जेन ज़ी को साधने और CJP का असर थामने के लिए क्या कर रही BJP?
जंतर-मंतर के Gen Z आंदोलन के बाद BJP ने युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने की रणनीति बदली है. संगठन में युवा चेहरों को आगे लाने से लेकर सोशल मीडिया और जमीनी संपर्क बढ़ाने तक, पार्टी CJP के बढ़ते असर को थामने की कोशिश कर रही है

BJP अध्यक्ष नितिन नवीन पार्टी के एक कार्यक्रम में (फाइल फोटो)
जब 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया तो BJP को उम्मीद थी कि इससे नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा सुधारों की मांग को लेकर चल रहे Gen Z के आंदोलन का गुस्सा कुछ कम होगा.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद हुई घटनाओं से संकेत मिलता है कि BJP और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) दोनों ने इन प्रदर्शनों को सिर्फ परीक्षा से जुड़ा विवाद नहीं बल्कि इससे कहीं गंभीर मामला माना है.
हालांकि आंदोलन का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) कर रही थी लेकिन BJP की चिंता इस बात को लेकर थी कि प्रदर्शन में कौन पहुंच रहा था. इसमें समर्थन सिर्फ विपक्षी दलों, वामपंथी संगठनों के समर्थन वाले विश्वविद्यालय छात्र संगठनों या BJP के पारंपरिक विरोधी क्षेत्रों तक सीमित नहीं था.
BJP के अपने सामाजिक आधार में भी सेंध के संकेत दिख रहे थे. इनमें ऐसे परिवार भी शामिल थे जिन्होंने 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट दिया है.
यह एक अलग तरह की समस्या है. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसी छात्र से बहस की जा सकती है या उसे नजरअंदाज किया जा सकता है. लेकिन अगर वही छात्र किसी ऐसे परिवार से आता है जहां उसके माता-पिता बूथ स्तर पर BJP के कार्यकर्ता हैं और वह घर पर भी वही सवाल पूछ रहा है तो उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है.
इसके बाद पार्टी के तेजी से ऑनलाइन जवाब देने के सामान्य तरीके का इस्तेमाल भी सीमित रहा. इसलिए 25 जुलाई के बाद की प्रतिक्रिया किसी अभियान की तरह तेज और व्यापक नजर नहीं आई.
बातचीत को परिवारों, छोटे समूहों, स्थानीय नेटवर्क और खास जातीय व क्षेत्रीय समूहों के जरिए आगे बढ़ाया जा रहा है. एक साथ दो चीजें करने की कोशिश हो रही है.
एक कोशिश यह है कि युवा भारतीयों की असली शिकायतों और CJP की राजनीतिक मुहिम को अलग-अलग रखा जाए. BJP ने तय किया है कि वह युवाओं की इन शिकायतों का विरोध नहीं करेगी लेकिन वह नहीं चाहती कि CJP इन मुद्दों के जरिए अपनी राजनीतिक पहचान बना ले.
दूसरी कोशिश यह बताने की है कि मोदी सरकार बात सुन सकती है और अपनी दिशा सुधार सकती है. इसकी झलक तब दिखी जब BJP परीक्षा में पेपर लीक के मामलों में दंड के प्रावधानों को कड़ा करने के लिए जल्द कानून लाई.
साथ ही राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में सुधार लागू करने के लिए एक टास्कफोर्स भी बनाया. पार्टी ने युवाओं के साथ संपर्क फिर से कायम करने के लिए बांसुरी स्वराज, तेजस्वी सूर्या, राघव चड्ढा और सहयोगी दल की सायोनी घोष जैसे युवा सांसदों को भी मैदान में उतारा.
राजनीतिक नुकसान को रोकने के लिए कई स्तरों पर संवाद के रास्ते अपनाना संघ की कार्यशैली से ज्यादा मेल खाता है, BJP की पारंपरिक शैली से कम. संघ की दिलचस्पी कभी खास तौर पर टेलीविजन बहस जीतने में नहीं रही.
उसकी प्राथमिकता ड्रॉइंग रूम, हॉस्टल, मोहल्लों और शाखाओं में धीरे-धीरे राय बदलने की रही है. आम तौर पर उसके पास इंतजार करने का धैर्य भी रहा है.
अब BJP ने राज्यों में स्थानीय नेताओं के जरिए छोटे कार्यक्रमों के साथ Gen Z तक पहुंचने की मुहिम शुरू की है. इसकी शुरुआत खुद मोदी ने इंस्टाग्राम रील्स के जरिए की. अब इसे BJP और RSS के जमीनी कार्यकर्ता आगे बढ़ा रहे हैं. इनमें से कई उसी Gen Z पीढ़ी से आते हैं जिसे वे संबोधित करने की कोशिश कर रहे हैं.
इसके साथ एक सख्त रुख भी अपनाया जा रहा है. BJP-संघ से जुड़े कुछ हिस्सों ने CJP को स्वाभाविक रूप से उभरा छात्र आंदोलन मानने के बजाय ऐसा राजनीतिक प्रोजेक्ट बताया है, जिसकी फंडिंग और उसके संपर्कों की जांच की जरूरत है.
विदेशी संलिप्तता और देश को अस्थिर करने की कोशिशों के आरोप भी लगाए गए हैं. हालांकि सार्वजनिक रूप से इनके समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया गया है. पार्टी का रुख मूल रूप से यह है कि युवाओं की शिकायतें वास्तविक थीं लेकिन इन शिकायतों पर राजनीतिक दावा किसका है, यह विवाद का विषय है.
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कम समय के भीतर दो संवाद कार्यक्रम किए हैं. पहला कार्यक्रम 6 अगस्त को मुंबई में करीब 2,000 युवाओं के बीच हुआ. यह संघ से जुड़े किसी संगठन का मंच नहीं था बल्कि इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) के 15वें वर्ष के सम्मेलन का कार्यक्रम था.
भागवत ने कहा कि Gen Z की चिंताएं वास्तविक हैं और जब लोगों को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तब प्रदर्शन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का जायज तरीका है. उन्होंने जोर देकर कहा कि युवा प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जाना चाहिए.
इसके बाद 15 अगस्त को नागपुर में लोकमत समूह की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने इसी मुद्दे पर ज्यादा सावधानी भरा रुख अपनाया.
उन्होंने कहा कि युवा देश के लिए जनसांख्यिकीय लाभांश हैं लेकिन अगर किसी पीढ़ी को ठीक से संभाला नहीं गया तो आगे चलकर वह समाज पर बोझ बन सकती है. उन्होंने कहा कि विरोध और जन आंदोलन जायज हैं बशर्ते व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखा जाए.
एक नजरिए से देखें तो मुंबई में भागवत का दखल प्रधान के इस्तीफे के बाद हुई सबसे महत्वपूर्ण घटना थी. दूसरे नजरिए से देखें तो दोनों कार्यक्रम मिलकर ऐसे आंदोलन को अपने दायरे में लेने की कोशिश हैं जिस पर संघ का नियंत्रण नहीं है.
इसमें गुस्से को जायज ठहराया जा रहा है लेकिन यह भी बताया जा रहा है कि उसे किस तरह व्यक्त किया जाना चाहिए. साथ ही प्रतिभागियों को मुख्यधारा में जगह देने की पेशकश की जा रही है बशर्ते वे CJP से दूरी बना लें.
शायद दोनों ही बातें सही हैं. लेकिन भागवत जिस तरह के हालात पर बात कर रहे हैं, उसका इससे पहले कोई साफ उदाहरण नहीं मिलता.
2011 के भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे आंदोलन से इसकी तुलना की जाती है लेकिन यह तुलना केवल कुछ हद तक ही उपयोगी है. उस आंदोलन ने भ्रष्टाचार को लेकर एक पीढ़ी के गुस्से को ऐसी सरकार के खिलाफ मोड़ दिया था जो उसकी बात नहीं सुन रही थी.
इससे आम आदमी पार्टी (AAP) का जन्म हुआ और दिल्ली में एक राजनीतिक विकल्प सामने आया. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उस गुस्से के पास जाने के लिए दूसरी जगह थी. BJP पहले से ही विकल्प थी और नरेंद्र मोदी खुद को उस सवाल के जवाब के तौर पर पेश कर सकते थे. 2014 में BJP का संदेश सिर्फ हिंदुत्व और राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं था. इसमें साफ-सुथरी सरकार, निर्णायक प्रशासन, रोजगार और विकास का वादा भी शामिल था.
Gen Z के पास यह विकल्प नहीं है क्योंकि जिस सरकार से वह नाराज है, उसी के शासन में वह बड़ी हुई है. इस दौर के पहली बार वोट देने वाले युवाओं में से बड़ी संख्या 2014 में प्राथमिक स्कूल में थी. इसमें एक और पहलू भी है.
यह पीढ़ी हिंदुत्व या राष्ट्रवाद के खिलाफ हो, ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन ऐसा लगता है कि वह अपने सीमित और तात्कालिक सवालों के जवाब के लिए इन दोनों को पर्याप्त नहीं मानती. क्या परीक्षाएं निष्पक्ष होंगी? क्या रोजगार पैदा होंगे? क्या परिवार प्रवेश परीक्षाओं की कोचिंग का खर्च उठा सकता है? जब AI शुरुआती स्तर की नौकरियों की जगह लेने लगेगा तो करियर का क्या होगा? ऐसे कई सवाल हैं.
ऐसे भारत में बड़ी हुई Gen Z, जो ज्यादा समृद्ध और अपने बारे में ज्यादा आश्वस्त है. इसलिए उसकी अपेक्षाएं भी ज्यादा हैं और वह जल्दी परिणाम चाहती है. अब तक BJP ने जो कदम उठाए हैं, उनके पीछे सबसे ज्यादा यही सोच दिखाई देती है.
8 अगस्त को IIT दिल्ली में मोदी ने छात्रों से जिज्ञासा, लगातार सीखते रहने, विरासत में मिली बातों पर सवाल उठाने और तेजी से बदलती तकनीक के मुताबिक खुद को ढालने की बात की. पिछले दो हफ्तों की उनकी भाषा से यह शब्दावली काफी अलग थी.
हालांकि हर जगह ऐसा नहीं था. दो दिन बाद छुट्टी पर चल रहे प्रधान ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान Gen Z को गुमराह किया गया था. दोनों बयानों के बीच तालमेल नहीं दिखा.
15 अगस्त को दोनों रुख एक साथ दिखाई दिए. स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में मोदी ने प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को AI प्रशिक्षण देने की घोषणा की. ये दोनों घोषणाएं उन दो चिंताओं से सीधे जुड़ती हैं जो आंदोलन की वजह बनी थीं.
उसी दिन नागपुर में भागवत ने युवाओं की बात को गंभीरता से लेने की जरूरत बताई. BJP इन घटनाओं को युवाओं की चिंताओं पर प्रतिक्रिया के तौर पर पेश करेगी.
विपक्ष के पास इसका सीधा जवाब है कि इन घोषणाओं के लिए एक केंद्रीय मंत्री के पद से हटने और हफ्तों तक चले विरोध प्रदर्शन की जरूरत क्यों पड़ी. साथ ही, लाल किले से घोषित कोई योजना ऐसी परीक्षा व्यवस्था के बराबर नहीं है, जो वास्तव में ठीक से काम करती हो.
इसके बाद BJP ने संगठन में भी बदलाव किए. 17 अगस्त को 11 साल से पार्टी के सोशल मीडिया प्रमुख रहे अमित मालवीय की जगह दीपक म्हस्के को जिम्मेदारी दी गई. नई दिल्ली के ज्यादातर राजनीतिक जानकारों ने इस बदलाव को युवा आंदोलनों से जोड़कर देखा.
मालवीय का तरीका था- नैरेटिव को अपने नियंत्रण में रखना और पहले से ज्यादा जोरदार पलटवार करना. यह तरीका एक अलग तरह की राजनीतिक लड़ाई के लिए बना था. जंतर-मंतर के आंदोलन ने दिखा दिया कि इसकी सीमाएं क्या हैं.
म्हस्के के पास संगठन और चुनावी आंकड़ों का अनुभव है. वह कई राज्यों में BJP के सोशल मीडिया अभियानों को संभाल चुके हैं. शुरुआत में उनका जोर इंस्टाग्राम और रील्स पर रहा है. साथ ही अलग-अलग मंचों पर अलग तरीके से संवाद करने, सटीक जानकारी देने और गलत सूचनाओं का मुकाबला करने पर भी जोर है.
BJP अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम और हेमांग जोशी को युवा मोर्चा प्रमुख बनाए जाने से भी यही संकेत मिलता है. पार्टी में युवा चेहरों को आगे लाया जा रहा है और फैसले लेने में उम्र और पद की दीवारें कम करने की कोशिश हो रही है.
लेकिन जिन लोगों को ध्यान में रखकर ये बदलाव किए जा रहे हैं उन पर इनका कितना असर होगा, यह अलग सवाल है. इस पूरी कवायद का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वही है, जिसे देखना सबसे मुश्किल है.
संघ की पारंपरिक ताकत दिखावे से दूर होने वाले काम में रही है. छोटी बैठक, घर-घर जाकर मुलाकात और महीनों तक चलने वाली बातचीत. अब Gen Z का सवाल इन्हीं जगहों पर ले जाया जा रहा है.
हो सकता है कोई पिता अपनी बेटी से पूछ रहा हो कि क्या सरकार ने वास्तव में उसकी बात का जवाब दिया. किसी कॉलोनी में लोगों के बीच इस बात पर बहस हो रही हो कि CJP छात्र आंदोलन है या कुछ और.
कोई कार्यकर्ता समझा रहा हो कि प्रधान को पद क्यों छोड़ना पड़ा. लेकिन इनमें से कुछ भी सोशल मीडिया के आंकड़ों में दिखाई नहीं देता. और यह भी तय नहीं है कि यह तरीका काम करेगा.
बड़ी कमजोरी यह है कि संदेशों में बदलाव से जरूरी नहीं कि ऊपर से चली आ रही समस्याएं ठीक हो जाएं. युवाओं की शिकायतें इंस्टाग्राम से पैदा नहीं हुईं. वे परीक्षा केंद्रों, कोचिंग संस्थानों, भर्ती बोर्डों और परिवारों के बजट से पैदा हुई हैं.
अगर फिर किसी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है, भर्ती का कैलेंडर दोबारा खिसक जाता है या नौकरियां नहीं आतीं तो भाषा में बदलाव या बेहतर तालमेल से यह समस्या नहीं संभाली जा सकेगी.
BJP का आकलन लगता है कि उसे इस पीढ़ी की सहमति से ज्यादा इस भरोसे की जरूरत है कि शिकायत करने से नतीजा निकलता है. यानी हॉस्टल में उठाया गया कोई सवाल संगठन के जरिए ऊपर तक पहुंच सकता है और नीति बनकर वापस आ सकता है.
यह एक सीमित दावा है और निष्ठा मांगने से ज्यादा टिकाऊ भी. लेकिन अब तक यह साबित नहीं हुआ है. BJP और संघ के नेता समझते हैं कि इसका फैसला बैठकों या सोशल मीडिया बहसों में नहीं होगा. फैसला अगली परीक्षा और उसके बाद होने वाली परीक्षा में होगा.
2014 में मोदी ने एक पीढ़ी से भारत बदलने का मौका देने को कहा था. जिस पीढ़ी को वे अब संबोधित कर रहे हैं, उसने उन्हें हमेशा सत्ता में ही देखा है. वह जानना चाहती है कि यह बदलाव इतना धीमा क्यों रहा.