सामाजिक जकड़न या कानून का दुरुपयोग, भारत में शादियां क्यों बन रहीं जानलेवा?
'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव मुंबई' में विशेषज्ञों ने दहेज हत्या और घरेलू हिंसा से लेकर वैवाहिक विवादों में झूठे आरोपों और कानून के कथित दुरुपयोग तक के मुद्दों पर चर्चा की

हाल ही में 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव मुंबई' के एक सत्र में बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच दहेज हत्या, घरेलू हिंसा और शादी से जुड़े झूठे मामलों के आरोपों पर चर्चा हुई. इस चर्चा में बताया गया कि शादी के दौरान लिए जाने वाले 'आई डू (I do)' की कसमें यानी विवाह के वचन और सीधे शब्दों में कहें तो शादियां कई पुरुषों और महिलाओं के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं.
इस सत्र में वकील और सामाजिक कार्यकर्ता फ्लेविया एग्नेस, पुरुषों के अधिकारों पर डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली दीपिका नारायण भारद्वाज और मनोचिकित्सक, सेक्सोलॉजिस्ट और कपल्स थेरेपिस्ट डॉ. पवन सोनार शामिल थे.
एग्नेस ने कहा कि 'दहेज हत्या' शब्द का इस्तेमाल सही नहीं है क्योंकि महिलाओं की मौत हिंसा के कारण होती है, चाहे वे आत्महत्या करें या उनकी हत्या कर दी जाए. उन्होंने कहा कि मरने वाली कई महिलाएं कभी पुलिस के पास गई ही नहीं थीं. उनकी मौत के बाद जब मामले हत्या और दहेज हत्या धाराओं के तहत दर्ज होते हैं, तभी इन घटनाओं को दहेज से जुड़ा मामला माना जाता है.
उनके मुताबिक चूंकि व्यक्तिगत मामले लोगों का ध्यान खींचते हैं इसलिए यह धारणा बनी हुई है कि महिलाएं कानून का गलत इस्तेमाल करती हैं. जबकि अनुमान के मुताबिक हर दिन औसतन 16 महिलाओं की मौत के मामले काफी हद तक बिना रिपोर्ट हुए रह जाते हैं.
एग्नेस ने दहेज हत्या और विवाहित महिला के साथ क्रूरता से जुड़े कानूनों की शुरुआत का संबंध 1980 के दशक के महिला आंदोलन से जोड़ा. उस समय खासकर उत्तर भारत के राज्यों में ससुराल में नई दुल्हनों की मौत के मामले सामने आ रहे थे. इन घटनाओं में अक्सर कोई गवाह नहीं होता था.
उन्होंने कहा कि सामाजिक बदनामी के डर और शादी को बचाए रखने की इच्छा के कारण महिलाएं अक्सर शादी के दौरान मामला दर्ज कराने से बचती हैं और तलाक की याचिकाओं में हिंसा का जिक्र करती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पुरुष क्रूरता के मुकाबले व्यभिचार (एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर) के आधार पर तलाक के लिए अधिक आवेदन करते हैं.
भारद्वाज के मुताबिक मानव जीवन को लैंगिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि हर साल करीब 1.5 लाख पुरुष आत्महत्या से मरते हैं और उनका फाउंडेशन हर महीने करीब 200 लोगों की मदद करता है.
उन्होंने अतुल सुभाष आत्महत्या मामले का जिक्र किया और कहा कि उनकी पत्नी 19 दिन जेल में रही थीं. उन्होंने दिल्ली की एक न्यायिक अधिकारी की आत्महत्या के मामले का भी जिक्र किया, जिसमें उनके मुताबिक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी. इस तरह भारद्वाज ने तर्क दिया कि कानून का इस्तेमाल इस आधार पर अलग-अलग तरीके से किया जाता है कि पीड़त कौन है.
उन्होंने करीब दो हफ्ते पहले वैवाहिक विवादों में यौन शोषण के झूठे आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का भी जिक्र किया. भारद्वाज ने कहा, “महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून जरूरी हैं लेकिन अब कुछ महिलाएं कानूनी सुविधाओं का गलत इस्तेमाल कर रही हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुरुषों ने सामाजिक सुविधाओं का गलत इस्तेमाल किया है.”
डॉ. सोनार ने बताया कि आम तौर पर कपल्स थेरेपी के लिए तब पहुंचते हैं जब रिश्ते को बचाने की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी होती है. कम उम्र में सेक्स एजुकेशन की कमी, सहमति की समझ और शादी के लिए तैयारी न होने की समस्या की ओर ध्यान दिलाने के साथ उन्होंने संयुक्त परिवार के पतन, शहरीकरण और महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता का भी हवाला दिया, जो ऐसे बदलाव हैं जिनके साथ विवाह संस्था अभी भी खुद को ढाल रही है. उन्होंने कहा कि Gen Z अपनी उम्मीदों को लेकर खुलकर बात करती है और उसके साथ धैर्य रखने की जरूरत है.
सत्र की मुख्य बातें :
फ्लेविया एग्नेस
- "कोई भी महिला दहेज की वजह से नहीं मरती. उनकी मौत हिंसा के कारण होती है."
- "महिलाएं तकलीफ सहती हैं...और ज्यादातर चुपचाप सहती हैं."
- "महिलाएं शादी कायम रहने के दौरान मामला दर्ज नहीं कराना चाहतीं. आप हमेशा अपनी शादी बचाए रखना चाहते हैं. तलाक एक बदनामी की तरह देखा जाता है."
दीपिका नारायण भारद्वाज
- "जब किसी के साथ अन्याय होता है तो उसे लैंगिक (जेंडर) नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए."
- "घर चलाने के लिए पुरुषों से भी बहुत उम्मीदें की जाती हैं. जिंदगी में वे चाहे जो करना चाहते हों, वयस्क होते ही उन पर परिवार की देखभाल करने की जिम्मेदारी आ जाती है."
- ''पुरुषों की समस्याओं को समाज स्वीकार नहीं करना चाहता और इसी वजह से आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं. भारत में हर साल करीब 1.5 लाख पुरुष आत्महत्या से मरते हैं."
डॉ. पवन सोनार
- "ज्यादातर जोड़े थेरेपी के लिए तब आते हैं जब रिश्ता बचाने की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी होती है. यह एक बड़ी समस्या है. इसकी जड़ बुनियादी शिक्षा में है."
- "बचपन में सेक्स एजुकेशन की कमी है. हम मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर सेक्स एजुकेशन देने की कोशिश करते हैं लेकिन अब भी इस पर बात करना वर्जित माना जाता है.”
- “सामाजिक बदलाव, शहरीकरण और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के कारण अब यह व्यवस्था टूट रही है.”