मुस्लिम महिला को ईसाइयों के कानून से मिल सकता है संपत्ति में हिस्सा? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
सवाल बड़ा दिलचस्प है कि क्या किसी मुस्लिम महिला को भारतीय उत्तराधिकार कानून जिसमें ईसाई और पारसी आते हैं उसके तहत पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिल सकता है

मुस्लिम परिवार में पैदा होने वाली एक महिला ने अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगा है. लेकिन उसने पैतृक संपत्ति में जो हिस्सेदारी मांगी है वह शरीया के तहत नहीं बल्कि भारतीय उत्तराधिकार कानून के तहत मांगी है. महिला ने तर्क दिया है कि उसकी आस्था इस्लाम में नहीं है. अब यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में है जिस पर सीजेआई चंद्रचूड़ के अगुवाई वाली बेंच विचार कर रही है.
केरल की रहने वाली मुस्लिम महिला साफिया के पूर्वजों ने इस्लाम कुबूल किया था. लेकिन पिता की पीढ़ी से उसके परिवार ने इस्लाम धर्म के प्रति अपनी आस्था को छोड़ दिया. साफिया केरल में पूर्व मुस्लिमों के एक संघ की महासचिव भी हैं. अपनी याचिका में उन्होंने कहा है कि वे आधिकारिक तौर पर मुसलमान ही हैं, पर अब उनकी आस्था इस्लाम में नहीं है.
साफिया ने तर्क दिया है कि संविधान का अनुच्छेद-25 उसे किसी भी धर्म में आस्था रखने या न रखने की आजादी देता है. साथ ही उनका यह भी कहना है कि उनके पिता इस्लाम में आस्था नहीं रखते, जिस वजह से वे शरीया के मुताबिक अपनी वसीयत नहीं लिखना चाहते.
महिला के वकीलों के तर्क और उनकी अर्जी पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ में 29 अप्रैल को विचार-विमर्श हुआ. इसके बाद कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र की नियुक्ति का आदेश दिया, ताकि अदालत इस मामले के कानूनी और तकनीकि पहलुओं को जान सके.
हालांकि साफिया की याचिका में एक कानूनी पेच यह भी फंस रहा है कि मुस्लिम परिवार में पैदा हुए किसी भी व्यक्ति को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक दिया जाता है. लेकिन साफिया भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के मुताबिक अपनी संपत्ति का बंटवारा चाहती हैं.
वहीं साफिया के वकीलों ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि उनका भाई एक अनुवांशिक बिमारी से पीड़ित हे, लिहाजा शरीया कानून के मुताबिक उसे पतृक संपत्ति का दो तिहाई और साफिया को एक तिहाई हिस्सा मिलेगा. साथ ही वकीलों मे कोर्ट से दरख्वास्त करते हुए यह भी कहा कि, अदालत यह ऐलान करे कि साफिया पर मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू नहीं होगा.
इस पूरे मामले पर कानूनी दांव-पेच के बारे में समझाते हुए सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट विराग गुप्ता का कहना है, "अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसकी वसीयत तैयार नहीं है तो उत्तराधिकार कानून के मुताबिक उसकी संपत्ति का बंटवारा किया जाता है."
भारत में संपत्ति के बंटवारे के मामले में हिंदुओं पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है. जबकि पारसी और ईसाई धर्म के लोगों के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 है. मुस्लिम धर्म के लोगों की सम्पत्ति और उत्तराधिकार का निर्धारण उनके पर्सनल लॉ या शरीया के अनुसार होता है.
अपनी बात में विराग आगे कहते हैं कि भारत में धार्मिक पाबंदियों के बगैर सेकुलर तरीके से शादी करने के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 बनाया गया है. लेकिन एक मुद्दा यह भी है कि नास्तिक लोग यानि जिनकी किसी भी धर्म में आस्था नहीं हो उनके लिए संपत्ति में उत्तराधिकार के लिए संसद से कोई कानून नहीं बना.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद-25 भी लोगों को किसी धर्म में आस्था रखने या ना रखने की आजादी देता है. साथ ही संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत सभी लोगों को कानून के सामने बराबरी का दर्जा मिला है. अनुच्छेद-15 (2) के तहत धर्म, जाति, लिंग और स्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं हो सकता. धर्म परिवर्तन के मामले में कोई व्यक्ति अपने राज्य के कानूनों के मुताबिक जिला प्रशासन को सूचना देकर उससे संबंधित प्रमाण पत्र हासिल भी कर सकता है.
एडवोकेट विराग के मुताबिक, "अगर किसी ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है तो उत्तराधिकार से जुड़े फैसले भी उसी धर्म के कानूनों के मुताबिक होंगे. लेकिन कोई व्यक्ति अपना धर्म त्याग दे तो फिर ऐसे नास्तिक लोगों से जुड़े सम्पत्ति के उत्तराधिकार के मामलों के लिए विवाह की तरह भारत में विशेष कानून नहीं है."
तो केरल की रहने वाली साफिया के मामले में क्या फैसला हो सकता है? इस पर विराग का मानना है कि मुस्लिम धर्म छोड़ने वाले व्यक्ति को इण्डियन सक्सेशन एक्ट के तहत सम्पत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार मिलना मुश्किल है क्योंकि यह व्यवस्था सिर्फ पारसी और ईसाई धर्म के लोगों के लिए बनाई गई है. 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो मामले में सीआरपीसी की धारा-125 (1) ए के तहत गुजारा भत्ता देने का फैसला दिया था.
अगर इसी उदाहरण को आधार बनाएं तो सम्पत्ति से जुड़े उत्तराधिकार के मामलों में अदालत सिविल प्रोसिजर कोड के कानून के प्रावधानों के तहत मामले पर विशेष तरीके से सुनवाई और फैसला कर सकती है.
विराग कहते हैं कि इस विवाद से समान नागरिक संहिता कानून की जरूरत भी सामने आती है. इसके तहत सभी धर्म के लोगों पर सम्पत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में समान कानूनी व्यवस्था लागू होगी. ऐसा होने पर महिलाओं के अधिकारों की भी सुरक्षा होगी, जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद-14 और 15 में प्रावधान किये गये हैं. साफिया के मामले में अब सुनवाई जुलाई के दूसरे हफ्ते में होनी है.