ग्रामर और वोकैबुलरी से आगे बढ़कर अंग्रेजी सीखने की जरूरत क्यों?

अंग्रेजी सीखने का मकसद ग्रामर और परीक्षाओं तक सीमित नहीं है. अब छात्रों में अपनी बात कहने का आत्मविश्वास, गंभीरता से सोचने और रोजमर्रा की जिंदगी में बातचीत करने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है

अंग्रेजी जानना अब काफी नहीं है. AI, तुरंत अनुवाद करने वाली तकनीक और बदलती नौकरियों की दुनिया में असली फायदा इस बात से मिल सकता है कि छात्र अपनी सीखी हुई भाषा का इस्तेमाल कैसे कर पाते हैं. क्या हो अगर जो बच्चा टेक्स्टबुक में ग्रामर के सारे नियम जानता हो लेकिन इंटरव्यू में अपना परिचय देने के लिए कहे जाने पर शांत पड़ जाए? या फिर अंग्रेजी में अच्छे अंक लाने वाला कोई छात्र कक्षा में अपनी बात समझाने, सवाल पूछने या किसी से असहमति जताने में मुश्किल महसूस करे? शिक्षा अब इस कमी को नजरअंदाज नहीं कर सकती.

सालों तक अंग्रेजी सीखने का मुख्य जोर शब्दावली (वोकैबुलरी), व्याकरण (ग्रामर), समझ और परीक्षाओं तक ही सीमित था लेकिन क्लासरूम के बाहर की दुनिया कुछ अलग मांग कर रही है: क्या आप संवाद (बातचीत) कर सकते हैं? क्या आप सुन सकते हैं? क्या आप तुरंत सोचकर फैसला ले सकते हैं? क्या आप किसी विचार को स्पष्ट रूप से समझा सकते हैं, उन लोगों के साथ काम कर सकते हैं जो आपसे असहमत हैं और लोगों से जुड़ाव बनाए रखते हुए तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं?

बर्लिंगटन इंग्लिश इंडिया एंड साउथईस्ट एशिया के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित बावेजा के अनुसार, यह बदलाव एक बेहद सरल बात से शुरू होता है : सवाल पूछना. अब जानकारी ढूंढना मुश्किल नहीं है. एक छात्र कुछ ही सेकंड में जवाब खोज सकता है, AI से उसे समझाने के लिए कह सकता है या लगभग किसी भी विषय पर वीडियो देख सकता है. मुश्किल काम यह तय करना है कि वह जानकारी उपयोगी, भरोसेमंद और प्रासंगिक है या नहीं.

बावेजा कहते हैं,''यहीं पर उत्सुकता और क्रिटिकल थिंकिंग महत्वपूर्ण हो जाती हैं." छात्रों को सिर्फ जवाब दोहराने के बजाय यह पूछने की आदत डालनी होगी कि ऐसा क्यों है, कैसे है और अगर ऐसा हो तो क्या होगा. यह एक ऐसा बदलाव है जो वर्कप्लेस की जरूरतों को दिखाता है. 

द फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, कंपनियों के लिए कर्मचारियों में सबसे जरूरी क्षमता किसी बात का विश्लेषण करने की है. इसके बाद मुश्किल हालात में खुद को संभालने, बदलाव के साथ ढलने और तेजी से काम करने की क्षमता आती है. जबकि रचनात्मक सोच भी सूची में ऊपर है.

एक और समस्या है. छात्र अक्सर जवाब जानते हैं लेकिन उसे बोलने से डरते हैं. इस बात का डर कि कोई उनका मजाक उड़ाएगा, गलती सुधारेगा या उन्हें गलत समझेगा, क्लासरूम में चुप्पी पैदा कर सकता है. कुछ गिने-चुने छात्र ही बार-बार हाथ उठाकर जवाब देते हैं. बाकी छात्र धीरे-धीरे चुप रहना सीख जाते हैं और अपनी बात कहने से बचने लगते हैं.

बावेजा अनुभव से सीखने (एक्सपेरिमेंटल लर्निंग) के महत्व की ओर इशारा करते हैं. उनके संगठन ने 200 से ज्यादा स्कूलों में सर्वे किया, जिसमें 4,000 से अधिक शिक्षक शामिल हुए. सर्वे में अनुभव से सीखने और सीखना कैसे सीखें, जैसे तरीकों को अपनाने का समर्थन किया गया.

इसका तर्क सीधा है. आत्मविश्वास इस बात से नहीं आता कि आपको बताया जाए कि आप सक्षम हैं बल्कि किसी काम को करने, उसमें गलती होने, फीडबैक प्राप्त करने और फिर से प्रयास करने से आता है. इसका मतलब है कि छात्रों को बहस, प्रेजेंटेशन, रोल प्ले, समूह में प्रोजेक्ट और समस्याओं को हल करने वाली गतिविधियों में ज्यादा हिस्सा लेना चाहिए.

संवाद करने का मतलब सिर्फ अच्छी तरह बोलना नहीं है. क्या आप किसी की बात बीच में टोके बिना सुन सकते हैं? क्या आप दूसरे व्यक्ति का नजरिया समझ सकते हैं? क्या आप असहमति जताते हुए बात को निजी लड़ाई बनने से रोक सकते हैं? बावेजा कहते हैं, “स्कूलों में बहस, रोल प्ले, ग्रुप प्रोजेक्ट, साथियों से फीडबैक और मिलकर समस्याएं सुलझाने जैसी गतिविधियों के जरिए ये कौशल विकसित किए जा सकते हैं.”

सीखने की प्रक्रिया स्कूल के गेट पर खत्म नहीं होती. परिवार के साथ बातचीत, कहानियां सुनना, घूमना-फिरना, संगीत, आसपास की चीजों पर ध्यान देना और रोजमर्रा की घटनाओं पर चर्चा करना, ये सभी बच्चों को अपनी बात कहने का आत्मविश्वास देते हैं. अंग्रेजी को अब सिर्फ विशेषाधिकार या पढ़ाई में अच्छे प्रदर्शन से जोड़कर नहीं देखा जा रहा है. इसे एक ऐसे कौशल के रूप में देखा जा रहा है जो आगे बढ़ने के नए रास्ते खोल सकता है.

बावेजा मर्सर की इंडियाज ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स 2025 का हवाला देते हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, नौकरी के लिए आवेदन करने वाले कुल ग्रेजुएट्स में से 42.6 फीसदी को रोजगार के लिहाज से योग्य पाया गया. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कंपनियां बातचीत करने, किसी बात को परखकर सोचने और नई चीजें सीखने के साथ बदलती जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालने की क्षमता चाहती हैं.

इसका मतलब यह नहीं है कि अंग्रेजी ही किसी व्यक्ति की समझ या नौकरी पाने की योग्यता तय करती है. लेकिन अंग्रेजी में अपनी बात कह पाने से इंटरव्यू देने, आगे की पढ़ाई करने, दूसरी जगहों पर काम करने और नौकरी पाने के मौके प्रभावित हो सकते हैं. यह बात खासकर बड़े शहरों से बाहर रहने वाले छात्रों के लिए अहम है.

टियर-2 और टियर-3 शहरों में रहने वाले छात्रों के पास तकनीकी कौशल हो सकता है और वे किसी समस्या को हल करना भी जानते हो सकते हैं. लेकिन उन्हें ग्राहकों को अपनी बात समझाने, निर्देशों को समझने या ऑफिस में होने वाली चर्चाओं में हिस्सा लेने में मुश्किल हो सकती है.

हालांकि इसका हल भारत की कई भाषाओं की जगह अंग्रेजी को अपनाना नहीं है. बल्कि अंग्रेजी को एक और साधन के रूप में जोड़ना है. तो अब अंग्रेजी की क्लास कैसी होनी चाहिए? रटने पर कम और इस्तेमाल करने पर ज्यादा जोर होना चाहिए. गलतियां करने का डर कम होना चाहिए और छात्रों को गलतियां करने के ज्यादा मौके मिलने चाहिए. ध्यान इस बात पर कम होना चाहिए कि “आप कितनी अंग्रेजी जानते हैं?” और इस बात पर ज्यादा कि “आप जितनी अंग्रेजी जानते हैं, उससे क्या कर सकते हैं?”

बावेजा के मुताबिक, अगले पांच सालों में उनका लक्ष्य अंग्रेजी की ऐसी पढ़ाई को बढ़ावा देना है जो छात्रों की क्षमताओं को विकसित करने पर केंद्रित हो, जिसमें अनुभव से सीखने और भाषा के सही इस्तेमाल पर जोर दिया जाए.

इसके लिए शिक्षकों को बेहतर ट्रेनिंग देने, तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने और ज्यादा से ज्यादा छात्रों तक इसकी पहुंच बनाने की जरूरत है. क्योंकि आने वाले समय में भाषा सीखने का मकसद ऐसे छात्रों को तैयार करना नहीं होगा जो एकदम सही अंग्रेजी बोलते हों. बल्कि ऐसे छात्र तैयार करना होगा, जिनमें सवाल पूछने की जिज्ञासा हो, अपनी बात कहने का आत्मविश्वास हो, दूसरों की बात सुनने और समझने की क्षमता हो और लगातार सीखते रहने के लिए खुद को बदलती परिस्थितियों के हिसाब से ढालने की काबिलियत हो.

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