Gen Z के मुद्दों पर संघ की राय ने बढ़ा दी BJP की मुश्किल?
मोहन भागवत ने Gen Z के गुस्से को जायज बताते हुए युवाओं से संवाद की जरूरत पर जोर दिया है. इससे BJP के सामने अब परीक्षा, भर्ती और रोजगार जैसे मुद्दों पर नतीजे देने और युवाओं का भरोसा जीतने की चुनौती बढ़ गई है

RSS प्रमुख मोहन भागवत मुंबई में युवाओं के एक कार्यक्रम के दौरान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अचानक यू-टर्न नहीं लेता. इसके बजाय वह धीरे-धीरे अपनी दिशा बदलता है. कहीं एक शब्द बदला जाता है, कहीं कोई नया मंच चुना जाता है, तो कहीं जोर देने का तरीका इतनी धीमी गति से बदला जाता है कि उसका पता पीछे मुड़कर देखने पर ही चलता है.
यही वजह है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के हाल के युवा भारतीयों, यानी Gen Z को लेकर दिए गए भाषणों को करीब से पढ़ना जरूरी है. और यही वजह है कि उनके आखिरी भाषण की जगह भी उसके शब्दों जितनी ही महत्वपूर्ण थी.
6 अगस्त को मुंबई के नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में भारत के इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) के 15वें सालाना सम्मेलन में 100 से ज्यादा शहरों से 2,000 से अधिक छात्र आए थे. इनके सामने भागवत ने ऐसी बात कही जो आमतौर पर RSS सरसंघचालकों के मुंह से सुनने को नहीं मिलती.
उन्होंने कहा, "अगर आप मुझसे आंख मूंदकर भरोसा करने को कहें तो मैं Gen Z पर भरोसा करूंगा." उन्होंने इस पीढ़ी को अपनी पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार बताया.
भागवत ने इस आरोप पर भी सीधे बात की कि हाल के युवा प्रदर्शनकारी देश के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर Gen Z आंदोलन कर रही है तो वे "निश्चित रूप से राष्ट्रविरोधी नहीं हैं". उनके मुताबिक, युवा चाहते हैं कि उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए न कि उन्हें सिर्फ संभालने की कोशिश की जाए. उन्होंने कहा, "उनकी बात सुनी जानी चाहिए और उन्हें यह महसूस भी होना चाहिए कि उनकी बात सुनी गई है."
भागवत ने विरोध-प्रदर्शन को खतरे के बजाय सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तौर पर देखा. उन्होंने कहा, "विरोध भी संवाद का एक तरीका है." उनके मुताबिक जब दूसरी जगहों पर चिंताओं को नहीं सुना जाता, तब आंदोलन होता है. हालांकि उन्होंने एक शर्त भी रखी कि इन सबका मकसद सहमति बनाना होना चाहिए, न कि विभाजन पैदा करना.
भाषण की जगह भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी बातें. भागवत ने किसी संघ शिविर या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के सम्मेलन का चुनाव नहीं किया. IIMUN संयुक्त राष्ट्र के मॉडल पर बना एक संगठन है, जो ऐसे स्कूली और कॉलेज छात्रों को जोड़ता है जिनकी कोई तय विचारधारात्मक पहचान नहीं है.
यह संगठन अलग-अलग मौकों पर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को एक ही मंच पर ला चुका है. यह महत्वाकांक्षी, शहरी और बड़े पैमाने पर ऑनलाइन रहने वाला युवा वर्ग है जिसे इस समय देश की हर राजनीतिक पार्टी समझने की कोशिश कर रही है.
भागवत के मुंबई भाषण से पहले के दो हफ्तों में यह सिलसिला लगातार चलता रहा था. 25 जुलाई को दिल्ली में विश्वमांगल्य सभा की समकालीन मातृत्व पर बैठक के समापन सत्र में उन्होंने बदलाव की इस कहानी को घरेलू संदर्भ में साफ शब्दों में रखा था.
तब उन्होंने कहा था, "जब हम छोटे थे, तब आज्ञा मानने का दौर था. नई पीढ़ी सवाल पूछती है. हमें उन्हें सवाल का तर्क समझाना होगा." उन्होंने आगे कहा था कि अब जरूरत "आदेश देने की नहीं, बल्कि चर्चा की" है.
दो दिन बाद हैदराबाद में उन्होंने इसी पीढ़ी पर बात की और उनका लहजा बदल गया. उन्होंने कहा कि Gen Z बदलाव के लिए तैयार रहती है, स्वभाव से भावुक होती है और जो चीज उसे साफ तौर पर वास्तविक लगती है, उसकी ओर तेजी से आकर्षित होती है. उन्होंने कहा, "वे बहुत शांत दिमाग से नहीं सोचते." उन्होंने इसे एक सामान्य टिप्पणी के तौर पर पेश किया. लेकिन कई लोगों को इसमें उपेक्षा का भाव सुनाई दिया.
तीनों भाषणों को एक साथ रखें तो पूरी तस्वीर साफ होने लगती है. पहले भाषण में उन्होंने माना कि अधिकार और आदेश की पुरानी व्यवस्था टूट चुकी है. दूसरे में उन्होंने उस व्यवस्था के दूसरी ओर खड़ी पीढ़ी को समझाने की कोशिश की. और तीसरे यानी मुंबई के भाषण में उन्होंने मान लिया कि हो सकता है युवाओं की बात में वास्तव में दम हो.
इसका समय भी कोई रहस्य नहीं है. भारतीय राजनीति पिछले कई महीनों से NEET पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल, वर्षों तक अटकी रहने वाली भर्तियों और ऐसी नौकरियों के मुद्दे पर छात्रों के गुस्से का सामना कर रही है, जो आती ही नहीं हैं.
इस गुस्से का बड़ा हिस्सा पहली बार वोट देने वाले युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी बड़ी आबादी से आया है. यह ऐसा वर्ग है जो सरकारों का आकलन उनके कामकाज और नतीजों के आधार पर करता है. वह अपनी बात सार्वजनिक रूप से और तेजी से कहता है. ऐसे मंचों पर, जहां एक नैरेटिव एक दोपहर में ही बदल सकता है.
BJP पिछले कुछ समय से इस बदलाव के मुताबिक खुद को ढाल रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने पेपर लीक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों और परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार का वादा किया है. इसके साथ ही पार्टी ने पॉडकास्ट, बिना तय प्रारूप वाले इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर बातचीत जैसे अपेक्षाकृत सहज माध्यमों के जरिए अपनी पहुंच फिर से बनाने की कोशिश की है. इसमें खुद मोदी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.
भागवत की यह पहल भी इसी कोशिश का हिस्सा है, इससे अलग नहीं. हालांकि वे सरकार की ओर से नहीं बोल रहे हैं और न ही किसी नीति की घोषणा कर रहे हैं. उनकी भूमिका हमेशा से संघ के पूरे तंत्र के भीतर माहौल तय करने की रही है.
संघ परिवार के भीतर यह संदेश देना कि Gen Z की नाराजगी वास्तविक है, दरअसल उन्हें नजरअंदाज करने के बजाय उनसे संवाद करने का निर्देश देने जैसा है.
भागवत ने क्या नहीं कहा, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. उन्होंने किसी खास प्रदर्शन का समर्थन नहीं किया. किसी मंत्री या मंत्रालय की आलोचना नहीं की. उन्होंने किसी संस्था की ओर इशारा नहीं किया और न ही उसे युवाओं की नाराजगी के लिए जिम्मेदार ठहराया.
इसके बजाय उन्होंने बिना जांचे-परखे ऑनलाइन आने होने वाली बातों पर भरोसा करने के खिलाफ चेताया और प्रतिबंध लगाने के बजाय खुद पर अनुशासन लागू करने की बात कही. उन्होंने ऐसे विरोध में भी फर्क किया जो लोकतंत्र को मजबूत करता है और ऐसे विरोध में भी जो उसे कमजोर करता है.
इसी तरह उन्होंने सुधार के मकसद से की गई शिकायत और टकराव पैदा करने वाली शिकायत के बीच भी अंतर बताया. यह सामाजिक एकजुटता को लेकर संघ की पुरानी सोच ही है, जिसे ऐसी पीढ़ी के लिए दोबारा सामने रखा गया है जो लंबे भाषण सुनने के लिए तैयार नहीं है.
हाल में ऐसी ही एक गलती का उदाहरण मौजूद है, जिससे भागवत शायद बचना चाहते हैं. और यह संघ के लिए कोई सहज उदाहरण नहीं है. 2020 की सर्दियों में जब केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ लाखों प्रदर्शनकारी दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच गए थे, तब सरकार के आसपास के पूरे तंत्र ने सबसे आसान जवाब तलाश लिया था.
यह नैरेटिव बनाया गया कि प्रदर्शनकारी खालिस्तानी हैं या उनके लिए काम कर रहे हैं. वे पेशेवर आंदोलनकारी हैं और उन्हें विदेशों से पैसा मिल रहा है. यह लेबल टीवी स्टूडियो और वॉट्सएप समूहों में तेजी से फैल गया.
फिर उसने ऐसा काम किया, जिसकी उसके इस्तेमाल करने वालों ने कल्पना नहीं की थी. यह प्रदर्शनकारियों पर असर डालने के बजाय उनके पीछे खड़े उस मतदाता वर्ग पर असर डालने लगा. संगरूर या मुजफ्फरनगर का वह किसान, जो कभी धरने के आसपास भी नहीं गया था, प्राइम टाइम में खुद को अलगाववादी के रूप में पेश किए जाते हुए सुन रहा था.
जब सत्तारूढ़ तंत्र ने इसका जवाब देने के लिए अपनी कहानी तैयार करने की कोशिश की, तब तक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि उसे संभालना आसान नहीं था. नवंबर 2021 में कृषि कानून वापस ले लिए गए. लेकिन नाराजगी उससे काफी ज्यादा समय तक बनी रही.
भागवत के मुंबई भाषण की लगभग हर बात इस तरह कही गई थी कि 2021 जैसी स्थिति दोबारा न बने. युवा प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रीय परिवार, अपने लोगों और अगली पीढ़ी के हिस्से के रूप में पेश किया गया. वे राष्ट्रविरोधी नहीं हैं.
संघ के सबसे भरोसेमंद भाषाई हथियार, यानी 'हम' और 'वे' के बीच की सीमा को जानबूझकर पीछे रखा गया और युवाओं के खिलाफ उसके इस्तेमाल की गुंजाइश पहले ही खत्म कर दी गई. 2021 का सबक लागू किया गया था.
हालांकि किसानों के साथ यह तुलना BJP को एक सीमा तक ही ले जाती है. किसान एक स्पष्ट पहचान वाला वोटर वर्ग थे. उनके पास यूनियनें, प्रवक्ता, बातचीत के लिए एक समिति और एक ऐसी मांग थी जिसे वापस लिया जा सकता था. सरकार तीनों कानून वापस लेकर एक दिन में आंदोलन खत्म कर सकती थी, भले ही पीछे हटना कितना भी अपमानजनक क्यों न होता.
Gen Z के पास ऐसा कुछ नहीं है. बातचीत के लिए बुलाने के लिए कोई एक प्रतिनिधि नहीं है, मानने के लिए कोई मांग-पत्र नहीं है और न ही कोई ऐसा हस्ताक्षर है जो भर्ती प्रक्रिया के टूटे हुए चक्र को ठीक कर सके. उन्हें राष्ट्रविरोधी कहने से एक अपमानजनक ठप्पा हट जाता है. लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं मिलता.
यह देखना भी जरूरी है कि यह सावधानी कहां बरती जा रही है और कहां नहीं. किसानों के मामले में लोगों को बदनाम करने वाला ठप्पा आखिरकार हटा दिया गया और छात्रों के मामले में उसे पहले से ही हटाया जा रहा है. दोनों ही ऐसे वोटर वर्ग हैं जिनकी पार्टी को जरूरत है और जिन पर अब भी उसका काफी हद तक प्रभाव है.
संघ ने सीख लिया है कि पूरी पीढ़ी को अविश्वसनीय या देशविरोधी बताना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है. उसने यह भी सीखा है कि हाशिये के समूहों और अपने हित साधने वाले संगठनों की सोशल मीडिया मुहिम के जाल में नहीं फंसना है.
अब उसने सिर्फ यह सावधानी बरतना सीखा है कि यह ठप्पा किस समूह पर लगाया जाए. असली परीक्षा यह नहीं होगी कि मुंबई के मंच से भागवत क्या कहते हैं. परीक्षा यह होगी कि किसी खराब खबर वाले दिन BJP का प्रवक्ता टेलीविजन पर क्या कहता है और जब पुरानी प्रतिक्रिया फिर लौटती है तो क्या इस पूरे तंत्र में कोई उसे सुधारता है.
हालांकि, BJP के लिए Gen Z के प्रति यह सहानुभूति दांव बढ़ा देती है. जब वैचारिक संगठन सार्वजनिक रूप से यह कह चुका है कि युवाओं का गुस्सा जायज है तो राजनीतिक शाखा के पास यह कहने का आसान विकल्प नहीं बचता कि युवाओं को गुमराह किया गया है.
अब सरकार को इस सहानुभूति को नतीजों में बदलना होगा. यह परीक्षा के ऐसे कैलेंडर में दिखेगा जो समय पर चलते हैं, ऐसे भर्ती बोर्डों में दिखेगा जो शुरू की गई प्रक्रिया को पूरा करते हैं और ऐसे नतीजों में दिखेगा जो तय समय पर आते हैं. युवा मतदाता सिर्फ अच्छी भाषा के बदले नतीजों को स्वीकार नहीं करने वाले.
यही इस पूरी बात का गहरा आधार है. पहले राजनीतिक निष्ठा परिवार, जाति, मोहल्ले या यूनियन से विरासत में मिलती थी. यह पीढ़ी निष्ठा विरासत में लेने के बजाय खुद तय करती है. जो अच्छा काम करता है, उसे इसका फायदा मिलता है.
यह पीढ़ी ज्यादा अपराधबोध के बिना अपना समर्थन बदल लेती है और पिछली पीढ़ियों के मतदाताओं की तुलना में वैचारिक पहचान से कहीं कम बंधी हुई है. यह राजनीति को लगभग पूरी तरह तत्काल घटनाओं के जरिए देखने वाली पहली पीढ़ी भी है, जहां हर कुछ घंटे में विश्वसनीयता की फिर से परीक्षा होती है और कल की अच्छी छवि आज अपने आप साथ नहीं चलती.
एक ऐसी BJP के लिए, जिसने एक दशक युवा और गतिशील छवि बनाने में लगाया है, यह गणित असहज करने वाला है. युवाओं से दोबारा जुड़ने के लिए एक और डिजिटल अभियान काफी नहीं होगा.
इसके लिए उन संस्थाओं में भरोसा फिर से कायम करना होगा जो वास्तव में 22 साल के युवा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं. इनमें परीक्षा कराने वाली संस्था, भर्ती बोर्ड, विश्वविद्यालय और रोजगार कार्यालय शामिल हैं.
RSS के लिए, जिसका प्रभाव हमेशा चुनावी चक्रों के बजाय लंबे समय तक किए जाने वाले सामाजिक काम पर टिका रहा है, भागवत के भाषण एक ऐसे बदलाव का संकेत देते हैं जिसमें वही विचारधारा ऐसी भाषा में रखी जा रही है जिसे Gen Z सुनने के लिए तैयार हो.
बात यह नहीं है कि अब अधिकार का कोई महत्व नहीं रह गया है. बात यह है कि अब अधिकार वरिष्ठता के आधार पर अपने आप नहीं मिलेगा बल्कि बातचीत के जरिए अर्जित करना होगा.
यह रणनीतिक बदलाव है या इससे ज्यादा स्थायी परिवर्तन, यह तय होने में कई साल लगेंगे. लेकिन इतना साफ है कि संघ ने बदलाव को महसूस कर लिया है और युवाओं से ऊपर से बात करने के बजाय उनसे बात करना शुरू कर दिया है.
मुश्किल हिस्सा भागवत के हाथ में नहीं है. वे बातचीत की शुरुआत कर सकते हैं लेकिन कोई खाली पद नहीं भर सकते और न ही परीक्षा व्यवस्था को ठीक कर सकते हैं. यह सब राजनीतिक भरोसे में बदलता है या नहीं, इसका फैसला कहीं कम भाषणबाजी वाली जगह पर होगा. भर्ती की सूचियों, नतीजों के कैलेंडर और रोजगार के आंकड़ों में, जिनकी वजह से यह बातचीत शुरू करने की जरूरत पड़ी थी.