कांग्रेस के लिए CJP चुनौती या मौका?

CJP के मुद्दों से दूरी रखते हुए कांग्रेस उन्हें अपने एजेंडे में शामिल कर रही है लेकिन युवाओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए क्या राहुल गांधी की रणनीति काफी होगी?

Rahul Gandhi, Abhijit Dipke
राहुल गांधी CJP के अभिजीत दिपके से सीधे जुड़ने के बजाय उनके उठाए मुद्दों का समर्थन कर रहे हैं

22 अगस्त को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को पुणे ले गए. यह कार्यक्रम खास तौर पर युवा महिलाओं के लिए था. देखने में यह कार्यक्रम के शेड्यूल में किया गया एक छोटा बदलाव था लेकिन यह कांग्रेस के भीतर दो महीने से चल रही बहस का नतीजा था.

कार्यक्रम का तरीका भी महत्वपूर्ण था. छात्रों ने हिंसा, आने-जाने पर पाबंदियों, घर की जिम्मेदारियों में असमानता, आर्थिक स्वतंत्रता की कमी और सुरक्षा के नाम पर लगाए जाने वाले सामाजिक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर बात की. 

राहुल ने इन शिकायतों को जंतर-मंतर के प्रदर्शनों से जोड़ा. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने खास तौर पर गाली-गलौज करने वाली युवा महिलाओं के व्यवहार पर ‘सांस्कृतिक झटके’ की बात की, लेकिन पुरुष प्रदर्शनकारियों के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा.

राहुल ने Gen Z के चर्चित नारे ‘पितृसत्ता को खत्म करो’ का इस्तेमाल किया. उन्होंने खुद को उन युवा महिलाओं के साथ खड़ा करने की कोशिश की, जो उनके मुताबिक BJP-RSS की उस सोच को चुनौती दे रही हैं, जिसमें महिलाओं को घर तक सीमित रखने और उनकी आजादी पर नियंत्रण की बात होती है.

6 अगस्त को छात्रों के लिए राहुल के इंस्टाग्राम पर हुए ‘आस्क मी एनीथिंग (जो चाहें पूछिए)’ कार्यक्रम के साथ पुणे के कार्यक्रम को देखा जाए तो इससे पता चलता है कि कांग्रेस ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को लेकर क्या सबक सीखे हैं.

कांग्रेस CJP को उसी के तरीके से नहीं हरा सकती और न ही उसके साथ जुड़ना चाहती है. इसके बजाय उसने CJP की उस संवाद रणनीति से सीखने का फैसला किया है, जिसने इस नए संगठन को बहुत कम समय में लोकप्रिय बना दिया.

पुणे में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी

‘छात्रों की गूंज’ को पारंपरिक राजनीतिक रैली के बजाय एक संवादात्मक मंच के रूप में तैयार किया जा रहा है. इसमें राहुल छात्रों की बातें सुनते हैं, प्रजेंटेशन और आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं, युवाओं को अपने अनुभव बताने का मौका देते हैं और श्रोताओं के मुताबिक अपनी भाषा बदलते हैं. 

कांग्रेस Gen Z के अलग-अलग समूहों पर भी ध्यान देना शुरू कर रही है. वह युवाओं को एक ही राजनीतिक वर्ग मानने के बजाय युवा महिलाओं जैसे खास समूहों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर संवाद कर रही है.

CJP को खत्म करने या उसकी छवि खराब करने के लिए कांग्रेस ने कोई वॉर रूम नहीं बनाया है. कांग्रेस की रणनीति ज्यादा सूक्ष्म है और जून से अगस्त के बीच धीरे-धीरे तैयार हुई है. कांग्रेस CJP के उठाए मुद्दों का समर्थन कर रही है और उसकी राजनीतिक सफलता में अपना हिस्सा तलाश रही है. 

साथ ही, वह संगठन के स्तर पर CJP से दूरी बनाए रखना चाहती है. राहुल के नेतृत्व में युवाओं के लिए एक अलग मंच तैयार किया जा रहा है. धीरे-धीरे कांग्रेस की भाषा को उन रोजमर्रा की चिंताओं के करीब लाने की कोशिश भी हो रही है, जिनकी वजह से CJP को सफलता मिली..

कांग्रेस यह भी कहती है कि उसकी यह रणनीति CJP के जवाब में शुरू नहीं हुई थी. राहुल ने 17 जून को कोटा में ‘छात्रों की गूंज’ की शुरुआत की थी. इसके तीन दिन बाद ही CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगातार आंदोलन शुरू किया था. 

कांग्रेस नेता शशि थरूर भी सार्वजनिक तौर पर यह बात कह चुके हैं. पार्टी का यही मुख्य तर्क है कि कांग्रेस ने CJP के लोकप्रिय होने के बाद छात्र राजनीति पर ध्यान देना शुरू नहीं किया. राहुल पहले से ही परीक्षा के पेपर लीक और खराब परीक्षा व्यवस्था की बात कर रहे थे.

फिर भी, CJP के आंदोलन के पहले महीने में कांग्रेस जानबूझकर जंतर-मंतर से दूर रही. इसके पीछे दो चिंताएं थीं. पहली चिंता, जिसे उस समय पार्टी के पदाधिकारियों ने खुलकर जाहिर किया, यह थी CJP BJP की ओर से खड़ी की गई कोई ऐसी कवायद हो सकती है, जिसका मकसद पेपर लीक और अयोध्या राम मंदिर के लिए दिए गए चंदे से जुड़े आरोपों पर कांग्रेस के अभियानों से लोगों का ध्यान भटकाना हो.

दूसरी चिंता पुरानी और ज्यादा गहरी थी. यह 2011 की याद थी. इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को निशाना बनाया था. इस आंदोलन ने व्यवस्था विरोधी गुस्से को एक राजनीतिक वर्ग में बदला, आम आदमी पार्टी (AAP) को जन्म दिया और 2015 में दिल्ली की 70 में से 67 विधानसभा सीटें AAP की झोली में डाल दीं. 

जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दिपके और आशुतोष राकां

वहीं कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी. कांग्रेस नेताओं ने अंदरूनी तौर पर यह भी नोट किया था कि दिपके ने 2020 में AAP की सोशल मीडिया टीम के साथ काम किया था. बाद में दिपके ने भी इसकी पुष्टि की.

उस अनुभव से कांग्रेस ने एक महत्वपूर्ण संस्थागत सबक सीखा. किसी नए व्यवस्था विरोधी आंदोलन के लिए जरूरी नहीं कि वह पहले सत्तारूढ़ दल को हराए. वह इसके बजाय उस विपक्षी दल को खत्म कर सकता है, जो बदलाव की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करने में सबसे कम सक्षम दिखाई देता है. 

यही वजह है कि 10 जनपथ में CJP का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करना कभी भरोसे की वजह नहीं बना.

फिर जुलाई में टकराव हुआ, जिसने कांग्रेस की इस चिंता को सबसे स्पष्ट रूप से सामने रखा. राहुल जंतर-मंतर जा सकते थे, दिपके के बगल में बैठ सकते थे और आंदोलन के पीछे कांग्रेस की पूरी संस्थागत ताकत लगा सकते थे. उन्होंने ऐसा नहीं किया. 

इसके बजाय राहुल गांधी ने अचानक प्रदर्शन किया, जिसकी घोषणा पहले से नहीं की गई थी. इससे कांग्रेस के कुछ नेता भी हैरान रह गए. उन्होंने प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ पुलिस के व्यवहार पर कार्रवाई की मांग की.

लोकसभा सांसद और AICC महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल का मानना है कि छात्रों के मुद्दे पर सरकार पर बना दबाव संसद में हुए विरोध और सड़क पर समानांतर प्रदर्शन, दोनों का नतीजा था. 

उनका कहना है कि सदन में विपक्ष के दखल ने सरकार को दबाव में ला दिया. वेणुगोपाल ने कहा, "राहुल गांधी के दखल, छात्रों के साथ उनके सीधे संवाद और प्रधानमंत्री आवास के बाहर हुए प्रदर्शन ने उनकी चिंताओं पर ध्यान देने के लिए जरूरी दबाव बनाने में मदद की."

राज्यसभा सांसद, AICC के मीडिया और प्रचार विभाग के अध्यक्ष और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य पवन खेड़ा कांग्रेस और CJP के अलग-अलग प्रदर्शनों को काम के बंटवारे के तौर पर देखते हैं. उन्होंने कहा, "CJP को जहां होना चाहिए था, वह जंतर-मंतर पर थी. और राहुल जी को जहां होना चाहिए था, वे प्रधानमंत्री आवास के बाहर थे. और पूरे देश में कांग्रेस अपने ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ रही है. लोकतंत्र में अलग-अलग लोगों और संगठनों के लिए जगह है."

प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने के दौरान राहुल गांधी को हिरासत में लेती पुलिस

यह कांग्रेस की मौजूदा स्थिति का सीधा खाका है. CJP पर हमला मत करो, क्योंकि इससे उसी Gen Z वर्ग के दूर होने का खतरा है जिसे कांग्रेस अपने साथ जोड़ना चाहती है. उसके साथ मत मिलो क्योंकि इससे उसे वैधता, कार्यकर्ता और राष्ट्रीय विपक्षी ताकत का दर्जा मिल जाएगा. 

कांग्रेस की रणनीति इसके बजाय उसके मुद्दों का समर्थन करने और साथ ही यह बताने की है कि पार्टी के पास इसी वर्ग तक पहुंचने के लिए अपना मंच है.

अगस्त तक यह रणनीति ज्यादा व्यक्तिगत और सक्रिय होती गई. 21 अगस्त को राहुल 19 वर्षीय साहिल लोचब के साथ पुलिस के पास गए. लोचब को 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के छर्रे लगने से गंभीर चोटें आई थीं. उनका कहना है कि उनकी एक आंख की रोशनी चली गई. 

लोचब ने शिकायत की थी कि बार-बार कोशिश करने के बावजूद पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की. इसके बाद राहुल दिल्ली के एक पुलिस उपायुक्त के कार्यालय के बाहर करीब सात घंटे तक बैठे रहे. उन्होंने मामला दर्ज होने तक वहां से जाने से इनकार कर दिया. 

आखिरकार पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की. हालांकि पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों से इनकार किया. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई की जांच के लिए अलग से एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी.

राजनीतिक तौर पर यह घटनाक्रम दिखाता है कि राहुल छात्र आंदोलन से निकलने वाली व्यक्तिगत शिकायतों से सीधे जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वे इन मुद्दों पर CJP को पूरा राजनीतिक श्रेय नहीं देना चाहते. 

जुलाई के उनके प्रदर्शन की तरह यह धरना भी बिना किसी पूर्व घोषणा के किया गया. इससे उन्हें एक छात्र की शिकायत को न्याय तक पहुंच और जवाबदेही के बड़े सवाल से जोड़ने का मौका मिला. साथ ही इससे यह संदेश भी गया कि वे कभी-कभार नहीं बल्कि लगातार छात्रों के साथ खड़े हैं. 

जंतर-मंतर पर दिपके के साथ जाने के बजाय राहुल उन युवा लोगों के पक्ष में आवाज उठाने की कोशिश कर रहे हैं जो परीक्षा, पुलिस कार्रवाई और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ी बड़ी समस्याओं का चेहरा बन चुके हैं.

खेड़ा ने एक ही साथ छात्रों के प्रति समर्थन और इन मुद्दों पर कांग्रेस के अधिकार, दोनों का दावा किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस हर जगह छात्र आंदोलनों के साथ मजबूती से खड़ी है. इसमें झारखंड भी शामिल है, जहां कांग्रेस सरकार में भागीदार है. 

जंतर-मंतर पर पैलेट गन के छर्रे से घायल हुए साहिल लोचब के साथ पुलिस थाने में राहुल गांधी

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) और इंडियन यूथ कांग्रेस ने देशभर में प्रदर्शन किए. इससे शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बढ़ती सेंसरशिप और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा शुरू हुई. 

खेड़ा ने कहा, "हमें खुशी है कि जिन मुद्दों को हम लंबे समय से उठाते रहे हैं, वे अब लोगों के बीच असर डाल रहे हैं. डर का माहौल खत्म हो रहा है और लोग सही वजहों से सड़कों पर उतर रहे हैं."

लेकिन थरूर ने पार्टी के भीतर की समस्या को लगभग सभी से ज्यादा साफ शब्दों में रखा है. कांग्रेस भी यही मुद्दे उठाती रही है लेकिन वह उन्हें लोगों के बीच असरदार नहीं बना पाई. उनके मुताबिक पार्टी को यह देखना होगा कि क्या वह Gen Z की नब्ज समझने में नाकाम रही.

कांग्रेस के लिए असली रणनीतिक सवाल यही है. सवाल यह नहीं कि उसने सही मुद्दा चुना या नहीं, बल्कि यह है कि CJP ने उसी मुद्दे को छात्रों का मुद्दा बना दिया जबकि कांग्रेस के हाथ में वह एक और राजनीतिक अभियान जैसा क्यों दिखा.

कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि समस्या मुद्दे को उठाने वाले व्यक्ति में है. उन्हें हैरानी नहीं है कि युवाओं ने उनकी पार्टी से ज्यादा सफलता हासिल की. जब यह मुद्दा संसद पहुंचा तो कांग्रेस के पहले वक्ता 84 वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे थे, जिन्होंने मनुस्मृति का जिक्र किया.

राज्यसभा सांसद ने कहा, "इसका मनुस्मृति से क्या लेना-देना था? युवाओं की चिंताओं पर बात करने के बजाय हमारे एक बुजुर्ग नेता हजारों साल पहले लिखे गए एक ग्रंथ की बात कर रहे थे और संसद में उसी पर बहस कर रहे थे. इसमें कोई हैरानी नहीं कि युवा हमारी बात नहीं सुनते. युवा भविष्य की ओर देखना चाहते हैं, जबकि हम अतीत में ही उलझे हुए हैं."

आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस क्यों चिंतित है. CJP के इंस्टाग्राम पर 2.61 करोड़ फॉलोअर्स हैं जबकि राहुल के 1.52 करोड़. दिपके का कहना है कि उनके करीब 70 फीसदी फॉलोअर्स 28 साल से कम उम्र के हैं. इनमें से कई खुद को किसी राजनीतिक दल से नहीं जोड़ते. 

कांग्रेस के लिए चिंता की बात तब और बढ़ जाती है, जब दिपके कहते हैं कि ये युवा सिर्फ सरकार से ही नाराज नहीं हैं, बल्कि विपक्षी दलों से भी नाराज हैं. उनका मानना है कि विपक्षी दल सरकार को जवाबदेह ठहराने में नाकाम रहे हैं.

इसी वर्ग को राहुल वर्षों से अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा ने एक दूर रहने वाले राजनीतिक वंशज की छवि को बदलकर उन्हें ऐसा नेता बनाया, जो लोगों की बातें सुनने को तैयार है. 

'स्कूल ठीक करो' अभियान के तहत एक स्कूल की छात्राओं से बात करते अभिजीत दिपके

कांग्रेस 2019 में लोकसभा की 52 सीटों से बढ़कर 2024 में 99 सीटों तक पहुंची. संभव है कि उसे यात्रा के रास्ते में आने वाले क्षेत्रों से 41 सीटों का फायदा मिला हो. गठबंधन, उम्मीदवारों और राज्यों में सत्ता विरोधी माहौल का भी इसमें योगदान था. 

लेकिन 2014 के बाद ये यात्राएं कांग्रेस का सबसे सफल और वास्तव में नया राजनीतिक प्रयोग रही हैं. पार्टी के लिए असहज बात यह है कि राहुल की अपनी राजनीतिक शैली, जो आंदोलनों के लिए खुली और विकेंद्रीकृत थी, ने भी उस तरह की राजनीति को वैधता देने में मदद की, जो अब उनके सामने चुनौती बनकर खड़ी है.

राहुल के हालिया कदम बताते हैं कि वे इसी मॉडल को और आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. 2029 में 18 से 29 साल के युवा मतदाताओं की संख्या काफी बड़ी रहने की संभावना है. 

ऐसे में कांग्रेस युवा केंद्रित संवाद, व्यक्तिगत स्तर पर लोगों के मुद्दे उठाने और अचानक होने वाले सड़क प्रदर्शनों का सहारा लेकर राहुल के आसपास ऐसा राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश कर रही है, जो BJP और CJP दोनों से अलग हो.

कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए दिपके की सोशल मीडिया पहुंच से ज्यादा चिंता की बात यह है कि वे जमीन पर क्या कर रहे हैं. 15 अगस्त को उन्होंने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया. इसमें आम लोगों से ग्रामीण सरकारी स्कूलों की स्थिति की जांच करने को कहा जा रहा है. 

दिपके का सवाल सरल है और राजनीतिक रूप से काफी असरदार भी. अगर सरकारी स्कूल आम लोगों के बच्चों के लिए अच्छे हैं, तो मंत्री, शिक्षा अधिकारी और यहां तक कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में क्यों भेजते हैं?

यह अंतर महत्वपूर्ण है. पेपर लीक से गुस्सा पैदा होता है. लेकिन खराब स्कूल लोगों को संगठित करने का मौका देता है. हर स्कूल एक तय जगह है, हर अभिभावक संभावित भागीदार है, हर खराब शौचालय या गैरहाजिर शिक्षक बताने के लिए एक कहानी है और हर मरम्मत एक ऐसी सफलता है, जिसे लोग अपनी आंखों से देख सकते हैं. 

इस मामले में CJP को अगस्त 2025 से कांग्रेस के मुख्य राष्ट्रीय अभियान ‘वोट चोरी’ पर बढ़त मिलती है. चुनावी निष्पक्षता महत्वपूर्ण मुद्दा है लेकिन आम मतदाता के लिए यह दूर और जटिल लग सकता है. इसके मुकाबले टपकती छत वाली कक्षा की समस्या सामने दिखती है और उसे समझना भी आसान है.

कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ को करीब 800 शहरों तक ले जाने का फैसला किया है. राहुल इनमें से कुछ कार्यक्रमों में खुद शामिल होंगे. पार्टी अब आंदोलन से आगे बढ़कर शासन के मुद्दे पर भी ध्यान देना चाहती है. 

राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए ठोस योजनाएं तैयार करने को कहा है. इन योजनाओं को शिक्षा विशेषज्ञों, छात्र संगठनों और दूसरे संबंधित पक्षों से सलाह लेकर तैयार किया जाना है और एक महीने के भीतर सौंपना है. 

कांग्रेस ने अपनी सरकार वाले राज्यों को परीक्षा व्यवस्था में ठोस बदलाव के लिए योजना बनाने को कहा है (फाइल फोटो)

कांग्रेस की रणनीति का यह हिस्सा उस चीज पर टिका है, जो CJP के पास नहीं है. यानी राज्य सरकारें और संगठन. यहीं कांग्रेस को लगता है कि उसके पास अब भी बढ़त है. 

राज्यसभा सांसद और AICC टेक्नोलॉजी एंड डेटा सेल के अध्यक्ष प्रवीण चक्रवर्ती CJP से पैदा होने वाले खतरे की चर्चा को बेकार मानते हैं. उनका कहना है कि CJP राजनीतिक दल बनाने का फैसला कर सकती है लेकिन 2029 में उसका चुनावी असर बेहद सीमित रहेगा. इसलिए कांग्रेस को उसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर चिंता करने की जरूरत नहीं है.

चक्रवर्ती CJP को एक युवा आंदोलन के तौर पर ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं. उनका कहना है कि जंतर-मंतर के आंदोलन और उसके बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग ने दिखाया कि युवा एकजुट होकर ठोस बदलाव ला सकते हैं. इससे युवाओं में नया आत्मविश्वास पैदा हुआ है, जिसका भारतीय राजनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है.

चक्रवर्ती इस दावे से भी असहमत हैं कि CJP ने एक महीने में वह हासिल कर लिया, जिसे कांग्रेस वर्षों में नहीं कर सकी. वे इस बात को भी नहीं मानते कि अब अकेले CJP ही विपक्ष की भूमिका निभा रही है. 

उनका कहना है कि यह आंदोलन मोदी सरकार से 10 से 12 साल से बढ़ रहे असंतोष के बाद सामने आया. यह एक खास छात्र मुद्दे के इर्द-गिर्द शुरू हुआ और राहुल व कांग्रेस ने इसे काफी व्यापक बनाया.

चक्रवर्ती सवाल उठाते हैं, "अगर राहुल गांधी और हममें से बाकी लोगों ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन नहीं किया होता, संसद में लगातार यह मुद्दा नहीं उठाया होता और छात्रों की मांगों को व्यापक समर्थन नहीं दिलाया होता, तो क्या CJP के प्रदर्शन का उतना ही असर होता या वही नतीजा निकलता?" 

उनके मुताबिक जुलाई का नतीजा युवा आंदोलन और उसे मुख्य विपक्षी दल से मिले समर्थन का नतीजा था. ऐसा नहीं था कि एक ने दूसरे की कीमत पर सफलता हासिल की.

लोकसभा सांसद और तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष मणिकम टैगोर भी कुछ इसी तरह की दलील देते हैं, लेकिन इसे भौगोलिक संदर्भ में रखते हैं. उनका कहना है कि CJP का नेतृत्व और उसका मुख्य आधार महाराष्ट्र में है. 

वहां कई स्थापित दल और उनके नेता कमजोर या बिखरे हुए हैं, जबकि BJP संगठन के स्तर पर मजबूत बनी हुई है. ऐसे में CJP को वहां राजनीतिक जगह मिल सकती है. लेकिन इसके बाहर टैगोर को इस संगठन की इतनी पहुंच नजर नहीं आती.

टैगोर कहते हैं, " CJP के उठाए मुद्दों का असर राष्ट्रीय स्तर पर हो सकता है लेकिन इसके नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक शैली का असर कुछ राज्यों तक ही सीमित रहने की संभावना है."

टैगोर ने एक बार फिर 2011 का उदाहरण दिया. उनका कहना है कि AAP के उभरने से पहले BJP भी भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाती रही थी. लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन और AAP के राजनीतिक मैदान में उतरने से इस मुद्दे को बहुत बड़ा आधार मिला. 

भ्रष्टाचार राष्ट्रीय मुद्दा बन गया, जबकि AAP की चुनावी सफलता मुख्य रूप से दिल्ली तक सीमित रही. दूसरे राज्यों में बेहतर संगठन वाली BJP ने इस जगह को भर दिया और 2014 में कांग्रेस विरोधी भावना को वोट में बदल दिया.

कांग्रेस भी 2019 से मौजूदा चिंताओं को इसी तरह उठाती रही है. CJP को 20-30 दिनों के भीतर इसलिए तेजी से समर्थन मिला, क्योंकि उसके आने से इन मुद्दों को नई गति मिल गई. 

टैगोर कहते हैं, "किसी मुद्दे के आसपास माहौल बनाना और उसे लंबे समय तक मिलने वाले चुनावी समर्थन में बदलना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. आखिरकार उसी पार्टी को इसका फायदा मिलेगा, जिसके पास संगठन होगा और जो देशभर में उस भावना को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचा सकेगी."

हालांकि, इस तुलना का एक दूसरा पहलू भी है और कांग्रेस इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती. दिल्ली वह एकमात्र राज्य था जहां AAP अपने आंदोलन की गति को सीटों में बदल सकी. वहां उसने जिस पार्टी की जगह ली, वह कांग्रेस थी.

यह कहना भी सही नहीं होगा कि जुलाई 2026 में जो हुआ, उसकी कोई मिसाल नहीं है. 2015 में मजबूत विरोध और प्रदर्शनों के बाद मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को आगे नहीं बढ़ाया. नवंबर 2021 में करीब एक साल तक चले किसानों के विरोध के बाद उनकी सरकार ने तीन कृषि कानून वापस ले लिए. 

इस बार फर्क इसके प्रतीकात्मक महत्व का था. यह आंदोलन सोशल मीडिया से शुरू हुआ, एक बेहद युवा संवादकर्ता ने इसका नेतृत्व किया, मीम्स और ऑनलाइन अभियानों से आगे बढ़कर यह जंतर-मंतर तक पहुंचा और आखिरकार एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के इस्तीफे की वजह बना.

इसलिए कांग्रेस के लिए CJP एक मौका भी है और चेतावनी भी. उसके आंदोलन ने उन मुद्दों पर सरकार को कमजोर किया है, जिन्हें कांग्रेस खुद भी लंबे समय से उठाती रही है. 

इसने यह भी दिखाया है कि Gen Z को राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लामबंद किया जा सकता है. लेकिन इस आंदोलन ने उसी पीढ़ी के साथ संवाद करने में कांग्रेस की कमजोरी भी उजागर कर दी है.

कांग्रेस का जवाब CJP से टकराना या उसके साथ खड़ा होना नहीं है. वह उससे सीखते हुए उन चीजों पर भरोसा करना चाहती है, जो किसी आंदोलन के पास नहीं होतीं. संगठन, निर्वाचित सरकारें और देशभर में राजनीतिक नेटवर्क. 

राहुल के लगातार लक्षित युवा कार्यक्रम, बिना घोषणा किए किए जाने वाले सड़क प्रदर्शन और छात्रों की व्यक्तिगत शिकायतों से सीधे जुड़ने की कोशिश इसी बदलाव का हिस्सा हैं.

लेकिन यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह दो अनसुलझे सवालों पर निर्भर करेगा. पहला, क्या CJP अपनी डिजिटल लोकप्रियता और सड़क पर जुटने वाली भीड़ को लंबे समय तक टिकने वाले राजनीतिक संगठन में बदल पाएगी. 

दूसरा, क्या कांग्रेस अपनी भाषा, अपने संदेश देने वाले चेहरों और काम करने के तरीकों में इतनी तेजी से बदलाव कर पाएगी कि कोई नई राजनीतिक ताकत उस जगह पर कब्जा न कर ले, जिसे कांग्रेस स्वाभाविक रूप से अपना मानती है.

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