चीन के हेपेटाइटिस संकट से भारत क्या सबक सीख सकता है?

चीन जिस तरह से हेपेटाइटिस संकट का सामना कर रहा है, उससे यह जाहिर होता है कि केवल आर्थिक प्रगति से किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर नहीं हो सकती

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

एशिया लगातार वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य किसी भी देश की दीर्घकालिक मजबूती का सबसे अहम पैमाना बना हुआ है. हेल्थकेयर एनालिटिक्स कंपनी ग्लोबलडाटा (GlobalData) के हालिया रिपोर्ट ने चीन में हेपेटाइटिस C के बढ़ते बोझ पर फिर से ध्यान खींचा है.

अनुमान है कि 2035 तक चीन आठ प्रमुख वैश्विक दवा बाजारों में दर्ज होने वाले क्रॉनिक हेपेटाइटिस C के कुल मामलों में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी रखेगा. यानी देश में ऐसे मरीजों की संख्या 39 लाख से अधिक हो सकती है. यह अनुमान सिर्फ चीन की स्वास्थ्य चुनौती नहीं दिखाता बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण सबक पेश करता है.

बुनियादी ढांचे, मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी इनोवेशन में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद चीन अब भी अतीत की सार्वजनिक स्वास्थ्य कमियों के लंबे असर से जूझ रहा है. कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हेपेटाइटिस C के बड़ी संख्या में मामले 1980 और 1990 के दशक में असुरक्षित रक्त संग्रह और संक्रमण नियंत्रण की कमजोर व्यवस्था से जुड़े हैं.

उस समय कई प्रांतों में व्यावसायिक प्लाज्मा दान तेजी से बढ़ा था. बाद में चीन ने रक्त सुरक्षा के नियम कड़े किए और इलाज की पहुंच बढ़ाई लेकिन उस दौर के संक्रमण का असर आज भी दिखाई दे रहा है. इसी बीच, 2026 की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में चीन की आर्थिक वृद्धि भी काफी धीमी पड़ गई.

कमजोर घरेलू मांग और ईरान युद्ध के कारण तेल की कीमतों पर पड़े असर ने मजबूत निर्यात के बावजूद अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया. आधिकारिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस अवधि में 4.3 फीसद बढ़ी, जो चीन के वार्षिक लक्ष्य से कम है. पहली तिमाही में यह वृद्धि 5 फीसदी थी.

हेपेटाइटिस C को अक्सर 'साइलेंट डिजीज' यानी खामोश बीमारी कहा जाता है क्योंकि संक्रमित व्यक्ति में कई वर्षों तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देते. इलाज न मिलने पर यह वायरस धीरे-धीरे लीवर को नुकसान पहुंचाता है और सिरोसिस, लीवर फेल होने या लीवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है. आधुनिक डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल दवाएं समय पर पहचान होने पर 95 फीसद से ज्यादा मामलों में बीमारी को पूरी तरह ठीक कर सकती हैं. इसलिए समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी है.

ग्लोबलडाटा के अनुमान मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की पहचान है. लाखों लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि वे संक्रमित हैं, जब तक कि लीवर की गंभीर बीमारी विकसित न हो जाए. दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कमजोर वर्गों तक पहुंचने के लिए स्वास्थ्य ढांचे, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और समुदाय आधारित जांच कार्यक्रमों में लगातार निवेश की जरूरत है.

भारत के लिए चीन का अनुभव खास महत्व रखता है. भारत की आबादी भी बड़ी और भौगोलिक रूप से विविध है. महानगरों और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में काफी अंतर है. हालांकि भारत में हेपेटाइटिस C का अनुमानित प्रसार चीन के अनुमानित मामलों की तुलना में काफी कम है लेकिन विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि जांच में देरी और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुंच के कारण रोकी जा सकने वाली बीमारियां लंबे समय तक छिपी रह सकती हैं.

पिछले एक दशक में भारत ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. 2018 में शुरू किया गया राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (NVHCP) सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से वायरल हेपेटाइटिस की मुफ्त जांच, पहचान और इलाज उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखता है. साथ ही, कम कीमत वाली जेनेरिक डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल दवाओं की उपलब्धता ने दुनिया के कई अन्य देशों की तुलना में इलाज को काफी सुलभ बनाया है.

सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सस्ती दवाओं और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर भारत का जोर हेपेटाइटिस C से होने वाली मौतों को कम करने का अच्छा अवसर देता है. हालांकि, उनका यह भी कहना है कि लंबे समय तक सफलता के लिए लगातार निगरानी, जन-जागरूकता अभियान, सुरक्षित रक्त चढ़ाने की व्यवस्था और सरकारी व निजी दोनों स्वास्थ्य प्रणालियों में संक्रमण नियंत्रण जरूरी है.

चीन में बीमारी का अनुमानित बोझ एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है कि आर्थिक विकास और स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारी के बीच क्या संबंध है. तेज औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने करोड़ों चीनी नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार किया है लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था को अब भी पुरानी बीमारियों के बोझ के साथ-साथ तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं कई बड़े विकासशील देशों की साझा चुनौती हैं. दूरदराज के इलाकों तक विशेष जांच और लंबे समय तक चलने वाले इलाज पहुंचाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और प्रभावी रेफरल प्रणाली की जरूरत होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि कई वर्षों तक बिना पहचान के रहने वाली पुरानी बीमारियों से निपटने के लिए इन बुनियादी व्यवस्थाओं को मजबूत करना जरूरी है.

यह मुद्दा सिर्फ किसी एक देश तक सीमित नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं रहने देने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सिर्फ प्रभावी दवाएं उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है बल्कि व्यापक जांच, भरोसेमंद निगरानी व्यवस्था और सभी लोगों तक समान स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना भी जरूरी है. जिन बड़े देशों में बीमारी का बोझ ज्यादा है, वे इस वैश्विक लक्ष्य को हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे.

भारत के लिए चीन का अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक है कि केवल आर्थिक प्रगति से बेहतर स्वास्थ्य परिणाम नहीं मिल सकते. टिकाऊ विकास के लिए रोकथाम आधारित स्वास्थ्य सेवाओं, रोग निगरानी और समय पर पहचान में लगातार निवेश जरूरी है. कोविड-19 महामारी ने दिखाया कि स्वास्थ्य आपातकाल कितनी तेजी से मजबूत स्वास्थ्य प्रणालियों पर भी भारी दबाव डाल सकता है. इससे तैयारी और पारदर्शिता का महत्व और स्पष्ट हो गया.

स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास उच्च जोखिम वाले समूहों में हेपेटाइटिस की जांच बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने और वायरल हेपेटाइटिस सेवाओं को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का अच्छा अवसर है. डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, प्रयोगशालाओं की क्षमता और अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों में लगातार निवेश से बीमारी की समय पर पहचान और इलाज के बेहतर परिणाम मिल सकते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि एशिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां भविष्य में क्षेत्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक उत्पादकता पर बड़ा असर डालेंगी. जहां चीन में हेपेटाइटिस C का बढ़ता बोझ अतीत की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के लंबे असर को दिखाता है, वहीं यह हर देश के लिए यह याद दिलाता है कि प्रिवेंटिव हेल्थ केयर सर्विसेज यानी रोकथाम आधारित स्वास्थ्य सेवाओं में लंबे समय तक निवेश करना बेहद जरूरी है.

आखिरकार, किसी देश की ताकत सिर्फ उसकी आर्थिक उपलब्धियों या तकनीकी प्रगति से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वह अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की कितनी अच्छी तरह रक्षा कर पाता है. भारत के लिए एशिया में बदलता हेपेटाइटिस C का परिदृश्य एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी, ताकि रोकी जा सकने वाली बीमारियां आने वाले वर्षों में बड़ा सामाजिक और आर्थिक बोझ बनने से पहले ही रोका जा सके. 

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