ब्रह्मोस की तकनीक दुश्मन के हाथों में पहुंचने का कितना खतरा?
इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने की तैयारी के बीच भारत के सामने चुनौती अपनी संवेदनशील सैन्य तकनीक को तीसरे देशों की पहुंच से सुरक्षित रखने की भी है

ब्रह्मोस मिसाइल (फाइल फोटो)
आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से बातचीत में राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को संवेदनशील सैन्य तकनीक देने के जोखिमों को लेकर वॉशिंगटन को आगाह किया. यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब भारत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने की तैयारी कर रहा है. इंडोनेशिया के भारत के प्रतिद्वंद्वियों के साथ भी करीबी संबंध हैं.
28 अक्टूबर को फिलीपींस के सेबू में आसियान शिखर सम्मेलन से इतर अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बातचीत के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वॉशिंगटन को आगाह किया कि पाकिस्तान को संवेदनशील सैन्य तकनीक देने से उसके किसी ‘तीसरे देश’ के हाथों में पहुंचने का जोखिम है.
सिंह ने पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों के बेड़े को लेकर अमेरिका के समर्थन पर चिंता जताते हुए चीन और ईरान की ओर भी इशारा किया. हाल ही में अमेरिका ने 68.6 करोड़ डॉलर के एक अपग्रेड पैकेज को मंजूरी दी थी जिसमें उन्नत एवियोनिक्स, क्रिप्टोग्राफिक सिस्टम और क्रिप्टोग्राफिक मॉड्यूल शामिल हैं.
संवेदनशील सैन्य तकनीक का अनचाहे पक्ष के हाथों में पहुंच जाना उन देशों के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रहा है जो एडवांस्ड वेपन सिस्टम का निर्यात करते हैं. दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें अत्याधुनिक सैन्य उपकरण और गोपनीय तकनीकी जानकारियां तीसरे पक्ष के हाथों में पहुंच गईं.
इस तरह की जानकारी लीक होने से सैन्य अभियानों में बढ़त कमजोर पड़ सकती है, संवेदनशील क्षमताओं का खुलासा हो सकता है और उन्नत हथियार प्रणालियों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. यह खतरा सिर्फ जासूसी या साइबर हमलों से नहीं है. युद्ध के मैदान में हथियारों का छूट जाना, सैन्य उपकरणों पर कब्जा हो जाना, बिना अनुमति उनका हस्तांतरण और सप्लाई चेन की सुरक्षा में खामियां भी उतना ही नुकसान पहुंचा सकती हैं.
भारत भी इन जोखिमों के दायरे में तेजी से आ रहा है क्योंकि वह अपने रक्षा निर्यात का विस्तार कर रहा है और स्वदेशी सैन्य प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार रहा है. इनमें सबसे संवेदनशील प्रणालियों में से एक ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जिसे भारत और रूस ने मिलकर विकसित किया है.
हाल के घटनाक्रमों ने इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने की भारत की संभावित योजना पर ध्यान खींचा है. पहला घटनाक्रम 21 अक्टूबर को दोहा में पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रियों के बीच हुआ बद्र समझौता ज्ञापन है. इसके जरिए डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, अनुसंधान एवं विकास, तकनीक साझा करने और सैन्य प्रशिक्षण में सहयोग के लिए एक नया ढांचा तैयार हुआ है.
दूसरा घटनाक्रम चीन के साथ इंडोनेशिया के बढ़ते संबंध हैं. इंडोनेशिया के छात्र चीनी भाषा मंदारिन और मेटलर्जी जैसे तकनीकी विषयों की पढ़ाई के लिए चीन के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में जा रहे हैं. शैक्षणिक आदान-प्रदान अपने आप में सैन्य तकनीक के हस्तांतरण का सबूत नहीं है लेकिन संवेदनशील रक्षा निर्यात से जुड़े रणनीतिक माहौल का आकलन करते समय दोनों देशों के व्यापक संबंधों को ध्यान में रखना जरूरी है.
तीसरा पहलू यह है कि इंडोनेशिया की निजी कंपनियां ब्रह्मोस मिसाइल की खरीद के लिए स्थानीय साझेदार के तौर पर काम करती हैं. वे घरेलू स्तर पर प्रतिनिधित्व और सहायता का प्रबंधन करती हैं और भारतीय तथा इंडोनेशियाई रक्षा कंपनियों के साथ सहयोग करती हैं.
इन कंपनियों के पाकिस्तान और तुर्किये के साथ कारोबारी संबंधों और सब-कॉन्ट्रेक्ट की व्यवस्थाओं की जानकारी सामने आई है. ब्रह्मोस की खरीद प्रक्रिया के दौरान संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस मामले को सावधानी से संभालने की जरूरत है.
जुलाई में भारत और इंडोनेशिया ने कथित तौर पर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों और अस्त्र एमके-1 हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की खरीद से जुड़े समझौते को औपचारिक रूप दिया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजकीय यात्रा के दौरान जकार्ता में इंडोनेशियाई राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ बातचीत के बाद यह घोषणा हुई. ब्रह्मोस के निर्यात बाजार में इंडोनेशिया का प्रवेश भारत की रक्षा साझेदारियों के विस्तार और रक्षा निर्यातक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिशों में एक और महत्वपूर्ण कदम है.
भारत के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग के संदर्भ में इंडोनेशिया की ब्रह्मोस में दिलचस्पी अहम है. दोनों देशों ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी विकसित की है जिसमें रक्षा सहयोग उनके संबंधों का एक प्रमुख आधार बनकर उभरा है. साथ ही इंडोनेशिया ने चीन के साथ आर्थिक और बुनियादी ढांचे से जुड़े संबंध भी मजबूत किए हैं.
इसमें चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) में उसकी भागीदारी भी शामिल है. ये अलग-अलग साझेदारियां दिखाती हैं कि जकार्ता अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है. लेकिन ये संवेदनशील रक्षा सहयोग से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को सावधानी से संभालने की जरूरत भी रेखांकित करती हैं.
सैन्य मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत के लिए मुख्य सवाल यह नहीं है कि इंडोनेशिया को चीन या अन्य देशों के साथ संबंध रखने चाहिए या नहीं. सवाल यह है कि क्या किसी एडवान्स्ड वेपन सिस्टम का निर्यात इस तरह किया जा सकता है कि उससे जुड़ी तकनीक, सॉफ्टवेयर, परिचालन संबंधी आंकड़ों और तकनीकी विशेषज्ञता की सुरक्षा बनी रहे, भले ही खरीदार देश के दूसरे देशों के साथ राजनयिक संबंध कैसे भी हों.
अंतरराष्ट्रीय रक्षा उद्योग के अनुभव इस बारे में कई अहम सबक देते हैं. किसी वेपन सिस्टम की सुरक्षा सिर्फ उसके निर्माता की प्रतिष्ठा या राष्ट्रीयता पर निर्भर नहीं करती. उसके पुर्जों, सॉफ्टवेयर, रखरखाव की व्यवस्था, डेटा लिंक और सप्लाई चेन की विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है. सुरक्षा में छोटी-सी सेंध भी किसी विरोधी को ऐसी जानकारी दे सकती है, जिससे वह किसी एडवांस्ड मिलेटरी सिस्टम को समझ सके, उसकी नकल कर सके या उसके खिलाफ बचाव के उपाय विकसित कर सके.
इसका एक प्रमुख उदाहरण नोशिर गोवाडिया हैं. वे बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर से जुड़ी तकनीक पर काम करने वाले इंजीनियर थे. इसमें विमान की इन्फ्रारेड पहचान को कम करने वाले सिस्टम भी शामिल थे. गोपनीय रक्षा जानकारी चीन को देने के मामले में उन्हें जासूसी से जुड़े अपराधों का दोषी ठहराया गया और 32 साल की जेल की सजा सुनाई गई.
सप्लाई चेन की सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती है. इस साल सितंबर में आई रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि ऑस्ट्रेलिया के एक एफ-35 विमान के कुछ पुर्जे, जिनमें कॉकपिट की छतरी और हथियार रखने वाले हिस्से का दरवाजा शामिल था, अमेरिका भेजे जाते समय हांगकांग पहुंचा दिए गए.
इन पुर्जों को दूसरी जगह कैसे भेजा गया, वे आखिर किसके पास पहुंचे और उनसे कितनी संवेदनशील जानकारी मिल सकती थी, इसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. फिर भी ये आरोप एक बड़ी चिंता को उजागर करते हैं: संवेदनशील रक्षा उपकरण युद्ध में खोए बिना या किसी विदेशी सेना को जानबूझकर सौंपे बिना भी जोखिम में पड़ सकते हैं.
युद्ध के मैदान में हथियारों का छूट जाना भी उन्नत तकनीक के उजागर होने का एक रास्ता है. दिसंबर 2011 में ईरान को अमेरिका के आरक्यू-170 सेंटिनल स्टील्थ निगरानी ड्रोन तक पहुंच मिल गई थी. यह ड्रोन ईरानी क्षेत्र में गिर गया था. इसके बाद तेहरान ने दावा किया कि उसने विमान से तकनीकी जानकारी निकाली और उसके डिजाइन के कुछ हिस्सों की रिवर्स इंजीनियरिंग की.
ऐसी ही घटना 1999 में हुई थी, जब कोसोवो संघर्ष के दौरान यूगोस्लाविया के एयर डिफेंस सिस्टम ने अमेरिका के एफ-117 नाइटहॉक स्टील्थ विमान को मार गिराया था. विमान का मलबा उसके डिजाइन और स्टील्थ तकनीक के कुछ पहलुओं की जांच करने का अवसर था. बाद की कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि चीन को भी मलबे के कुछ हिस्सों तक पहुंच मिली थी.
यह जोखिम सिर्फ पूरे विमान तक सीमित नहीं है. जुलाई 2024 में रूसी सरकारी मीडिया ने बताया कि रूसी सेना ने अमेरिका में बने आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम (ATACMS) की एक मिसाइल से उसका गाइडेंस सिस्टम बरामद किया था.
इस मिसाइल का इस्तेमाल यूक्रेन ने किया था. ईरान ने भी अमेरिका में बने स्कैनईगल निगरानी ड्रोन को कब्जे में लेने का दावा किया है और ऐसे उपकरण प्रदर्शित किए हैं, जिन्हें उसने बरामद विमान बताया.
साइबर जासूसी एक अलग लेकिन उतना ही गंभीर खतरा है. अमेरिकी अधिकारियों और रक्षा विश्लेषकों ने आरोप लगाया है कि चीन के साइबर अभियानों के जरिए एफ-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान कार्यक्रम से जुड़ी संवेदनशील जानकारी हासिल की गई. रिपोर्टों में दावा किया गया कि चोरी हुए तकनीकी आंकड़ों से चीन को जे-20 समेत उन्नत लड़ाकू विमान विकसित करने में मदद मिली हो सकती है.
ये मामले भारत की रक्षा निर्यात संबंधी महत्वाकांक्षाओं के लिए प्रासंगिक हैं क्योंकि ब्रह्मोस सिर्फ किसी विदेशी खरीदार को दी जाने वाली मिसाइल नहीं है. यह एक इंटीग्रेटेड वेपन सिस्टम है जिसकी प्रभावशीलता विशेष पुर्जों, मार्गदर्शन और नियंत्रण तकनीक, सॉफ्टवेयर, परीक्षण प्रक्रियाओं, रखरखाव सहायता और परिचालन प्रणालियों के साथ तालमेल पर निर्भर करती है.
इसलिए जोखिम का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि हथियार कौन-सा देश खरीद रहा है. भारत को यह भी देखना होगा कि उसकी देखरेख और रखरखाव कौन करेगा, किन ठेकेदारों को संवेदनशील पुर्जों तक पहुंच मिलेगी, तकनीकी आंकड़े कहां रखे जाएंगे और उनका आदान-प्रदान कैसे होगा. प्रशिक्षण, मरम्मत या अपग्रेडेशन के दौरान तीसरे पक्ष के लोगों को उन तक पहुंच मिलने की आशंका पर भी विचार करना होगा.
रक्षा निर्यातक के रूप में भारत का उभरना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. एक प्रमुख सैन्य विशेषज्ञ कहते हैं कि ब्रह्मोस जैसी प्रणालियां उन्नत सैन्य तकनीक विकसित करने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने, रक्षा साझेदारियां मजबूत करने और आयात पर निर्भरता घटाने की भारत की बढ़ती क्षमता को दिखाती हैं. लेकिन इस क्षेत्र में व्यावसायिक सफलता और रणनीतिक विश्वसनीयता आखिरकार इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने निर्यात किए गए हथियारों और उनसे जुड़ी तकनीक की सुरक्षा कर पाता है या नहीं.
सैन्य मामलों के एक जानकार के मुताबिक, "दूसरे देशों के अनुभव बताते हैं कि उन्नत सैन्य तकनीक जासूसी, साइबर हमलों, युद्ध के मैदान में हथियारों के हाथ लग जाने और सप्लाई चेन के मैनेजमेंट में चूक से उजागर हो सकती है. निर्यात की कोई भी व्यवस्था हर जोखिम को खत्म नहीं कर सकती. लक्ष्य यह होना चाहिए कि बिना अनुमति पहुंच हासिल करना बहुत मुश्किल बनाया जाए, सुरक्षा में सेंध का जल्द पता लगाया जाए और ऐसा होने पर नुकसान को सीमित रखा जाए."