विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए LTCG और STT में राहत देगी सरकार?
इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकाल चुके हैं. इसे देखते हुए केंद्र सरकार LTCG और STT की समीक्षा कर रही है

FPI इस साल अब तक शेयर बाजार से 3.1 लाख करोड़ रुपए निकाल चुके हैं (सांकेतिक तस्वीर)
पिछले दो हफ्तों से दलाल स्ट्रीट पर जिस सवाल की चर्चा थी, 27 अक्टूबर की शाम तक वह वित्त मंत्रालय के एजेंडे तक पहुंचता दिखने लगा. सरकारी सूत्रों के हवाले से आई खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार जल्द ही दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (LTCG) और प्रतिभूति लेन-देन कर (STT) पर बाजार से जुड़े लोगों के साथ बैठक कर सकती है.
भारतीय बाजारों पर पूरे साल दबाव डाल रही विदेशी निवेशकों की बिकवाली पर सरकार अगले केंद्रीय बजट तक इंतजार किए बिना कदम उठा सकती है. हालांकि इन संकेतों के साथ कुछ शर्तें भी जुड़ी हैं. शेयरों पर 12.5 फीसदी LTCG टैक्स की दर की समीक्षा पर चर्चा हो रही है लेकिन अभी कोई फैसला नहीं हुआ है और न ही इसकी समयसीमा तय की गई है.
खबरों के मुताबिक सरकार एक कम चर्चित सवाल पर भी विचार कर रही है: क्या भारत में AIके क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की मुश्किलें भी विदेशी पूंजी के बाहर जाने की एक वजह हैं?
बदलाव की मांग सत्तारूढ़ BJP के भीतर से भी उठ रही है. BJP नेता और अर्थशास्त्री गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने इंडिया टुडे से कहा, "पूंजी बाजार में सुधार के लिए कर व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है, खासकर STT और पूंजीगत लाभ कर में. यह सुधार जल्द जरूरी है वरना बाजार गंभीर संकट में पड़ सकता है."
27 अक्टूबर को पहले यह खबर सामने आई कि सरकार ने निवेशकों इंटरमीडियरी और कर विशेषज्ञों से दोनों करों पर राय मांगी है. खबरों के मुताबिक LTCG टैक्स की व्यवस्था में बदलाव पर विचार हो रहा है. इसमें घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेशकों के लिए 12.5 फीसदी की दर घटाने का विकल्प भी शामिल हो सकता है.
एक सरकारी अधिकारी के हवाले से कहा गया कि इस दर की तुलना प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की कर दरों से की जा रही है. पहले से चल रहे विचार-विमर्श के बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा. इससे एक दिन पहले भी एक अधिकारी के हवाले से कहा गया था कि कर व्यवस्था में बदलाव पर फैसला "जल्द आने की उम्मीद है". एक और तकनीकी सुझाव पर भी विचार हो रहा है. इसके तहत विदेशी निवेशकों के कर योग्य मुनाफे की गणना रुपए के बजाय डॉलर में की जा सकती है.
इस चर्चा की शुरुआत अक्टूबर के मध्य में हुई थी. 12 अक्टूबर को एसबीआई रिसर्च ने शेयरों पर LTCG टैक्स खत्म करने और लंबी अवधि के निवेश की समयसीमा एक साल से बढ़ाकर दो या तीन साल करने का सुझाव दिया. अगले दिन नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने LTCG टैक्स और STT पर चर्चा को सार्थक बताया. उन्होंने कहा कि वे निवेशकों की राय सुनना चाहती हैं.
सीतारमण ने बाजार से जुड़े लोगों की एक आम दलील को स्वीकार किया. उनका कहना है कि दोनों कर एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं और इनमें से केवल एक ही रहना चाहिए. हालांकि वित्त मंत्री ने कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई. उन्होंने कहा कि बजट बहुत करीब है इसलिए वे यह नहीं बता सकतीं कि किन बदलावों पर विचार करेंगी और किन पर नहीं. इसके बाद से वित्त मंत्रालय ने कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है.
इस जल्दबाजी के पीछे एक बड़ा आंकड़ा है. केंद्रीय डिपॉजिटरी सेवा लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजार से करीब 3.1 लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं. यह 2025 में पूरे साल निकाली गई 1.7 लाख करोड़ रुपए की रकम से लगभग दोगुना है.
इस साल निफ्टी करीब 13 फीसदी गिर चुका है. बताया जा रहा है कि अधिकारी कुछ व्यापक दबावों को लेकर भी चिंतित हैं. इनमें लगातार दो साल से बाजार का कमजोर प्रदर्शन, वेतन में धीमी बढ़ोतरी, बाजार में खुदरा निवेशकों की बढ़ती संख्या और इस सवाल पर संदेह शामिल हैं कि क्या घरेलू म्यूचुअल फंड में आने वाला पैसा विदेशी निवेशकों की बिकवाली की भरपाई करता रह सकता है.
जिन करों पर चर्चा हो रही है, वे नए नहीं हैं लेकिन उनकी दरें बढ़ी हैं. एक साल से ज्यादा समय तक रखे गए सूचीबद्ध शेयरों से होने वाले दीर्घकालिक मुनाफे पर सालाना 1.25 लाख रुपए से अधिक की रकम पर 12.5 फीसदी टैक्स लगता है. इसमें महंगाई के असर को समायोजित करने का लाभ नहीं मिलता. सरचार्ज और उपकर जोड़ने पर प्रभावी दर करीब 15 फीसदी हो जाती है.
जुलाई 2024 के बजट तक यह दर 10 फीसदी थी. STT हर लेन-देन पर लगता है चाहे निवेशक को मुनाफा हुआ हो या नुकसान. बजट 2026 में 1 अप्रैल से वायदा और विकल्प कारोबार पर इसकी दर बढ़ा दी गई. दोनों कर घरेलू और विदेशी निवेशकों पर समान रूप से लागू होते हैं.
टैक्स में राहत देने की दलील दूसरे देशों से तुलना पर आधारित है. कुछ शर्तों के अधीन, विदेशी निवेशकों को अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर, हांगकांग, संयुक्त अरब अमीरात, जापान और कनाडा में सूचीबद्ध शेयरों पर आम तौर पर पूंजीगत लाभ कर नहीं देना पड़ता.
ताइवान में भी दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर नहीं है. इस साल वहां वैश्विक निवेशकों ने बड़ी मात्रा में पैसा लगाया है. ताइवान इसके बजाय लेन-देन पर 0.3 फीसदी कर लगाता है. भारत में दोनों तरह के कर लगते हैं. बाजार से जुड़े लोग इसे दोहरा कराधान कहने लगे हैं.
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के पूर्व सदस्य अखिलेश रंजन ने इसका ऐतिहासिक संदर्भ दिया है. उनका तर्क है कि STT आंशिक रूप से इसलिए लाया गया था ताकि लेन-देन का रिकॉर्ड रखा जा सके. उस समय दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पर कर नहीं लगता था. उनका कहना है कि अब जब LTCG टैक्स फिर से लागू हो चुका है तो STT बनाए रखने का कोई ठोस कारण नहीं है.
केपीएमजी के वरिष्ठ सलाहकार सुधीर कपाड़िया ने अलग सुझाव दिया है. उनका कहना है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को पूंजीगत लाभ कर से छूट दी जाए और राजस्व में होने वाले नुकसान को सीमित रखने के लिए STT में बदलाव किया जाए.
मास्टर कैपिटल सर्विसेज के निदेशक पुनीत सिंघानिया चरणबद्ध बदलाव के पक्ष में हैं. उनके मुताबिक, पहले STT घटाया जाए और फिर सरकार की वित्तीय स्थिति को देखते हुए LTCG टैक्स में राहत दी जाए.
डॉलर में मुनाफे की गणना करने का सुझाव एक खास समस्या का समाधान कर सकता है. विदेशी फंड अपने खातों का हिसाब डॉलर में रखते हैं लेकिन उन्हें रुपए में हुए मुनाफे पर टैक्स देना पड़ता है. जब रुपया कमजोर होता है तो किसी फंड को ऐसे मुनाफे पर भी कर देना पड़ सकता है जो उसकी अपनी मुद्रा यानी डॉलर में हुआ ही नहीं हो.
आयकर अधिनियम, 2025 में पहले से ही गैर-सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों के शेयर बेचने वाले अनिवासियों को मुद्रा विनिमय के असर से राहत देने का प्रावधान है. लेकिन सूचीबद्ध शेयर रखने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को यह सुविधा नहीं मिलती.
इस मामले में एक हालिया उदाहरण भी है. इस साल 1 अप्रैल से सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के निवेश को पूंजीगत लाभ कर, ब्याज कर और स्रोत पर कर कटौती से छूट दी है. राहत के समर्थक इसे इस बात का प्रमाण मानते हैं कि खास तरह के निवेश के लिए छूट दी जा सकती है.
राहत के प्रति सावधानी बरतने की दलील देने वाले सबसे पहले राजस्व का सवाल उठाते हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में शेयरों पर LTCG टैक्स से 1.29 लाख करोड़ रुपए मिले जबकि उससे पिछले साल यह रकम 72,249 करोड़ रुपए थी. 1 अप्रैल से 14 अक्टूबर के बीच STT से होने वाली कमाई 52 फीसदी बढ़कर 46,840 करोड़ रुपए हो गई. इसी दौरान केंद्र सरकार को उर्वरक सब्सिडी बढ़ाने और सामाजिक क्षेत्र पर खर्च करने की जरूरत भी है.
STT की आलोचना करने वाले रंजन भी LTCG टैक्स को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं. उनका कहना है कि AI की वजह से श्रम से होने वाली आय पर कर वसूली प्रभावित हो सकती है. ऐसे में पूंजी से होने वाली आय को टैक्स से पूरी तरह छूट देना जोखिम भरा होगा.
निवेशकों के बीच समानता का सवाल भी है. बताया जाता है कि अधिकारी विदेशी और घरेलू निवेशकों पर अलग-अलग दरों से कर लगाने को लेकर सतर्क हैं. इसकी एक वजह राउंड ट्रिपिंग का खतरा है. इसमें भारतीय पैसा विदेश भेजकर दोबारा विदेशी निवेश के रूप में भारत लाया जाता है. हालांकि हर कोई यह नहीं मानता कि भारत की कर व्यवस्था दूसरे देशों से अलग है.
पीडब्ल्यूसी के आंकड़ों के मुताबिक, ब्राजील और मेक्सिको समेत कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं में विदेशी निवेशकों को पूंजीगत लाभ पर 20 फीसदी या उससे अधिक कर देना पड़ता है. अगस्त में ही सरकार ने लोकसभा को बताया था कि STT की समीक्षा का कोई प्रस्ताव नहीं है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि विदेशी निवेशकों के बाहर जाने की असली वजह क्या है. इस साल भारत में शेयरों पर कर की दरें नहीं बदली हैं फिर भी विदेशी निवेशकों की निकासी लगभग दोगुनी हो गई है. इस दौरान जो बदला है वह यह कि विदेशी निवेश के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे दूसरे बाजारों की तुलना में भारत का बाजार कितना आकर्षक रह गया है.
वैश्विक निवेशक AI से जुड़े शेयरों में तेजी का फायदा उठाने के लिए ताइवान और दक्षिण कोरिया की ओर गए हैं. इस साल रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले करीब 5.6 फीसदी गिरी है और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर यील्ड बढ़ा है. गिरावट के बाद भी निफ्टी का मूल्यांकन कमाई के करीब 20.4 गुना पर है जबकि जापान में यह 19.9 गुना है.
STT घटाने के पक्ष में रहने वाले सिंघानिया का कहना है कि 2024 में LTCG टैक्स बढ़ने पर कुछ विदेशी फंडों ने अपनी हिस्सेदारी घटाई थी लेकिन निवेश के प्रवाह पर बाजार का मूल्यांकन और वैश्विक ब्याज दरों का असर ज्यादा पड़ा. उनके मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक "कमाई में बढ़ोतरी, रुपए की स्थिरता और शेयरों के मूल्यांकन को ज्यादा महत्व देते हैं".
रुपए के मामले में अग्रवाल का कहना है कि मौजूदा स्थिति में रिजर्व बैंक का दखल "शायद बहुत प्रभावी न हो". उन्होंने कहा, "रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में रुपए का कोई खास स्तर तय करना शामिल नहीं है." केंद्रीय बैंक केवल मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की कोशिश करता है.
वित्त मंत्री सीतारमण का मंत्रालय क्या फैसला करता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार किस समस्या का समाधान करना चाहती है. अगर मकसद विदेशी पूंजी को वापस लाना है तो सीमित दायरे वाले उपाय कारगर हो सकते हैं. इनमें डॉलर में मुनाफे की गणना, सिर्फ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को राहत देना या STT में बदलाव करना शामिल है.
इन उपायों पर अपेक्षाकृत कम खर्च आएगा. हालांकि सिर्फ विदेशी निवेशकों को राहत देने पर घरेलू और विदेशी निवेशकों के साथ समान व्यवहार का सवाल उठेगा.
अगर सरकार घरेलू निवेशकों का भरोसा भी बढ़ाना चाहती है तो व्यापक स्तर पर कर दर घटाने का विकल्प सामने आएगा. इससे सरकारी राजस्व को कहीं ज्यादा नुकसान हो सकता है. साथ ही, मुनाफे के पहले 1.25 लाख रुपए पर पहले से ही छूट है. ऐसे में कर दर घटाने का फायदा निवेशक को उसके मुनाफे के आकार के हिसाब से बढ़ता जाएगा.
एक सवाल ऐसा भी है, जिसका जवाब कोई कर बदलाव नहीं दे सकता. अगर विदेशी निवेशक AI से जुड़े शेयरों में पैसा लगा रहे हैं और कमजोर रुपए से बच रहे हैं तो कर में राहत मिलने से कर चुकाने के बाद उनका मुनाफा जरूर बढ़ेगा. लेकिन जब तक इन वजहों में बदलाव नहीं आता, तब तक निवेश का रुख बदलना जरूरी नहीं है.
राहत के समर्थक कर को कई उपायों में से एक मानते हैं. अगर निवेश के फैसलों पर लागत और कर व्यवस्था का कुछ भी असर पड़ता है तो सुधार भारत को निवेश के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा हो सकता है.
अग्रवाल भी मानते हैं कि कर में बदलाव ही पूरा समाधान नहीं है. उनके मुताबिक, व्यापार की मजबूती विनिर्माण क्षेत्र पर निर्भर करती है. सरकार व्यापार और आपूर्ति शृंखला को बेहतर बनाने के लिए द्विपक्षीय व्यापार समझौतों का इस्तेमाल कर रही है. लेकिन विनिर्माण के मामले में "प्रतिस्पर्धी बनने का कोई विकल्प नहीं है".
अग्रवाल के मुताबिक भूमि और पूंजी के बाजारों में सुधार, खासकर ऋण बाजार में, "अभी जारी है". सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए वे दो अहम सुधारों की जरूरत बताते हैं. पहला, मध्यम उद्यमों को सूक्ष्म और लघु उद्यमों से अलग करना. दूसरा, व्यापार और सेवा क्षेत्र को विनिर्माण से अलग रखना.
आखिरी सवाल समय का है. केंद्रीय बजट से पहले कदम उठाने पर बाजार को संकेत मिलेगा कि सरकार उसकी चिंताओं पर प्रतिक्रिया दे रही है. वहीं बजट तक इंतजार करने से सरकार को जारी विचार-विमर्श के लिए समय मिलेगा. आम तौर पर करों में बदलाव बजट के दौरान ही किए जाते हैं.
आने वाले हफ्तों में स्पष्ट होगा कि सरकार किस दिशा में बढ़ रही है. क्या वित्त मंत्रालय औपचारिक रूप से बैठक बुलाएगा? अगर बुलाएगा तो किन लोगों को आमंत्रित करेगा? क्या डॉलर में मुनाफे की गणना का सुझाव घरेलू और विदेशी निवेशकों के साथ समान व्यवहार की बहस में टिक पाएगा? क्या 1 फरवरी, 2027 यानी बजट के दिन से पहले कोई फैसला होगा?
इन सवालों के जवाब नवंबर के विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के आंकड़ों और रुपए की अगली चाल के साथ सामने आएंगे. ये संकेत भी करों में बदलाव के अलावा उतना ही बता सकते हैं कि विदेशी पूंजी को भारत में वापस लाने के लिए क्या जरूरी है.