयोग वाले हवाई अड्डे और एयरफील्ड, विवादित इलाकों के पास स्थाई सैन्य गांव, भूमिगत गोला-बारूद भंडार, सुरक्षित विमान आश्रय, फाइबर-ऑप्टिक संचार नेटवर्क, एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली, पैंगोंग त्सो पर पुल और सैनिकों की तेज तैनाती में सक्षम लॉजिस्टिक्स हब शामिल हैं.

इन परियोजनाओं ने तिब्बती पठार में सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों की आवाजाही की चीन की क्षमता को काफी मजबूत किया है. सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि अब चीनी सेना भारत के सामने कई सेक्टरों में 2017 के 73 दिन लंबे डोकलाम गतिरोध की तुलना में कहीं अधिक तेजी से अतिरिक्त सैनिक तैनात कर सकती है.

भारत ने भी सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की रफ्तार तेज की है. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अभी कई अहम कमियां बनी हुई हैं. सीमा सड़क संगठन (BRO) ने हिमालयी क्षेत्र में कई रणनीतिक सड़कें, पुल और सुरंगें तैयार की हैं. वहीं भारतीय रेलवे सिक्किम तक बेहतर संपर्क देने वाली सेवोक-रंगपो रेलवे लाइन सहित कई सीमावर्ती परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है.

रक्षा मंत्रालय के आकलन के अनुसार, भारत ने पिछले पांच वर्षों में चीन सीमा के साथ लगभग 2,089 किलोमीटर सड़कें बनाई हैं. यह देशभर में निर्मित कुल 3,595 किलोमीटर रणनीतिक सीमावर्ती सड़कों का हिस्सा है.

इस प्रगति के बावजूद रेलवे संपर्क अब भी सबसे बड़ी ऑपरेशनल चुनौतियों में से एक बना हुआ है. चीन जहां तिब्बत में फैले अपने व्यापक रेलवे नेटवर्क के जरिए भारी सैन्य उपकरणों को तेजी से सीमा तक पहुंचा सकता है, वहीं भारत अब भी LAC के पास कई अग्रिम क्षेत्रों में मुख्य रूप से सड़क परिवहन पर निर्भर है. 

पहाड़ी सड़कें भूस्खलन, खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं. इसलिए रेलवे नेटवर्क का विस्तार भारत के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य माना जा रहा है.

चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे लाइन से इस अंतर को कुछ हद तक कम करने की उम्मीद है. हालांकि इसकी लंबाई सिर्फ 20 किलोमीटर है, लेकिन यह पूर्वी हिमालयी सीमा तक रेलवे संपर्क बढ़ाने की व्यापक योजना का हिस्सा है. 

रक्षा योजनाकारों का मानना है कि ऐसी परियोजनाएं आपात स्थिति में सैनिकों की तेज तैनाती की क्षमता बढ़ाएंगी और लंबे समय तक सैन्य बलों की तैनाती के लिए जरूरी लॉजिस्टिक्स को भी मजबूत करेंगी.

डोकलाम अब भी भारत-चीन सीमा का सबसे संवेदनशील विवादित क्षेत्र बना हुआ है. 2017 में चीन की निर्माण टीमों ने जामफेरी रिज की ओर सड़क बढ़ाने की कोशिश की थी. इसके बाद भारतीय और चीनी सैनिक कई हफ्तों तक आमने-सामने डटे रहे. 

भारत ने भूटान के समर्थन में दखल करते हुए कहा था कि इस इलाके में यथास्थिति में किसी भी तरह का बदलाव सीधे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के लिए खतरा बन सकता है.

हालांकि तत्कालीन संकट का समाधान कूटनीतिक बातचीत से हो गया था लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों और स्वतंत्र आकलनों से संकेत मिलता है कि चीन ने इसके बाद भी डोकलाम पठार और आसपास के क्षेत्रों में अपना इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना जारी रखा. नई सड़कें, सैन्य शिविर, निगरानी चौकियां और स्थाई ढांचे बनाकर चीन ने इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत की है.

भारतीय सैन्य योजनाकारों के लिए ये घटनाक्रम इस बात का संकेत हैं कि पूर्वी सेक्टर तक तेजी से पहुंच बनाना बेहद जरूरी है. बेहतर रेलवे संपर्क से सैनिकों के मोबिलाइजेशन का समय घट सकता है, लॉजिस्टिक्स मजबूत हो सकते हैं और तनाव बढ़ने की स्थिति में सैनिकों तथा सैन्य उपकरणों को तेजी से मोर्चे तक पहुंचाया जा सकता है. 

अधिकारियों का मानना है कि चालसा-नक्सलबाड़ी परियोजना का पुनर्जीवन केवल वर्षों से लंबित एक रेलवे लाइन को पूरा करना भर नहीं है. यह केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर बेहतर तालमेल का भी संकेत है.

सैन्य विशेषज्ञ रणनीतिक रेलवे परियोजनाओं को 'फोर्स मल्टीप्लायर' मानते हैं. आधुनिक युद्ध में मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर केवल सैनिकों की आवाजाही के लिए ही नहीं, बल्कि लंबे सैन्य अभियानों के दौरान गोला-बारूद, ईंधन, भारी उपकरण और अन्य रसद की निरंतर आपूर्ति बनाए रखने के लिए भी जरूरी होता है. 

किसी संकट के समय सशस्त्र बल कितनी प्रभावी प्रतिक्रिया देंगे, यह काफी हद तक मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पर निर्भर करता है.

पिछले एक दशक में सीमा क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भारत की नीति में बड़ा बदलाव आया है. कई वर्षों तक नई दिल्ली सीमा के बेहद करीब बड़े पैमाने पर परिवहन नेटवर्क बनाने से बचती रही, क्योंकि आशंका थी कि युद्ध की स्थिति में उसका फायदा दुश्मन भी उठा सकता है. 

अब यह नीति पूरी तरह बदल चुकी है. आज नीति-निर्माता मजबूत सीमा इंफ्रास्ट्रक्चर को विश्वसनीय प्रतिरोध क्षमता का अहम आधार मानते हैं. सैनिकों की तेज आवाजाही, आपूर्ति श्रृंखला बनाए रखने और उभरते खतरों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता अब भारत की सीमा रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुकी है.

चीन जिस अभूतपूर्व गति से तिब्बत में अपना सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है, उसके जवाब में भारत भी सड़कों, सुरंगों, पुलों और रणनीतिक रेलवे लाइनों का अपना नेटवर्क मजबूत कर रहा है. 

चालसा-नक्सलबाड़ी रेलवे परियोजना को फिर से शुरू करना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है. यह इस बात का संकेत है कि भविष्य में हिमालयी क्षेत्र में किसी भी संकट की स्थिति में भारत लॉजिस्टिक्स को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि रणनीतिक ताकत बनाना चाहता है.

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