हर गांव में स्कूल फिर भी करोड़ों लड़कियां पढ़ाई में पीछे क्यों छूट गईं?

स्कूलों तक पहुंच बढ़ने के बावजूद करोड़ों लड़कियों की पढ़ाई अधूरी है. सामाजिक सोच और दूसरी बाधाएं अब भी उनकी शिक्षा के रास्ते में रुकावट बनी हुई हैं

एक स्कूल में कंप्यूटर चलाती लड़कियां (फोटो : चंद्रदीप कुमार)

भारत में करीब 10 करोड़ महिलाएं और लड़कियां 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई हैं. सामाजिक कार्यकर्ता और गैर-लाभकारी संगठन ‘एजुकेट गर्ल्स’ की संस्थापक सफीना हुसैन को चिंता है कि लोग अब लड़कियों की शिक्षा की समस्या को हल हुआ मानने लगे हैं. 

वे कहती हैं, "किसी तरह यह धारणा बन गई है कि लड़कियों की शिक्षा की समस्या खत्म हो चुकी है, लेकिन ऐसा नहीं है." ‘एजुकेट गर्ल्स’ ने अगले 10 वर्षों में 10 करोड़ विद्यार्थियों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है. संगठन ने इसे "10 बाय 10" नाम दिया है.

नीतियां बदलीं, सोच नहीं

जब 2007 में ‘एजुकेट गर्ल्स’ की शुरुआत हुई, तब इस दिशा में नीतिगत प्रयास बहुत कम थे. उस समय न तो शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून था और न ही बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना. कई गांवों के आसपास कोई स्कूल नहीं था.

अब स्थिति बदल गई है. हुसैन कहती हैं, "शिक्षा के अधिकार कानून की वजह से अब हर गांव के एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल है." उनका कहना है कि इन दोनों नीतियों ने "हमारी सबसे बड़ी चुनौतियों के एक बड़े हिस्से को हल कर दिया".

लेकिन कानून लोगों की सोच नहीं बदल सकता. हुसैन बताती हैं कि उन्होंने लोगों को यह कहते सुना है कि बेटी को पढ़ाना "पड़ोसी के बगीचे में पानी देने जैसा है." एक और कहावत है, "बकरी जायदाद है और लड़की बोझ." 

जिन गांवों में उनका संगठन काम करता है, वहां लड़कियों के नाम ‘फालतू’ और ‘चाइना’ तक रखे गए हैं. बंगाली भाषा में ‘चाइना’ का अर्थ है अनचाही. हुसैन कहती हैं, "यह जीव विज्ञान का मामला नहीं है. यह सब हमारे दिमाग में है."

स्कूल तक न पहुंच पाने वाली लड़कियों की तलाश

‘एजुकेट गर्ल्स’ उन लड़कियों तक पहुंचने पर ध्यान देता है जिन्हें हुसैन ‘आखिरी लड़की’ कहती हैं, यानी जो स्कूल से बाहर रह गई है. शुरुआत में संगठन ने जिले-दर-जिले काम किया. इसकी शुरुआत शिक्षा मंत्रालय की ओर से उन 26 जिलों से हुई, जहां लड़के और लड़कियों के नामांकन के बीच सबसे ज्यादा अंतर था. 

अब संगठन अपना अनुमान लगाने वाला मॉडल इस्तेमाल करता है. हुसैन कहती हैं, "हमारे अनुमान से पता चला है कि भारत के 5 फीसदी गांवों में स्कूल तक नहीं पहुंचने वालीं 40 फीसदी लड़कियां रहती हैं." यह मॉडल ग्रामीण, दूरदराज और आदिवासी इलाकों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है. ये गांव "मुख्य सड़क से सबसे दूर हैं".

किसी जिले को चुनने के बाद संगठन हर गांव से एक पढ़े-लिखे युवा को अपने साथ जोड़ता है. ‘टीम बालिका’ के नाम से पहचाने जाने वाले ये स्वयंसेवक घर-घर जाकर स्कूल से बाहर रह गई हर लड़की का पता लगाते हैं. अब तक करीब 55,000 युवा इस काम से जुड़ चुके हैं. इनमें लगभग 70 फीसदी पुरुष हैं.

सिर्फ दाखिले से बात नहीं बनेगी

लड़कियों को दोबारा स्कूल लाना पहला कदम है. तीसरी से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए संगठन अंग्रेजी, हिंदी और गणित की कक्षाएं चलाता है. हुसैन कहती हैं, "अगर वे पढ़ना-लिखना नहीं सीखेंगे तो स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाएंगे."

शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 14 साल की उम्र तक ही बच्चों को पढ़ाई का अधिकार मिलता है. इससे अधिक उम्र की लड़कियों के लिए संगठन ने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का कार्यक्रम बनाया है. गांवों में चलने वाले इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में लड़कियों को राज्य की मुक्त स्कूली शिक्षा व्यवस्था के जरिए 10वीं की परीक्षा देने के लिए तैयार किया जाता है. संगठन छह से 29 साल की लड़कियों और महिलाओं के साथ काम करता है.

हाल ही में पढ़ाई पूरी करने वाली भील जनजाति की 18 वर्षीय युवती ने हुसैन से कहा, "मेरी पढ़ाई 10 साल पहले रुक गई थी, जब मेरी शादी हुई थी." हुसैन कहती हैं, "सोचिए, उसमें कितना साहस, दृढ़ता और मुश्किलों से लड़ने की ताकत रही होगी."

अधिकार के तौर पर देखें शिक्षा

लड़कियों की शिक्षा की वकालत करने वाले अक्सर कहते हैं कि इससे दूसरे क्षेत्रों में भी फायदे होते हैं. बाल विवाह घटते हैं, टीकाकरण बढ़ता है और जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है. हुसैन इन दलीलों के पीछे मौजूद तथ्यों को स्वीकार करती हैं. वे कहती हैं, "अगर लड़कियों को शिक्षित किया जाए तो सतत विकास के 17 लक्ष्यों में से नौ को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है."

लेकिन वे शिक्षा के पक्ष में तर्क देते समय इन फायदों को सबसे आगे रखने से बचना चाहती हैं. वे कहती हैं, "हमें इस जाल में फंसने से बचना होगा कि लड़कियों को इसलिए पढ़ाना चाहिए, क्योंकि इससे किसी दूसरे काम में मदद मिलेगी. ऐसा तर्क देकर हम पितृसत्तात्मक सोच को ही बढ़ावा दे सकते हैं." हुसैन के मुताबिक, "हमें लड़कियों को इसलिए पढ़ाना चाहिए क्योंकि यह उनका अधिकार है."

यही सोच उन्हें लड़कियों और महिलाओं की निजी कहानियों को देखने का नजरिया देती है. एक मां ने अपने बेटे के साथ 10वीं की परीक्षा दी और बेटे से ज्यादा अंक हासिल किए. उसने कहा, "अब वो मेरी बात मानेगा." हुसैन के मुताबिक, यही असली बात है. वे पूछती हैं, "वरना घर में उसकी आवाज की क्या अहमियत होगी?"

पुरस्कार मिलना काफी नहीं

‘एजुकेट गर्ल्स’ को कई पुरस्कार मिल चुके हैं. हुसैन इन्हें "एक उपहार" मानती हैं क्योंकि इनसे लोगों का ध्यान उस काम की ओर जाता है जो अब भी अधूरा है. वे कहती हैं, "ये सभी पुरस्कार हमारे मिशन को लोगों तक पहुंचाने में मदद करते हैं. इनके जरिए हम कह सकते हैं कि देखिए, हमने अभी अपना लक्ष्य हासिल नहीं किया है."

उनका कहना है कि शिक्षा में यह अंतर सिर्फ स्कूलों तक सीमित नहीं रहता. वे कहती हैं, "इसका असर आगे चलकर कार्यस्थलों, लोगों की भागीदारी और कई दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई देता है."

हुसैन को पुरस्कारों से मिलने वाली सराहना के मुकाबले काम का विशाल पैमाना ज्यादा चिंतित करता है. वे कहती हैं, "समस्या अब भी उस काम से कहीं बड़ी है, जिसे हम पिछले 20 वर्षों में कर पाए हैं. हमें इस दिशा में काम की रफ्तार बहुत तेजी से बढ़ानी होगी."

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