परीक्षा सुधार समिति: IIT मद्रास प्रमुख कामाकोटि बोले, पेपर तैयार करने का चरण सबसे बड़ी चुनौती
परीक्षा प्रणाली को अधिक भरोसेमंद बनाने के लिए नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में गठित परीक्षा सुधार समिति ने काम शुरू कर दिया है. IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटी का मानना है कि तकनीक या लॉजिस्टिक्स से ज्यादा बड़ी चिंता मनुष्यों से जुड़ी है

राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) UG 2026 का पेपर लीक होने और उसके बाद दोबारा परीक्षा कराए जाने से देशभर में विवाद खड़ा हो गया. Gen-Z प्रोटेस्ट ने इस विवाद को और आगे बढ़ाने का काम किया. इसके कारण भारतीय परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता को लेकर नए सिरे से सार्वजनिक बहस शुरू हो गई.
जब भी किसी राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा में पेपर लीक के आरोप लगते हैं तो सबसे पहले तकनीक, परीक्षा कराने की व्यवस्था और परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं. इस बार भी ऐसा ही हुआ है. केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार के लिए एक उच्चस्तरीय टास्कफोर्स बनाई है.
इस टास्कफोर्स की अध्यक्षता इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी कर रहे हैं. इस टास्कफोर्स से लोगों को काफी उम्मीदें हैं.
IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटि इस टास्कफोर्स के सदस्य हैं. कामाकोटि कहते हैं, "इस समिति का एक ही उद्देश्य है. देश में मजबूत, पारदर्शी और ऐसी सुरक्षित परीक्षा प्रणाली तैयार करना जिसमें पेपर लीक न हो." हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह यह बात अपनी व्यक्तिगत क्षमता में कह रहे हैं क्योंकि समिति की पहली बैठक अभी तक नहीं हुई है.
टास्कफोर्स के अन्य सदस्यों में पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो प्रमुख तपन डेका, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल और बिहार के पूर्व मुख्य सचिव अमृत लाल मीणा शामिल हैं.
प्रोफेसर कामाकोटि के मुताबिक, परीक्षा प्रणाली की असली कमजोरी परीक्षा प्रक्रिया की शुरुआत यानी पेपर तैयार करने के प्रोसेस में ही होती है. वे कहते हैं, "पिछले कुछ दशकों में भारत की परीक्षा प्रणाली में बड़ा बदलाव आया है. आज सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा कराना नहीं बल्कि उसे इतने बड़े स्तर पर कराना है. जब मैंने 1985 में JEE की परीक्षा दी थी तब करीब 5,000 कैंडिडेट थे. आज लगभग 15 लाख छात्र इस परीक्षा में शामिल होते हैं."
आज परीक्षा प्रक्रिया में एन्क्रिप्शन, बायोमेट्रिक सत्यापन, CCTV निगरानी और मेटल डिटेक्टर जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. इसके बावजूद हाल के विवादों से पता चलता है कि केवल तकनीक से इस तरह की समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता. हाल के पेपर लीक मामलों का जिक्र करते हुए प्रोफेसर कामाकोटि कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती पेपर तैयार करने वाले व्यक्ति का भरोसेमंद होना है क्योंकि पूरी परीक्षा प्रक्रिया का भरोसा उसी पर टिका होता है."
उनके मुताबिक, आमतौर पर चर्चा इस बात पर होती है कि पेपर कहां से लीक हुआ लेकिन इस पर कम ध्यान दिया जाता है कि वह कैसे लीक हुआ? उनका मानना है कि टास्कफोर्स की सिफारिशें पेपर लीक कैसे होती है, इसी स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकती हैं.
मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ समिति परीक्षा प्रक्रिया के हर चरण की समीक्षा करेगी. इसमें एक सत्र और कई सत्रों में होने वाली परीक्षाएं, कई भाषाओं में होने वाले प्रश्नपत्र और अलग-अलग स्तर की परीक्षाएं शामिल हैं. इसके आधार पर समिति अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक सुधारों की सिफारिश करेगी.
क्या भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से इस समस्या का समाधान हो सकता है? प्रोफेसर कामाकोटि का मानना है कि पूरी तरह नहीं. उनका कहना है कि AI प्रश्नपत्रों के अनुवाद या प्रशासनिक कामों में मदद कर सकता है लेकिन जवाबदेही इंसानों की ही रहेगी. वे कहते हैं, "इस प्रक्रिया में हमेशा कोई न कोई इंसान शामिल रहेगा. असली सवाल है कि उस इंसान का चयन कैसे किया जाए?"
उम्मीद है कि टास्कफोर्स इस साल के अंत में शुरू होने वाले अगले परीक्षा सत्र से पहले अपनी सिफारिशें सौंप देगी. अगर उसकी सिफारिशें सफल रहीं, तो भारत की परीक्षा सुधार प्रक्रिया का अगला चरण सिर्फ नई तकनीक जोड़ने तक नहीं बल्कि व्यवस्था के केंद्र में मौजूद लोगों को अधिक भरोसेमंद बनाने पर आधारित होगा.