जब 1998 में चुनाव आयोग ने एग्जिट पोल पर पाबंदी लगाई...
इंडिया टुडे मैगजीन में 1998 के अंक में विशेषज्ञों के हवाले से स्टोरी छपी थी कि आखिर एग्जिट पोल पर कितना भरोसा किया जा सकता है और उसी साल चुनाव आयोग ने एग्जिट और ओपिनियन पोल पर पाबंदी भी लगाई थी

जून की पहली तारीख को लोकसभा चुनाव 2024 के सातवें चरण का मतदान खत्म होने के साथ ही शुरू हो जाएगा एग्जिट पोल का सिलसिला. हर चैनल अपनी सहयोगी सर्वे एजेंसियों के हवाले से बताएंगे कि किस पार्टी की सरकार बनने जा रही है. कई बार ये आकलन सही हो जाते हैं तो कई बार असली नतीजे इसके आस-पास भी नहीं होते.
मगर ये एग्जिट पोल का सिलसिला शुरू कहां से हुआ और विशेषज्ञों का इसके बारे में क्या कहना है? इंडिया टुडे मैगजीन में 1998 के अंक में विशेषज्ञों के हवाले से स्टोरी छपी थी कि आखिर इन एग्जिट पोल पर कितना भरोसा किया जा सकता है.
लोकतांत्रिक होने के लिए, किसी भी लोकतंत्र को मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा से प्रतिनिधियों का चुनाव सुनिश्चित करना चाहिए. इसलिए संविधान और देश का कानून मतदाताओं को दूसरों से प्रभावित हुए बिना अपना नेता चुनने की आजादी देता है. भारत में चुनाव की आचार संहिता के मुताबिक मतदाताओं के मतदान केंद्रों पर जाने से 24 घंटे पहले और मतदान के वक्त हर तरह के प्रचार और अभियान बंद हो जाने चाहिए जिससे मतदाता को किसी भी तरीके से अंतिम वक्त में प्रभावित ना किया जा सके.
इंडिया टुडे मैगजीन के 12 जनवरी, 1998 के अंक में प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया के तत्कालीन अध्यक्ष पीबी सावंत और चुनाव विशेषज्ञ दोराब आर. सोपारीवाला ने ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल जैसे चुनावी सर्वेक्षणों के बारे में विस्तार से लिखा था. पीबी सावंत लिखते हैं, "यह सर्वविदित कि तथाकथित प्री-पोल सर्वे और एग्जिट-पोल सर्वे रिपोर्ट अक्सर फर्जी होते हैं और कुछ राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं. अधिकांश लोकतंत्रों में मीडिया के लिए नियम यह है कि ऐसी रिपोर्ट की शुरुआत में स्पष्ट रूप से यह बताया जाना चाहिए कि सर्वेक्षण किसने किया है, किस एजेंसी ने इसे करवाया है, चुने गए नमूने का आकार और प्रकृति, नमूने के चयन की विधि और निष्कर्षों में संभावित त्रुटि की संभावना."
वहीं चुनाव से पहले छपने वाले ओपिनियन पोल के बारे में दोराब आर. सोपारीवाला का कहना था, "ओपिनियन पोल रणनीतिक मतदान में मदद करते हैं. उदाहरण के लिए, अगर सर्वेक्षण से पता चलता है कि मेरी पसंदीदा पार्टी के उम्मीदवार के जीतने की संभावना नहीं है, तो मैं अपना वोट अपनी दूसरी पसंद को दे सकता हूं. लेकिन मतदाता को जानकारी देने में क्या गलत है जिससे वह तय कर सके कि उसके लिए सबसे अच्छा क्या है?"
भारत में पहला एग्जिट पोल 1957 में आयोजित किया गया था और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन ने दूसरे लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान के बाद सर्वेक्षण किया था. 1996 में दूरदर्शन ने देश भर में एग्जिट पोल आयोजित करने के लिए सीएसडीएस को साथ लिया था. इसके बाद, सर्वे आयोजित करने का काम शुरू हुआ और कई खिलाड़ी इसमें शामिल हुए, जिनमें से अधिकांश ने टीवी चैनलों के साथ गठजोड़ किया.
एग्जिट पोल के लिए पीबी सावंत ने 1998 के अपने लेख में लिखा था, "ओपिनियन पोल्स में मतदाताओं को प्रभावित करने की बहुत संभावना रहती है लेकिन एग्जिट पोल्स के साथ ऐसा नहीं है. हालांकि कई ऐसी रिपोर्ट्स आई हैं जिनमें पैसे लेकर एग्जिट पोल चलाने जैसी बातें की गई थी. निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति और संस्था का है, ना कि केवल सरकार, राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग और प्रेस काउंसिल का."
1998 में ही ओपिनियन और एग्जिट पोल्स को अवैज्ञानिक बताते हुए बैन करने की मांग कुछ राजनैतिक पार्टियों ने की थीं. 1998 के लोकसभा चुनावों में ही पहली बार चुनाव आयोग ने ओपिनियन और एग्जिट पोल पर बैन लगाया था. उस दौरान डॉ एमएस गिल देश के मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे. इसपर देश के बड़े मीडिया संस्थानों ने अपना विरोध दर्ज करते हुए इसे 'फ्री स्पीच' का हनन बताया था.
इसपर दोराब आर. सोपारीवाला ने लिखा, "चुनावी नतीजों के पूर्वानुमानों पर प्रतिबंध लगाना बेहद गलत और पीछे ले जाने वाला कदम है. भले ही ये कानूनी रूप से संभव हो मगर सही तो नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 19(2) के किस भाग के तहत प्रतिबंध की मांग की जाएगी? क्या यह 'राज्य की सुरक्षा' या 'सार्वजनिक व्यवस्था' के कारणों से होगा या यह 'शालीनता या नैतिकता' के लिए होगा?"
उन्होंने आगे कहा, जहां तक एग्जिट पोल का सवाल है, उन पर प्रतिबंध लगाने का कोई मामला नहीं है. बेशक, मतदान पूरा होने तक परिणामों को रोकने का मामला हो सकता है, जैसा कि चुनावी सर्वे करने वाले अक्सर स्वेच्छा से करते हैं.
पीबी सावंत ने भी चुनावी सर्वे पर बैन वाली बात पर लिखा, "प्रेस काउंसिल अधिनियम की धारा 13(2)(बी), (सी) और (डी) के अनुपालन में, पीसीआई ने पत्रकारिता आचार संहिता के हिस्से के रूप में 1996 की शुरुआत में ही दिशा-निर्देश तैयार कर लिए थे. यह कहना गलत है कि इस मामले में पीसीआई का कोई कानूनी अधिकार क्षेत्र नहीं है. पीसीआई की आचार संहिता संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए कानून और प्रतिबंधों से परे है."
1998 के बाद चुनाव आयोग ने 1999 के लोकसभा चुनावों से पहले इन दिशा-निर्देशों को फिर से लागू करने की कोशिश की. लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने इसका पालन करने से इनकार कर दिया, जिससे चुनाव आयोग को अदालत का रुख करना पड़ा. मामले को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच को भेजा गया, जिसने इन दिशा-निर्देशों की संवैधानिक वैधता पर चिंता जाहिर की. पीठ ने जब टिप्पणी की कि चुनाव आयोग वैधानिक मंजूरी के अभाव में ऐसे दिशा-निर्देशों को लागू नहीं कर सकता, तो आयोग ने अपनी योजना वापस ले ली.
2004 में, चुनाव आयोग ने छह राष्ट्रीय दलों और 18 राज्य दलों के समर्थन के साथ कानून मंत्रालय से एक निश्चित अवधि के दौरान एग्जिट और ओपिनियन पोल दोनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन की मांग की गई. सिफारिश को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया, और फरवरी 2010 में, अधिनियम में धारा 126 (ए) की शुरूआत के माध्यम से केवल एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगाए गए.
2019 के लोकसभा चुनावों में एग्जिट पोल्स ने एनडीए के लिए लगभग 285 सीटों की भविष्यवाणी की थी लेकिन गठबंधन ने 353 सीटें जीती थीं. इसमें अकेले भाजपा की ही 303 सीटें थीं. वहीं 2014 के लोकसभा चुनावों में, एनडीए को लगभग 257-340 सीटें जीतने का अनुमान था लेकिन एनडीए ने 336 सीटें जीतीं. पिछले दोनों लोकसभा के एग्जिट पोल्स और असल नतीजों में दूरी कम होती नजर आती है. सीएसडीएस के निर्देशक संजय कुमार के मुताबिक, इसका कारण चुनावी सर्वे का बढ़ता सैंपल साइज है.
2024 के चुनावों की बात करें तो नियमों के अनुसार, मतदान के अंतिम चरण यानी 1 जून को शाम 6:30 बजे से पहले एग्जिट पोल डेटा जारी नहीं किया जा सकता है. यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126ए के तहत तय किया गया है. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126ए में कहा गया है, "कोई भी व्यक्ति चुनाव आयोग की तरफ से बताई गई अवधि के दौरान कोई एग्जिट पोल आयोजित नहीं करेगा और प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से एग्जिट पोल के परिणाम को प्रकाशित या प्रचारित नहीं करेगा या किसी अन्य तरीके से प्रसारित नहीं करेगा."
धारा 126ए के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले के लिए कानूनन दो साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.