दिल्ली के 9/11 की कहानी : कैसे शहर बढ़ता गया और गांव बनते गए इतिहास
11 सितंबर 1803 की जंग से शुरू हुआ दिल्ली के बदलने का सिलसिला आगे चलकर जमीन के सर्वेक्षण, अधिग्रहण और तेज शहरीकरण तक पहुंचा. इस सफर में शहर बढ़ता गया और उसके गांव इतिहास का हिस्सा बनते गए

रायसीना हिल्स यानी राष्ट्रपति भवन की जमीन कभी ग्रामीण बसाहट थी (फोटो : AI)
डॉ. शेखर टोकस
11 सितंबर 1803 को पूर्वी दिल्ली के मौजूदा पटपड़गंज में यमुना के किनारे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मराठा सेना को हरा दिया और दिल्ली पर नियंत्रण हासिल कर लिया. यह शहर के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था. 11 सितंबर की उस घटना ने सिर्फ सत्ता नहीं बदली. इसने दिल्ली के ग्रामीण इलाकों के सर्वेक्षण, नक्शे बनाने और जमीन पर नियंत्रण के नए दौर की शुरुआत भी की.
दिल्ली का पूरा इलाका गांवों से भरा हुआ था. यहां उपजाऊ कृषि भूमि के साथ अलग-अलग तरह के प्राकृतिक इलाके थे. यमुना के किनारे खादर था जबकि उत्तर, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में अरावली की पहाड़ियां थीं.
दक्षिण-पश्चिम में नजफगढ़ नाले के आसपास डाबर और उत्तर-पश्चिम में बांगर का उपजाऊ कृषि इलाका था. इन गांवों के ग्रामीण समुदाय खेती और पशुपालन पर निर्भर थे. मवेशी, ऊंट और बकरियां उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा थे.
दिल्ली हमेशा से सिर्फ अपने ऐतिहासिक स्मारकों, साम्राज्यों और राजाओं का शहर नहीं रही. यह गांवों का भी शहर रही है. सदियों तक गांवों ने शहरी केंद्रों को भोजन, पानी, सैनिक, कारीगर और सांस्कृतिक परंपराएं उपलब्ध कराईं.
16वीं सदी के मुगल प्रशासनिक सर्वेक्षण आइन-ए-अकबरी में दिल्ली क्षेत्र की फसलों, राजस्व, जमीन और कृषि व्यवस्था की विस्तृत जानकारी मिलती है. दिल्ली सूबा आठ सरकारों में बंटा था. मौजूदा दिल्ली से जुड़े इलाकों में पालम भी शामिल था, जिसे एक परगना के रूप में दर्ज किया गया था.
दिल्ली के बड़े इलाके में गेहूं, जौ, चना, बाजरा, ज्वार, सरसों, तिल और कपास जैसी फसलें उगाई जाती थीं. यानी दिल्ली का कृषि परिदृश्य आज के महानगर से कई सदियों पुराना है.
शाहजहानाबाद की चारदीवारी के आसपास गांवों और कृषि समुदायों का घना जाल था. उनकी जमीन, श्रम और उपज शहर के केंद्र को चलाने में मदद करती थी. ये बस्तियां दिल्ली के इतिहास से बाहर नहीं थीं बल्कि शहर के अस्तित्व का जरूरी हिस्सा थीं.
मसलन, अदिति गोविल ने अपने अध्ययन में सिरसपुर के इतिहास को 1803 से 1880 के बीच दर्ज किया है. इससे पता चलता है कि जमीन राजस्व और संपत्ति से जुड़े रिश्तों के जरिए ये गांव दिल्ली से कितने गहरे जुड़े थे.
सिरसपुर आज उत्तर दिल्ली में समयपुर बादली और रोहिणी के पास मौजूद है. यह उस विशाल ग्रामीण इलाके की याद दिलाता है जो कभी दिल्ली के चारों तरफ फैला हुआ था.
ब्रिटिश राज में बदला गांवों और जमीन का रिश्ता
मराठों से सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद अंग्रेजों ने 1837 में दिल्ली के आसपास गांवों की जमीन का राजस्व नक्शा तैयार करना और उस पर कब्जा करना शुरू किया. इसमें कृषि भूमि के साथ गांव की साझा जमीन, यानी शामिलात देह भी शामिल थी.
राजस्व प्रशासन कोई नई व्यवस्था नहीं थी. लेकिन अंग्रेजों ने जमीन के सर्वेक्षण, वर्गीकरण और कानूनी परिभाषा तय करने की प्रक्रिया को बड़े स्तर पर बढ़ाया. जमीन पर पहले से मौजूद अधिकारों और परंपरागत रिश्तों को धीरे-धीरे प्रशासनिक श्रेणियों में बदल दिया गया.
कंझावला इसका अहम उदाहरण है. 1880 के बंदोबस्त रिकॉर्ड बताते हैं कि दर्ज जमीन का करीब एक चौथाई हिस्सा साझा जमीन था. इसका इस्तेमाल चराई और गांव की दूसरी सामूहिक जरूरतों के लिए होता था. बाद में ऐसी जमीनों के वर्गीकरण, बंटवारे और हस्तांतरण से कृषि समुदायों और जमीन के बीच पुराने रिश्ते बदल गए.
हर नक्शे में गांव की जमीन को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता था: आबादी देह, यानी गांव की बस्ती; जरई/पहाड़ी अराजी, यानी कृषि या पहाड़ी जमीन; और शामिलात देह, यानी गांव की साझा जमीन. शजरा नक्श में गांव और उसकी जमीन के अलग-अलग हिस्से दर्ज होते थे और हर हिस्से की पहचान खसरा नंबर से होती थी.
ये सिर्फ प्रशासनिक नक्शे नहीं थे. दूसरे रिकॉर्ड के साथ इन्हें पढ़ने पर बस्तियों और जमीन के मालिकाना हक में बदलाव के साथ रिश्तेदारी, पलायन और स्थानीय राजनीतिक सत्ता के संबंधों का भी पता चलता है.
शजरा नसब में जमीन के मालिकों या उस पर अधिकार रखने वाले लोगों की वंशावली और उनसे जुड़े अधिकार दर्ज होते थे. इन रिकॉर्ड की मदद से औपनिवेशिक प्रशासन के लिए गांव की जमीन की पहचान करना, उस पर राजस्व तय करना और उसे नियंत्रित करना आसान हो गया.
जमीन के राजस्व से जुड़े चार बंदोबस्त हुए और आखिरी बंदोबस्त 1880 में पूरा हुआ. ब्रिटिश लैंड रेवेन्यू सेटलमेंट के तहत खेतों का व्यवस्थित सर्वे और नक्शा तैयार किया गया, हर खेत को नंबर दिया गया और उसे राजस्व तथा मालिकाना हक के रिकॉर्ड से जोड़ा गया.
किसी सामान्य किसान परिवार के लिए इसका मतलब था कि पीढ़ियों से चली आ रही जमीन अब सरकारी रिकॉर्ड में एक खास खेत नंबर से दर्ज थी और उस पर तय राजस्व लगाया जाता था. इस तरह पुश्तैनी जमीन पर अधिकार औपचारिक रिकॉर्ड में दर्ज और कानूनी रूप से परिभाषित संपत्ति में बदल गए.
अंग्रेजों ने 1880 में दिल्ली के गांवों से राजस्व वसूली के लिए जैलदारी और नंबरदारी व्यवस्था भी शुरू की. दिल्ली जिला तीन तहसीलों में बंटा था: दिल्ली, बल्लभगढ़ और सोनीपत.
इनके तहत 44 जैल और सैकड़ों गांव थे. इनमें से 18 जैल के तहत आने वाले 375 गांव उस इलाके में थे, जो मोटे तौर पर आज की दिल्ली से मेल खाता है. इन गांवों में मुख्य रूप से जाट, गुर्जर, ब्राह्मण, अहीर, टागा और चौहान समुदाय रहते थे.
नई दिल्ली बनी तो उजड़े कई गांव
गांव अब औपनिवेशिक राज्य की प्रशासनिक और राजस्व इकाई बन चुका था. 1908 की लाल डोरा व्यवस्था ने गांव की आबादी को कृषि भूमि से अलग करके इसे और औपचारिक रूप दिया. 1911 में दिल्ली को ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी घोषित किए जाने के बाद बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण शुरू हुआ.
नई दिल्ली बनाने के लिए करीब 150 गांवों की जमीन ली गई. इनमें रायसीना और मालचा की जमीन वायसराय हाउस के लिए, खैरपुर की जमीन बाद में बने लोधी गार्डन के लिए और पिलंजी तथा मालचा की जमीन चाणक्यपुरी के कुछ हिस्सों के लिए ली गई.
1894 के लैंड एक्विजिशन एक्ट के तहत हुए इन अधिग्रहणों से दिल्ली के गांवों का स्वरूप बदला और कई गांवों की जमीन चली गई.
रायसीना इसका खास उदाहरण है. 1911-12 में नई दिल्ली के निर्माण के लिए उसकी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया. इसमें वायसराय हाउस, यानी आज का राष्ट्रपति भवन, और आसपास का इलाका शामिल था. एक सदी से ज्यादा समय बाद रायसीना के निवासियों के वंशजों ने इस अधिग्रहण को चुनौती दी और दिल्ली हाई कोर्ट में अपने पूर्वजों की जमीन के मुआवजे की मांग की.
इतिहास में सिमटते गए गांव
लेकिन दिल्ली के गांवों की कहानी सिर्फ जमीन की कहानी नहीं है. यह इस बात की कहानी भी है कि इतिहास में किसे याद रखा जाता है. हम दिल्ली को उसके किलों, महलों और साम्राज्यवादी इमारतों के जरिए तो आसानी से याद करते हैं, लेकिन उन गांवों और समुदायों के जरिए क्यों नहीं, जो कभी इनके आसपास बसे हुए थे?
इतिहास सिर्फ अतीत नहीं है. यह उस अतीत को याद करने, समझने और पेश करने का तरीका भी है. इतिहासकार बचे हुए सबूतों के आधार पर अतीत को फिर से समझते हैं. अतीत हमेशा उन सबूतों से बड़ा होता है, जो हमारे पास बच पाए हैं.
कॉलिंगवुड की द आइडिया ऑफ हिस्ट्री, ब्लॉख की द हिस्टोरियन'स क्राफ्ट और कैर की व्हाट इज हिस्ट्री? हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास सिर्फ अभिलेखागार में पड़ा नहीं मिलता. उसे सवालों, सबूतों और उनकी व्याख्या के जरिए फिर से बनाया जाता है.
इसका दिल्ली देहात के लिए खास महत्व है. इसका इतिहास सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में नहीं, बल्कि गांव के नक्शों, जमीन के दस्तावेजों, भौगोलिक स्वरूप, भौतिक अवशेषों और मौखिक स्मृतियों में भी मौजूद है. महारा मुनीरका में मुनीरका के इतिहास को जिस तरह दर्ज किया गया है, वह इसका उदाहरण है.
इस किताब में मौखिक इतिहास, भाटों के पास सुरक्षित विवरण, ब्रिटिश दौर के पुराने नक्शे, जमीन अधिग्रहण से जुड़े दस्तावेज और बची हुई हवेलियां, तालाब, कुएं, चौपाल और मंदिर जैसी संरचनाओं को साथ रखकर गांव के इतिहास को सामने लाने की कोशिश की गई है.
भाट परिवारों की वंशावली और अपने पूर्वजों से जुड़ी यादों को संभालकर रखते थे. इसलिए वे ऐसे इतिहास को सामने लाने का अहम स्रोत हैं, जो सरकारी रिकॉर्ड में शायद दर्ज न हो. इन स्रोतों को सामने लाने से दिल्ली को सिर्फ एक योजनाबद्ध महानगर के रूप में देखने के बजाय ऐसे शहर के रूप में समझने में मदद मिलती है, जिसे गांवों ने भी आकार दिया और जिनका इतिहास उसकी मुख्य कहानी से अक्सर बाहर रह गया.
शहर में समाए गांवों की ग्रामीण पहचान
लेकिन दिल्ली देहात शब्द पर भी दोबारा विचार करने की जरूरत है. यह शहर और देहात के बीच अंतर पर आधारित है और ग्रामीण तथा शहरी दिल्ली के बीच के लगातार बने रिश्ते को छिपा सकता है.
कटवारिया सराय इसका उदाहरण है कि आज की शहरी दिल्ली के भीतर भी ग्रामीण अतीत मौजूद है. आज यह गांव आईआईटी दिल्ली, भारतीय सांख्यिकी संस्थान और कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया से घिरा है. इसके बावजूद यहां राम तालाब, गुरु गोरखनाथ मंदिर, दौलत की हवेली और वाल्मीकि मंदिर जैसे ग्रामीण अतीत के निशान अब भी मौजूद हैं.
शहर में शामिल हो चुके गांवों में भी उनकी बसावट, हवेलियों, तालाबों, चौपालों, मंदिरों और अखाड़ों के साथ-साथ त्योहारों, रीति-रिवाजों, भाषा, खान-पान और रोजमर्रा की जीवनशैली में ग्रामीणता के निशान बचे हुए हैं. इसलिए दिल्ली 'देहात' सिर्फ भौगोलिक श्रेणी नहीं है. यह ऐसी सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक निरंतरता है, जिसमें तेजी से फैलते शहर के भीतर भी ग्रामीण इतिहास और पहचान मौजूद हैं.
दिल्ली के गांवों का मुख्यधारा के इतिहास से गायब होना यह नहीं बताता कि उनका कोई इतिहास नहीं है. यह सवाल भी खड़ा करता है कि इतिहासकारों ने कौन से सवाल पूछे, किन स्रोतों को महत्वपूर्ण माना और किन लोगों के अनुभवों को इतिहास का हिस्सा बनने दिया.
दिल्ली के अलग-अलग गांवों में मौखिक यादें और स्थानीय रिकॉर्ड जमीन, खेती और विस्थापन के ऐसे इतिहास को संभाले हुए हैं जो पारंपरिक इतिहास में अक्सर नहीं मिलता. बसई दारापुर, मुनीरका, कटवारिया सराय, शादीपुर और तैमूर नगर जैसे गांवों में चल रहे जमीन विवाद, जिनमें से कुछ कई पीढ़ियों से चले आ रहे हैं, इस भूले हुए इतिहास की झलक देते हैं.
दिल्ली का मुख्यधारा का इतिहास बड़े पैमाने पर राजवंशों, साम्राज्यवादी राजधानी, स्मारकों और वास्तुकला के इर्द-गिर्द रहा है. दिल्ली को बार-बार दिल्ली सल्तनत, मुगलों और औपनिवेशिक साम्राज्य के शहर के रूप में पेश किया जाता है.
किले, मस्जिदें, मकबरे और औपनिवेशिक इमारतें हमारी ऐतिहासिक स्मृति के केंद्र में रहती हैं. इसके उलट दिल्ली देहात लगभग गायब हो जाता है. उदाहरण के लिए हौज खास विलेज को आमतौर पर उसके मध्यकालीन जलाशय और स्मारकों के लिए याद किया जाता है, जबकि चिराग दिल्ली मुख्य रूप से नसीरुद्दीन महमूद चिराग-ए-दिल्ली की दरगाह के लिए जाना जाता है.
लेकिन ये दोनों अपने आप में ऐतिहासिक गांव भी हैं, जिनका अपना जमीन, समुदाय और रोजमर्रा के जीवन का इतिहास है. स्मारक याद रह जाता है, लेकिन उसके पीछे का गांव उतना दिखाई नहीं देता.
फिर भी सबूत मौजूद हैं. औपनिवेशिक सर्वेक्षण, राजस्व रिकॉर्ड, बंदोबस्त रिपोर्ट, शजरा नक्श, वंशावली यानी शजरा नसब, जमीन अधिग्रहण के रिकॉर्ड, मौखिक इतिहास और सामुदायिक अभिलेख गांवों का इतिहास फिर से सामने लाने में मदद कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए, किसी वंशावली से पता लगाया जा सकता है कि कई पीढ़ियों के दौरान किसी परिवार की जमीन और वंश का क्या इतिहास रहा. वहीं पुराने शजरा नक्श से उन खेतों, तालाबों, साझा जमीनों और गांव की सीमाओं का पता चल सकता है जो शहर के फैलने के बाद जमीन के नीचे या नई इमारतों के बीच गायब हो चुके हैं.
इन सभी स्रोतों को साथ देखने पर स्थानीय विरासत, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं, बदलते भू-दृश्य, आजीविका और सामुदायिक अनुभवों का इतिहास सामने आता है.
आजादी के बाद दिल्ली के बदलते स्वरूप ने इस कहानी में एक और परत जोड़ दी. सरकार ने तेजी से कृषि भूमि का अधिग्रहण किया लेकिन गांवों की बस्तियों यानी आबादी देह को वहीं रहने दिया.
कृषि क्षेत्र फैलते शहर में शामिल होते गए, जबकि पुरानी गांव की बस्तियां बनी रहीं. इससे ‘अर्बन विलेज’ यानी ‘शहरी गांव’ की स्थिति पैदा हुई. यह ऐसा ग्रामीण इलाका है जो शहरीकरण से चारों तरफ से घिर गया हो.
कभी खेतों से घिरा रहा सैदुलाजाब आज इग्नू जैसे शैक्षणिक संस्थानों, पर्यावरण कॉम्प्लेक्स के व्यावसायिक और रिहायशी विकास और चंपा गली जैसे नए व्यावसायिक इलाकों से घिरा है. गांव बचा रहा, लेकिन उसके आसपास का ग्रामीण भू-दृश्य धीरे-धीरे बदल गया.
इन गांवों को शहरी नियमों से कुछ हद तक छूट मिली हुई थी. पशुपालन, छोटे पैमाने का उत्पादन और दूसरी आर्थिक गतिविधियां जारी रहीं. लेकिन इसके साथ बुनियादी सुविधाओं और ढांचे की कमी भी बनी रही और निर्मित क्षेत्र बिना पर्याप्त रेगुलेशन के फैलता गया.
शहरी गांव भी दिल्ली की प्लानिंग की देन
1980 के दशक तक पशुपालन पर लगी पाबंदियों ने ग्रामीण आजीविका को और कमजोर किया. 1990 के दशक में, खासकर दिल्ली का मास्टर प्लान 2001 और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद, रिहायशी और गैर-औद्योगिक इलाकों में चल रहे उद्योगों पर सख्त नियम लागू हुए और उन्हें दूसरी जगह ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई.
कई गांवों से उद्योग गायब हो गए. उनकी जगह किराए के मकानों और उनसे होने वाली आमदनी पर आधारित अर्थव्यवस्था उभरने लगी, जो प्रवासी मजदूरों और छात्रों को आवास उपलब्ध कराती थी. इस नजरिए से देखें तो ‘अनियोजित’ शहरी गांव योजना व्यवस्था के बाहर की चीज नहीं है. वह खुद उसी योजना व्यवस्था की देन है.
दिल्ली देहात को इतिहास में जगह देने का मतलब है कि उपलब्ध सबूतों को नए सिरे से देखा जाए. सरकारी रिकॉर्ड को सामुदायिक जानकारी, वंशावलियों, मौखिक इतिहास, भौतिक अवशेषों और रोजमर्रा के भू-दृश्य के साथ पढ़ा जाए.
इसका मतलब अतीत की पूरी और अंतिम कहानी लिखना नहीं है. इसका मतलब बचे हुए निशानों से दिल्ली के इतिहास को फिर से समझना और यह पूछना है कि किन लोगों का इतिहास याद रखा जाता है, किस विरासत को महत्व दिया जाता है और किन सबूतों को ऐतिहासिक माना जाता है.
दिल्ली के गांव कभी ऐसे खाली इलाके नहीं थे, जो सिर्फ शहरीकरण का इंतजार कर रहे हों. वे दिल्ली के निर्माण का हिस्सा थे. ऐसे में जब शहर 2047 के विकास के विजन की ओर बढ़ रहा है, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इन गांवों का शहरीकरण कैसे होगा. इनमें से कई गांव पहले ही महानगर में समा चुके हैं.
बड़ा सवाल यह है कि 2047 की दिल्ली में इन गांवों के समुदायों, उनकी विरासत, आजीविका और ग्रामीण पहचान के लिए क्या जगह होगी. क्या इन्हें बचाया जाएगा, बदला जाएगा या एक बार फिर विस्थापित किया जाएगा?
दिल्ली का भविष्य सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि शहर आगे क्या बनाता है, बल्कि इस पर भी कि वह उन गांवों को कैसे याद रखता है और अपने भीतर उनके लिए कितनी जगह बनाता है, जिन्होंने दिल्ली को बनाने में अहम भूमिका निभाई.
(डॉ. टोकस दिल्ली की डॉ. बी.आर. आंबेडकर यूनिवर्सिटी में अर्बन स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )