चीन की आर्थिक सुस्ती में छिपा है भारत के लिए बड़ा मौका!

चीन की धीमी आर्थिक वृद्धि भारत के लिए निवेश और मैन्युफैक्चरिंग का अवसर खोल रही है लेकिन बीजिंग की मजबूत औद्योगिक क्षमता इस राह को आसान नहीं होने देगी

भारत 'मेक इन इंडिया' जैसे योजनाओं से अपनी कंपनियों को मजबूती दे रहा है

चार दशकों तक चीन ने दुनिया की सबसे ताकतवर आर्थिक व्यवस्थाओं में से एक खड़ी की. सस्ती पूंजी, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे पर खर्च, सरकार समर्थित निवेश और निर्यात केंद्रित मैन्युफैक्चरिंग मॉडल ने चीन को दुनिया की फैक्ट्री में बदल दिया.

लेकिन अब यह मशीन धीमी पड़ने लगी है. चीन किसी आर्थिक पतन के कगार पर नहीं है. उसका विशाल विनिर्माण आधार, मजबूत सप्लाई चेन, तकनीकी क्षमताएं और धन व संसाधनों को दिशा देने की सरकार की क्षमता उसे काफी ताकत देती है. 

बड़ी समस्या कुछ और है. चीन की असाधारण आर्थिक वृद्धि को आगे बढ़ाने वाला मॉडल अब पहले जैसे नतीजे नहीं दे रहा है.

राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में बीजिंग निवेश और निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था से घरेलू खर्च पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्था की ओर मुश्किल बदलाव करने को तैयार नहीं दिख रहा है. इसके बजाय वह मैन्युफैक्चरिंग, उन्नत तकनीक और निर्यात में और अधिक पैसा लगा रहा है.

इस फैसले का असर चीन से कहीं आगे तक पड़ता है. भारत के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है. समस्या यह है कि चीन चीजें बनाने में बेहद माहिर है लेकिन चीनी उपभोक्ता पर्याप्त मात्रा में उन्हें खरीद नहीं रहे हैं.

वर्षों से बीजिंग ने घरेलू खर्च करने की क्षमता बढ़ाने के बजाय निवेश और सरकारी संस्थानों पर अधिक ध्यान दिया. सस्ता कर्ज बुनियादी ढांचे, रियल एस्टेट और कारखानों में लगाया गया. स्थानीय सरकारें अपने खर्च को पूरा करने के लिए जमीन की बिक्री और कर्ज पर काफी हद तक निर्भर रहीं. दूसरी तरफ चीनी परिवारों ने भी रियल एस्टेट को अपनी संपत्ति बनाने और बचत निवेश करने का मुख्य जरिया बना लिया.

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन उन्नत मैनफ्यूफैक्चरिंग और रणनीतिक तकनीकों पर ज्यादा जोर दे रहा है

चीन पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अब यह मॉडल गंभीर दबाव में है. जानकारी के मुताबिक स्थिर परिसंपत्तियों में निवेश कमजोर हुआ है. बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से मिलने वाला रिटर्न कम हो रहा है. कभी आर्थिक वृद्धि और घरेलू संपत्ति का बड़ा स्रोत रहा रियल एस्टेट क्षेत्र ऐतिहासिक गिरावट के दौर से गुजर रहा है.

विशेषज्ञों बताते हैं कि चीन का गैर-वित्तीय कर्ज भी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 300 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है. सरकारी बैंकों के जरिए संकट में फंसे कर्ज को जारी रखा जा सकता है, लेकिन वे खाली अपार्टमेंट, कम इस्तेमाल वाले औद्योगिक पार्क और गैर-जरूरी बुनियादी ढांचे को उत्पादक परिसंपत्तियों में नहीं बदल सकते.

कमजोर घरेलू मांग के जवाब में शी ने उन्नत मैनफ्यूफैक्चरिंग और रणनीतिक तकनीकों पर और जोर दिया है. इलेक्ट्रिक वाहन, सौर उपकरण, बैटरी, रोबोटिक्स और सेमीकंडक्टर को सब्सिडी, सस्ते कर्ज और दूसरी तरह की सहायता के जरिए सरकार से बड़े पैमाने पर समर्थन मिला है.

इसका नतीजा एक ऐसी औद्योगिक व्यवस्था के रूप में सामने आया है जो चीन के अपने उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता से कहीं अधिक उत्पादन कर सकती है. जब चीनी उपभोक्ता इस पूरे उत्पादन को खपाने में सक्षम नहीं होते तो चीनी कंपनियों को विदेशों का रुख करना पड़ता है.

उपलब्ध सूचनाओं के मुताबिक 2025 में चीन का व्यापारिक वस्तुओं का ट्रेड सरप्लस 1.189 ट्रिलियन डॉलर रहा. निर्यात में मजबूत वृद्धि हुई जबकि आयात लगभग स्थिर रहा. 2026 में भी निर्यात की वृद्धि जारी रही. इसमें AI और उन्नत हार्डवेयर की वैश्विक मांग का भी योगदान रहा.

एक अन्य रणनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत की चुनौती यहीं से शुरू होती है. भारत ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए अपना विनिर्माण आधार खड़ा करने की कोशिश कर रहा है. साथ ही वह इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, बैटरी, सौर उपकरण, सेमीकंडक्टर और रक्षा उत्पादों के लिए घरेलू सप्लाई चेन विकसित करने की कोशिश कर रहा है.

ऐसे में चीन की जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता का असर ठीक उस समय बढ़ सकता है, जब भारत खुद को वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि सस्ते चीनी सामान से अल्पावधि में भारतीय उपभोक्ताओं और कारोबारों को फायदा हो सकता है. 

चीन AI पर भारी भरकम निवेश कर रहा है

लेकिन भारी सब्सिडी वाले आयात की बाढ़ भारतीय निर्माताओं के लिए अपने कारोबार को बढ़ाना, निवेश करना और प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल भी बना सकती है. इसलिए यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं है. यह इस बात से भी जुड़ा है कि क्या चीन का अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक बाजारों में और बड़ी ताकत बनने से पहले भारत अपने उद्योगों को पर्याप्त मजबूत बना सकता है.

अमेरिका और यूरोप चीन की बढ़ती औद्योगिक क्षमता का विरोध कर रहे हैं. ऐसे में निर्यात पर चीन की निर्भरता को संभालना मुश्किल होता जा रहा है. 

टैरिफ, सब्सिडी विरोधी जांच और तकनीकी प्रतिबंध चीन के लिए विदेशी बाजारों को अतिरिक्त उत्पादन खपाने का असीमित जरिया बनाना मुश्किल कर रहे हैं. इससे उन बाजारों में प्रतिस्पर्धा और भी कड़ी हो सकती है, जहां भारतीय कंपनियां अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.

एक और मुद्दा है जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता. कमजोर चीनी अर्थव्यवस्था का मतलब अपने आप रणनीतिक रूप से कमजोर चीन नहीं है. बीजिंग अपने औद्योगिक हितों की रक्षा करने, विदेशी बाजारों को सुरक्षित करने, महत्वपूर्ण सप्लाई चेन पर नियंत्रण बनाए रखने और तकनीकी प्रभाव बढ़ाने के लिए और अधिक सख्त हो सकता है.

आर्थिक रूप से कमजोर चीन फिर भी बेहद ताकतवर सैन्य शक्ति बना रह सकता है. चीन का विशाल विनिर्माण आधार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को ऐसे औद्योगिक तंत्र तक पहुंच देता है, जो बड़े पैमाने पर जहाज, ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे सैन्य उपकरण बना सकता है. 

इसलिए आर्थिक कमजोरी को रणनीतिक कमजोरी समझना ठीक नहीं होगा. भारत के लिए यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है.

चीन पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग की सबसे बड़ी समस्या उसके कारखाने, निर्यात या यहां तक कि रियल एस्टेट बाजार भी नहीं हो सकते. समस्या चीनी परिवार हो सकते हैं. 

चीनी परिवार अब भी बड़े पैमाने पर बचत करते हैं क्योंकि उन्हें पेंशन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और संपत्ति की गिरती कीमतों की चिंता रहती है. युवाओं में बेरोजगारी, घटती आबादी और बेहद कम जन्म दर दबाव को और बढ़ा रहे हैं.

आर्थिक तौर पर कमजोर होने के बावजूद चीन बड़ी सैन्य ताकत बना रह सकता है

कामकाजी आबादी घट रही है जबकि आबादी एक हिस्सा बूढ़ा हो रहा है. इससे लगातार बढ़ते निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा. 

उपभोक्ता खर्च पर आधारित आर्थिक सुधार के लिए बीजिंग को सीधे परिवारों के हाथ में अधिक पैसा देना होगा और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी. लेकिन ऐसा करने का मतलब सरकारी निवेश वाली व्यवस्था से संसाधनों को हटाना होगा.

अब तक शी ने बड़े पैमाने पर संसाधनों के पुनर्वितरण की तुलना में औद्योगिक नीति और सरकारी नियंत्रण पर अधिक भरोसा दिखाया है. यही मुख्य समस्या है. चीन के पास कारखाने हैं. उसके पास बंदरगाह, बुनियादी ढांचा, इंजीनियर और पूंजी है. कमी है तो बस उस घरेलू मांग की जो उसके उद्योगों में बनने वाली हर चीज खरीदी सके.

चीन का आर्थिक बदलाव भारत के सामने अवसर और चेतावनी, दोनों रखता है. अवसर साफ है. चीन में बढ़ती लागत, जनसांख्यिकीय दबाव और बढ़ते व्यापार तनाव वैश्विक कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. 

भारत के पास इस निवेश का कुछ हिस्सा आकर्षित करने और खुद को वैकल्पिक विनिर्माण आधार के रूप में पेश करने का मौका है.

लेकिन भारत को यह नहीं मान लेना चाहिए कि ‘चीन प्लस वन’ रणनीति अपने आप कारखानों को भारत ले आएगी. चीन के पास अब भी वे फायदे हैं, जिन्हें भारत खड़ा करने की कोशिश कर रहा है. इनमें सप्लायर्स के मजबूत नेटवर्क, बड़े बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स सिस्टम, विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर, कुशल औद्योगिक कामगार और उस पैमाने पर पूंजी जुटाने की क्षमता शामिल है, जिसकी बराबरी बहुत कम देश कर सकते हैं.

चेतावनी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. अगर चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था कमजोर बनी रहती है तो बीजिंग के निर्यात पर और अधिक निर्भर होने की संभावना है. इससे वैश्विक बाजारों में, जिसमें भारत भी शामिल है, कई वर्षों तक कीमतों को लेकर तीखी प्रतिस्पर्धा हो सकती है.

भारतीय कंपनियों के लिए जरूरी है कि वे सरकारी संरक्षण से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें

इसलिए भारत को चीन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को सिर्फ व्यापार की समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए. यह औद्योगिक और रणनीतिक चुनौती भी है. 

भारत को मजबूत घरेलू कंपनियों, भरोसेमंद और सस्ती बिजली, कम लॉजिस्टिक्स लागत, आपूर्तिकर्ताओं के व्यापक नेटवर्क, सरकारी मंजूरियों में तेजी और अधिक स्थिर कारोबारी माहौल की जरूरत है.

सिर्फ संरक्षण के जरिए विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय उद्योग खड़े नहीं किए जा सकते. लक्ष्य यह होना चाहिए कि मौजूदा भू-राजनीतिक अवसर का इस्तेमाल ऐसी कंपनियां और फैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं खड़ी करने में किया जाए जो स्थाई संरक्षण के बिना प्रतिस्पर्धा कर सकें.

चीन के जल्द आर्थिक पतन की भविष्यवाणियां बढ़ा-चढ़ाकर की जा रही हैं. बीजिंग ने बार-बार दिखाया है कि वह वित्तीय झटकों को झेल सकता है, कर्ज का पुनर्गठन कर सकता है और अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है. 

चीन का विनिर्माण आधार और उसकी तकनीकी क्षमताएं अब भी बेहद मजबूत हैं. लेकिन संकट झेलने की क्षमता और मजबूत आर्थिक वृद्धि एक जैसी चीजें नहीं हैं. बड़ा सवाल यह है कि जब घरेलू मांग कमजोर हो और विदेशी बाजार पहले की तुलना में कम खुले हों, तब क्या चीन अधिक निवेश, अधिक उत्पादन और अधिक निर्यात के जरिए उच्च गुणवत्ता वाली आर्थिक वृद्धि बनाए रख सकता है. 

शी ने ऐसी आर्थिक व्यवस्था खड़ी की है जो चीजें बनाने में असाधारण रूप से सक्षम है. लेकिन अनसुलझी समस्या यह है कि चीनी परिवारों में इतना भरोसा कैसे पैदा किया जाए कि वे खर्च करने के लिए तैयार हों.

अगर बीजिंग यह बदलाव नहीं कर पाता तो चीन को कोई नाटकीय आर्थिक संकट झेलना जरूरी नहीं है. इसके बजाय उसे कहीं अधिक लंबी समस्या का सामना करना पड़ सकता है. धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ता कर्ज, अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता और विदेशी बाजारों के लिए लगातार तेज होती प्रतिस्पर्धा.

भारत के लिए यह अगले दशक की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियों में से एक बन सकती है. धीमी गति से बढ़ने वाला चीन जरूरी नहीं कि कम ताकतवर चीन हो. 

वह ऐसा चीन बन सकता है, जो अपने आर्थिक और तकनीकी प्रभाव की रक्षा के लिए और अधिक जोर लगाए. नई दिल्ली के लिए संदेश सीधा है: चीन की सुस्ती आराम करने की वजह नहीं है. यह और तेजी से आगे बढ़ने की वजह है.

जो देश प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री खड़ी करेंगे, अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करेंगे और वैश्विक निवेश की अगली लहर को आकर्षित करेंगे उनकी चीन के बाद बनने वाली आर्थिक व्यवस्था को आकार देने में बड़ी भूमिका होगी. भारत के पास एक अवसर है. लेकिन यह अवसर हमेशा के लिए खुला नहीं रहेगा.

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