दिल्ली और लद्दाख के बीच क्यों बढ़ता जा रहा अविश्वास?
संवैधानिक सुरक्षा और ज्यादा अधिकारों की मांग को लेकर लद्दाख के नेताओं और केंद्र के बीच बातचीत ठप है. इस बीच पर्वतीय परिषदों के अधिकारों में बदलाव से यह आशंका बढ़ी है कि दिल्ली लोगों की सहमति के बिना क्षेत्र का राजनीतिक भविष्य तय कर रही है

लद्दाख (फाइल फोटो)
लेह में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान चार लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की घटना के एक साल बाद, लद्दाख की सिविल सोसायटी (नागरिक समाज) और केंद्र सरकार के बीच टकराव और जटिल हो गया है.
नाराजगी अब भी कायम है. बातचीत ठप पड़ गई है. संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर सहमति नहीं बन पाई है लेकिन नई दिल्ली ने इस केंद्र शासित प्रदेश में स्थानीय शासन व्यवस्था में बड़े बदलाव करने शुरू कर दिए हैं.
लद्दाख के राजनीतिक नेतृत्व और नागरिक समाज के लिए समस्या यही है कि ये बदलाव किस समय किए जा रहे हैं. हाल के हफ्तों में केंद्र सरकार ने लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (LAHDC) व्यवस्था को सभी आठ जिलों में लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं. इनमें हाल ही में बना संकू जिला भी शामिल है.
सरकार ने परिषदों को नियंत्रित करने वाले 1997 के कानून में संशोधन किया है और चुनावी क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण किया है. 21 अक्टूबर को करगिल पर्वतीय परिषद को भंग करने के बाद उपराज्यपाल की अगुवाई वाले प्रशासन ने आठ नई पर्वतीय परिषदों के लिए 100 निर्वाचित निर्वाचन क्षेत्रों की अधिसूचना जारी की. इसी दिन राज्य निर्वाचन आयोग ने नवंबर में पंचायत चुनाव कराने का प्रस्ताव रखते हुए अधिसूचना जारी की.
उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने 21 अक्टूबर की देर शाम एक पोस्ट में कहा, "लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (संशोधन) विनियम, 2026 के तहत मैंने आठ लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों के लिए 100 निर्वाचन क्षेत्रों की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. इससे पार्षदों की संख्या मौजूदा 52 से बढ़कर लगभग दोगुनी यानी 100 हो जाएगी. नए ढांचे के तहत लेह में 22, करगिल में 21, संकू में 13, चांगथांग में 10, नुब्रा, शाम और जांस्कर में नौ-नौ और द्रास में सात निर्वाचन क्षेत्र होंगे."
यह बयान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से 16 अक्टूबर को जारी संशोधित विनियम की अधिसूचना के एक दिन बाद आया. इन संशोधनों में परिषदों की संरचना, चुनाव प्रक्रिया, कार्यकाल, प्रशासनिक अधिकारों और वित्त से जुड़े प्रावधान शामिल हैं. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14 अक्टूबर को इन बदलावों को मंजूरी दी थी.
नए प्रावधानों के तहत उपराज्यपाल प्रशासन निर्वाचित सदस्यों की संख्या सात से 24 के बीच तय करेगा और अधिकतम चार सदस्यों को मनोनीत कर सकेगा. पहले ‘स्वायत्त निकाय’ कही जाने वाली ये परिषदें अब केवल जिला स्तर पर पंचायतों के अधिकारों का इस्तेमाल करेंगी.
जिला योजनाओं को प्रशासनिक दिशानिर्देशों के अनुरूप बनाना होगा और उपनियमों के लिए उपराज्यपाल की मंजूरी जरूरी होगी. इससे पहले 27 अप्रैल को पांच नए जिलों- शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास- के गठन की घोषणा की गई थी. इनका उद्घाटन 30 अप्रैल को हुआ. 16 अक्टूबर को संकू आठवां जिला बना.
प्रशासन के मुताबिक इन कदमों से स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ेगा और सबको साथ लेकर चलने वाली व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा. इससे जमीनी स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होगा. लेकिन लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर निर्वाचित निकाय और उसकी स्वायत्तता के लिए संवैधानिक सुरक्षा दिलाने के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे दो संगठनों- लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA)- की नजर में इसका मतलब कुछ और है. उनका मानना है कि बातचीत जारी रहने के दौरान एकतरफा तरीके से लद्दाख की राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से ढाला जा रहा है.
LAB और KDA दोनों ने 1997 के कानून में किए गए संशोधनों को खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि इनसे निर्वाचित परिषदों के अधिकार कम होंगे, उनकी स्वायत्तता कमजोर पड़ेगी और उपराज्यपाल प्रशासन की पकड़ मजबूत होगी. स्थानीय नेताओं का तो यहां तक कहना है कि संशोधित प्रावधानों को इस तरह तैयार किया गया है कि भविष्य में केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर बनने वाला कोई भी निर्वाचित निकाय कमजोर पड़ जाए.
अब यह मतभेद केवल अधिकारों और संस्थाओं तक सीमित नहीं रह गया है. मामला भरोसे का भी है. KDA के सह-अध्यक्ष सज्जाद करगिली कहते हैं, "ये परिषदें हम पर थोप दी गई हैं." LAB के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाब्रूक भी इससे पूरी तरह सहमत हैं. उनका कहना है कि यह सब "किसी को भरोसे में लिए बिना" किया गया.
15 अक्टूबर को लेह में उपसमिति स्तर पर हुई बातचीत बेनतीजा रही. LAB और KDA दोनों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के 32 पन्नों के मसौदे को "पहले दिए गए आश्वासनों को कमजोर करने वाला" बताते हुए खारिज कर दिया.
दोनों संगठनों के मुताबिक मसौदे में निर्वाचित विधानसभा या अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा देने के बजाय क्षेत्रीय परिषद जैसी व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है. उनका दावा है कि 22 मई को नई दिल्ली में हुई बैठक में केंद्र सरकार सीधे निर्वाचित केंद्र शासित प्रदेश स्तर के निकाय के विचार पर सहमत हुई थी.
ऐसे निकाय के पास विधायी, कार्यकारी, बजटीय और वित्तीय अधिकार होने थे. लाब्रूक कहते हैं, "हमने अपनी आपत्तियों और मांगों को दोहराते हुए नया प्रस्ताव केंद्र सरकार को पहले ही भेज दिया है."
बातचीत की रफ्तार क्यों थमी
केंद्र सरकार और LAB तथा KDA के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के कई दौर हो चुके हैं लेकिन खास प्रगति नहीं हुई है. करगिली इसे ‘गतिरोध’ बताते हैं. बातचीत का पिछला दौर 22 अक्टूबर को होने की उम्मीद थी लेकिन दोनों संगठनों को न तो कोई निमंत्रण मिला और न ही नई तारीख का कोई संकेत.
इस स्थिति ने लद्दाख के वार्ताकारों के बीच यह धारणा मजबूत की है कि दिल्ली आंदोलन के मूल में मौजूद राजनीतिक सवालों को सुलझाने के बजाय प्रशासनिक बदलाव लागू करने में ज्यादा दिलचस्पी रखती है.
मुख्य मांगें अब भी वही हैं. नागरिक समाज के संगठन छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा या अनुच्छेद 371 जैसी व्यवस्था के जरिए लद्दाख की जमीन, संस्कृति, भाषा और संसाधनों को संवैधानिक संरक्षण देने की मांग कर रहे हैं. वे केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर सीधे निर्वाचित विधायी निकाय भी चाहते हैं जिसके पास वास्तविक विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार हों.
इन मांगों के पीछे 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद पैदा हुई गहरी चिंता है. जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया तो शुरुआत में कई लोगों ने इसे श्रीनगर के राजनीतिक प्रभाव से अलग होने के रूप में देखा और इसका स्वागत किया. लेकिन धीरे-धीरे यह उत्साह चिंता में बदलने लगा.
विधानसभा न होने के कारण सत्ता उपराज्यपाल के कार्यालय और नौकरशाही में केंद्रित हो गई. सवाल यह नहीं रह गया कि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा चाहता था या नहीं. सवाल यह बन गया कि क्या इस दर्जे का मतलब स्वशासन के अधिकारों में कमी भी है. सितंबर 2025 में हिंसा में तब्दील हुए विरोध प्रदर्शनों की जड़ में यही तनाव था.
जमीनी लोकतंत्र या प्रशासनिक केंद्रीकरण?
केंद्र सरकार के हालिया सुधारों को लेकर दोनों पक्षों की सोच में यही बुनियादी अंतर दिखाई देता है. LAHDC कानून में संशोधन से पर्वतीय परिषदों की व्यवस्था का काफी विस्तार हुआ है. अब पूरे केंद्र शासित प्रदेश में आठ परिषदें काम करेंगी और 100 निर्वाचन क्षेत्रों के जरिए निर्वाचित प्रतिनिधित्व होगा.
सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना और सत्ता का विकेंद्रीकरण करना है. लेकिन विकेंद्रीकरण का आकलन केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या से नहीं होता. यह भी देखना होता है कि उनके पास कितने अधिकार हैं. आलोचकों को यहीं विरोधाभास नजर आता है.
संशोधित व्यवस्था के तहत परिषदों की संरचना, वित्त, योजना प्रक्रिया और नियामक अधिकारों पर उपराज्यपाल प्रशासन का काफी नियंत्रण बना रहेगा. जिला स्तर की योजनाओं को प्रशासनिक दिशानिर्देशों के अनुरूप होना होगा, जबकि उपनियमों के लिए उपराज्यपाल कार्यालय की मंजूरी जरूरी होगी.
LAB और KDA का कहना है कि इन प्रावधानों से वे संस्थाएं, जिन्हें पहले स्वायत्त परिषदें कहा जाता था, अब जिला पंचायतों की तरह काम करने वाली संस्थाएं बनकर रह जाएंगी. लद्दाख के नागरिक समाज के नेतृत्व की मूल दलील है, "अधिकारों का हस्तांतरण नहीं हुआ है बल्कि उन्हें फिर से केंद्रित कर दिया गया है."
उनकी चिंता केवल मौजूदा परिषदों को लेकर नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति को लेकर भी है. कई कार्यकर्ताओं को डर है कि अगर भविष्य में निर्वाचित संस्थाओं के प्रमुख अधिकार भी उपराज्यपाल प्रशासन के पास ही रहे तो केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर बनने वाला कोई भी निर्वाचित निकाय इसी तरह की सीमाओं में बंधकर रह जाएगा.
फैसलों का समय भी बना विवाद
संशोधनों से भी ज्यादा विवाद उनके समय को लेकर है. केंद्र सरकार ने ये बदलाव ऐसे समय मंजूर किए जब संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लेकर बातचीत जारी थी. LAB और KDA के नेताओं के लिए यह इस बात का संकेत है कि राजनीतिक बातचीत पूरी होने से पहले ही दिल्ली संस्थागत ढांचे को अपने हिसाब से तय कर रही है.
करगिली सार्वजनिक रूप से फैसले लेने की रफ्तार को जरूरत से ज्यादा तेज बता चुके हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि स्थानीय लोगों की सहमति के बिना बड़े राजनीतिक सवालों पर फैसले किए जा रहे हैं. LAB के नेताओं ने भी कहा है कि संशोधनों से पहले मिले अधिकार कमजोर हुए हैं और इन्हें पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना लागू किया गया है.
लाब्रूक कहते हैं, "इन परिषदों को घटाकर जिला पंचायतों जैसी संस्थाएं बना दिया गया है. यहां तक कि 'स्वायत्त पर्वतीय परिषद' के पुराने नाम को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है." वे आगे कहते हैं, "1997 के कानून के सभी प्रावधानों को कमजोर कर दिया गया है. पहले लद्दाख क्षेत्र की पूरी सरकारी जमीन स्वायत्त पर्वतीय परिषद के अधिकार क्षेत्र में थी. अब इस पर फैसला लेने का अधिकार उपराज्यपाल के पास है. इससे पर्वतीय परिषदों की शक्तियां कम हुई हैं. कल अगर केंद्र शासित प्रदेश स्तर का कोई निर्वाचित निकाय पर्वतीय परिषदों के बारे में कानून बनाना चाहेगा, तो उसे उपराज्यपाल की मंजूरी लेनी होगी."
करगिली के मुताबिक, नए नियम-कायदों के तहत पर्वतीय परिषदें "अधिकारहीन और बिना दांत वाली संस्थाएं" बन गई हैं. उन्हें "एक पैसा खर्च करने के लिए भी" प्रशासन की मंजूरी लेनी होगी.
KDA के सह-अध्यक्ष कहते हैं, "लद्दाख के लोगों से सलाह किए बिना उपराज्यपाल प्रशासन जिस तेजी से फैसले ले रहा है उससे कोई बड़ी दुर्घटना होना तय है. आठ नई परिषदों की अधिसूचना ऐसे समय जारी की गई जब संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लेकर हमारे और केंद्र सरकार के बीच बातचीत जारी थी. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता."
प्रशासन इस व्याख्या को खारिज करता है. उसके मुताबिक ये सुधार स्थानीय शासन व्यवस्था के आधुनिकीकरण की दिशा में लंबे समय से जरूरी कदम थे. लेकिन राजनीति में अक्सर इरादों से ज्यादा अहम यह होता है कि फैसलों को किस नजर से देखा जा रहा है. लद्दाख में यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि फैसले बातचीत के जरिए तय करने के बजाय थोपे जा रहे हैं. इसे दूर करना अब मुश्किल होता जा रहा है.
आगे की राह
आंदोलन से जुड़े कुछ नेता निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि केंद्र सरकार के लिए राज्य का दर्जा या छठी अनुसूची जैसी सुरक्षा व्यवस्था को स्वीकार करना राजनीतिक रूप से मुश्किल है. लेकिन इस हकीकत को समझने के बावजूद जमीन के मालिकाना हक, जनसांख्यिकीय बदलाव और सांस्कृतिक पहचान को लेकर लोगों की चिंता कम नहीं हुई है. यही आशंकाएं अब भी आंदोलन को ऊर्जा दे रही हैं.
लाब्रूक चेतावनी देते हैं कि मांगें पूरी नहीं हुईं तो एक ही रास्ता बचेगा- "आंदोलन फिर शुरू करना". उनका कहना है कि लद्दाख को सार्थक अधिकारों और अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा उपायों से लैस केंद्र शासित प्रदेश स्तर का निर्वाचित विधायी निकाय मिलने तक आंदोलन जारी रह सकता है.
वे कहते हैं, "हमारी मुख्य मांग अनुच्छेद 371 को लेकर थी." LAB और KDA दोनों का कहना है कि केंद्र सरकार 1997 के कानून में संशोधन करके उसी संस्थागत ढांचे को बदल रही है जिस पर बातचीत चल रही है.
करगिली कहते हैं, "हम चाहते थे कि पर्वतीय परिषदों को वास्तविक अधिकार दिए जाएं. लेकिन नई अधिसूचना के तहत योजना बनाने से जुड़े सभी अधिकार छीन लिए गए हैं. प्रशासनिक मंजूरियों से जुड़े अधिकार भी लगभग खत्म कर दिए गए हैं. पर्वतीय परिषदों की संरचना को लेकर भी बड़ा सवाल है. पहले सीटों की संख्या 26 तय थी. अब नई अधिसूचना के तहत सीटें सात से 24 के बीच होंगी. इससे निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में मनमाने बदलाव की काफी गुंजाइश पैदा होती है. इससे परिषदों को अधिकार देने के दावे पर भी सवाल उठता है."
इस विवाद को अक्सर परिषदों, निर्वाचन क्षेत्रों और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ा तकनीकी मामला मान लिया जाता है. लेकिन असल में यह उससे कहीं बड़ा सवाल है. मूल मुद्दा यह है कि लद्दाख का भविष्य तय करने का अधिकार किसके पास होगा.
नागरिक समाज के संगठनों का मानना है कि केंद्र सरकार पहले की बातचीत में किए गए आश्वासनों से धीरे-धीरे पीछे हट गई है. खास तौर पर केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर सीधे निर्वाचित निकाय बनाने और मजबूत संवैधानिक सुरक्षा देने के मुद्दे पर. सरकारी अधिकारियों की नजर में नई परिषदें प्रतिनिधित्व और विकास के साधन हैं. समस्या यह है कि दोनों पक्ष अब एक-दूसरे की बात समझने के बजाय अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं.
दिल्ली विकेंद्रीकरण की बात करती है. लद्दाख स्वायत्तता की मांग करता है. दिल्ली चुनावों का हवाला देती है. लद्दाख पूछता है कि अधिकार कहां हैं. दिल्ली संस्थाएं देती है. लद्दाख ठोस गारंटी चाहता है. दोनों पक्षों के रुख में अब भी काफी दूरी है.
फिलहाल कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता. केंद्र सरकार अपनी शासन व्यवस्था संबंधी योजना पर आगे बढ़ रही है. LAB और KDA इसे नाकाफी बताते हुए खारिज कर रहे हैं. बातचीत अनिश्चितता के बीच ठप है. ऐसे में क्षेत्र में एक बार फिर आंदोलन शुरू होने की आशंका बनी हुई है.
फिलहाल विवाद भले ही पर्वतीय परिषदों और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर हो लेकिन व्यापक संघर्ष वैधता का है. विरोध प्रदर्शनों के एक साल बाद लद्दाख के नेता अब केवल यह नहीं पूछ रहे कि दिल्ली कितने अधिकार देने को तैयार है. वे यह भी पूछ रहे हैं कि क्या दिल्ली अब भी उनके साथ बातचीत करना चाहती है.