युवा नेताओं को आगे बढ़ाते हुए BJP कहां खींचती है लगाम?

भारतीय जनता युवा मोर्चा में नियुक्तियां दिखाती हैं कि BJP युवा नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को कैसे बढ़ावा देती है और साथ ही उनके राजनीतिक असर को भी सावधानी से नियंत्रित करती है

BJP अध्यक्ष नितिन नवीन (फाइल फोटो)

इस हफ्ते BJP ने दो पत्र जारी किए. पहला, 20 अक्टूबर की देर रात जारी हुआ. इसमें भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के पदाधिकारियों के नाम थे. इनमें सात उपाध्यक्ष, तीन महासचिव और सात सचिव शामिल हैं. 

दूसरे पत्र में अगली सुबह राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 34 सदस्यों के नाम घोषित किए गए. इनमें से किसी सूची ने ज्यादा चर्चा नहीं बटोरी. युवा मोर्चे की सूचियों के साथ आम तौर पर ऐसा ही होता है. लेकिन पार्टी के युवा विधायकों में से किन्हें इन सूचियों में जगह मिली और किन्हें नहीं, इस पर नजर डालें तो इन पत्रों से कुछ संकेत मिलने लगते हैं.

BJP के 35 साल या उससे कम उम्र के चार विधायकों को इनमें जगह मिली है. वडोदरा के 35 वर्षीय सांसद हेमंग जोशी अगस्त से युवा मोर्चे की कमान संभाल रहे हैं. किश्तवाड़ की 31 वर्षीय विधायक शगुन परिहार अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा में भातार का प्रतिनिधित्व करने वाले 34 वर्षीय सौमेन करफा भी उपाध्यक्ष बनाए गए हैं. वहीं बिहार में पिछले साल नवंबर में अलीनगर विधानसभा सीट जीतने वाली 26 वर्षीय लोकगायिका मैथिली ठाकुर को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिली है हालांकि उन्हें कोई पदाधिकारी नहीं बनाया गया है.

इसी उम्र के कम से कम चार अन्य विधायक दोनों सूचियों में जगह नहीं बना पाए. इनमें राजस्थान के सबसे युवा BJP विधायक 29 वर्षीय अंशुमान सिंह भाटी, दिल्ली विधानसभा के सबसे युवा सदस्य 33 वर्षीय उमंग बजाज, पाटीदार आंदोलन का नेतृत्व करने वाले और 2022 में कांग्रेस छोड़कर BJP में आए 33 वर्षीय हार्दिक पटेल और बंगाल विधानसभा में बाराबनी का प्रतिनिधित्व करने वाले अरिजीत रॉय शामिल हैं. रॉय ने पहला पत्र जारी होने से एक दिन पहले ही 35 साल की उम्र पूरी की थी.

हेमंग जोशी को अगस्त में युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया था (फाइल फोटो)

पांचवें नेता 32 वर्षीय बिराज बिस्वास इस दौड़ में कभी थे ही नहीं. वे बंगाल में कानून राज्य मंत्री हैं. BJP का 'एक व्यक्ति, एक पद' का नियम मंत्रियों को पार्टी के पदों से दूर रखता है. इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति सरकार में या पार्टी संगठन में रह सकता है, दोनों जगह नहीं. यही नियम जमुई की विधायक श्रेयसी सिंह पर भी लागू होता है. वे 35 साल की उम्र में बिहार मंत्रिमंडल की सबसे युवा मंत्री बनीं. 

कोई विधायक पार्टी में पद संभाल सकता है. इसी वजह से जोशी लोकसभा के सदस्य रहते हुए युवा मोर्चे की कमान संभाल रहे हैं. लेकिन मंत्री ऐसा नहीं कर सकता. सरकार में मंत्री बनना आगे बढ़ने की तेज सीढ़ी है, जबकि संगठन में आगे बढ़ने का रास्ता धीमा है. इनमें से किस रास्ते पर चलना है, इसका फैसला विधायक/सांसद नहीं पार्टी करती है.

परिहार और करफा वे दो नेता हैं जिन पर पार्टी ने दांव लगाया है. दोनों उस तरह के युवा विधायक नहीं हैं जिन्हें पहले युवा मोर्चे में आगे किया जाता था. 2018 में जब जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में बंदूकधारियों ने उनके पिता और चाचा की हत्या कर दी थी तब परिहार 23 साल की थीं. दोनों BJP कार्यकर्ता थे. छह साल बाद पार्टी ने उन्हें मुस्लिम बहुल उस सीट से चुनाव लड़ाया जिस पर नेशनल कॉन्फ्रेंस लगातार दो कार्यकाल से जीतती आ रही थी. परिहार ने यह चुनाव 521 वोटों से जीता.

करफा की कहानी अपेक्षाकृत शांत है. भातार में तीन दशक तक वामपंथी दलों का दबदबा रहा और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस का. इस साल अप्रैल में करफा ने यह सीट 6,528 वोटों से जीत ली. जिले के बाहर बहुत कम लोग उन्हें जानते थे. पहली बार विधायक बने किसी नेता के लिए उपाध्यक्ष बनना छोटी बात नहीं है. 

BJP के इतिहास में इस पद को सबसे ज्यादा अहमियत देने की परंपरा रही है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 1988 में युवा मोर्चा की कमान संभाली थी. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान 2000 में युवा मोर्चा के प्रमुख थे. पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी दिल्ली में अपना नाम पहचाने जाने से पहले बिहार में युवा मोर्चा की कमान संभाली थी.

मैथिली ठाकुर का मामला अलग है. बिहार में BJP के पास उनसे ज्यादा चर्चित युवा चेहरा नहीं है. दोनों सूचियों में वे अकेली जानी-मानी हस्ती हैं. लेकिन उन्हें कोई पद देने के बजाय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी गई है. यह कार्यकारिणी बैठकें करती है, प्रस्ताव पारित करती है और कॉलेज परिसरों तक पार्टी का संदेश पहुंचाती है. 

बिहार में युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष पद राज राजेंद्र सिंह को मिला है, जिनका नाम राज्य BJP कार्यालय के बाहर शायद ही कोई जानता हो. क्या पार्टी गायिका को मंच तक सीमित रखना चाहती है या पहली बार विधायक बनीं ठाकुर को संगठन की कार्यप्रणाली समझने के लिए समय देना चाहती है, इस बारे में पार्टी ने कुछ नहीं कहा है.

मैथिली ठाकुर को युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी गई है (फाइल फोटो)

अब बाकी चार नेताओं की बात. ये चारों एक-दूसरे से अलग हैं. हार्दिक पटेल सबसे ज्यादा दिशाहीन नजर आते हैं. पिछले साल अक्टूबर में गुजरात मंत्रिमंडल के विस्तार में उन्हें जगह नहीं मिली थी. उस विस्तार में हर्ष सांघवी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया और रिवाबा जडेजा को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. 

इससे दो महीने पहले हार्दिक ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि वीरमगाम में रुके हुए विकास कार्यों के विरोध में वह अनशन करेंगे. मई में उन्हें विधानसभा की जो समिति सौंपी गई, वह सांत्वना पुरस्कार जैसी लगती है. बजाज दिल्ली विधानसभा की शिक्षा समिति के अध्यक्ष हैं, लेकिन इसके अलावा उन्हें खास चर्चा नहीं मिली है. विधानसभा की किसी समिति का पद 'एक व्यक्ति, एक पद' के नियम के दायरे में आता है या नहीं, यह पार्टी ने कभी स्पष्ट नहीं किया. जानकारों के मुताबिक, दोनों नेता संगठन में कोई भूमिका मिलने पर तैयार होते, हालांकि यह जरूरी नहीं कि वह युवा मोर्चा में ही होती.

भाटी को अपने दादा देवी सिंह भाटी की राजनीतिक विरासत मिली है. उनके दादा 33 साल तक कोलायत सीट से विधायक रहे. इसके बाद उन्होंने पांच साल के लिए BJP छोड़ दी और 2023 में यह कहते हुए पार्टी में लौट आए कि उनकी शिकायतों का समाधान हो गया है. 

कुछ ही हफ्तों के भीतर उनके पोते को BJP का टिकट मिल गया. जुलाई में कोलायत में एक मंत्री की जनसुनवाई के दौरान मंच पर लगे बैनरों पर मौजूदा विधायक का नाम या तस्वीर नहीं थी. उनके समर्थकों ने विरोध किया, जिसके बाद मंत्री ने मंच से माफी मांगी.

रॉय का मामला सबसे अलग है. चुनाव से पहले वह पश्चिम बर्धमान में BJP के जिला महासचिव थे. उनके पिता 2016 में बाराबनी से पार्टी के उम्मीदवार थे. स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर परिवार को तीसरी बार टिकट दिए जाने पर नाराजगी जताई थी. अगर रॉय अब भी जिला पद पर हैं तो 'एक व्यक्ति, एक पद' का नियम उनकी अनुपस्थिति की उतनी ही साफ व्याख्या करता है, जितनी बिस्वास के मामले में.

इन चारों के मामलों की एक ही व्याख्या नहीं हो सकती. लेकिन इन्हें उन चार नेताओं के साथ रखकर देखें, जिन्हें सूची में जगह मिली है, तो एक पैटर्न नजर आता है. चुने गए नेता पहली बार विधायक बने हैं. उन्होंने ऐसी सीटों से जीत हासिल की है जहां BJP पहले कभी नहीं जीती थी. उनका किसी दूसरी पार्टी से पुराना जुड़ाव नहीं रहा है और न ही वे राजनीतिक परिवारों से आते हैं. जिन्हें जगह नहीं मिली, उनमें कांग्रेस से आए एक नेता, दो राजनीतिक परिवारों के सदस्य और राजधानी दिल्ली से पहली बार विधायक बने एक नेता शामिल हैं.

तेजस्वी सूर्या की पिछली टीम से सिर्फ एक सदस्य को युवा मोर्चा में रखा गया है (फाइल फोटो)

यही पैटर्न बाकी सूची में भी नजर आता है. 17 पदाधिकारियों में लगभग कोई ऐसा नाम नहीं है, जिसे देश भर के लोग पहचानते हों. तेजस्वी सूर्या की 2021 की टीम में दिल्ली के तेजिंदर पाल सिंह बग्गा और रोहित चहल शामिल थे. दोनों टीवी पर नजर आने वाले चर्चित चेहरे थे. मुंबई के वकील मधुकेश्वर देसाई भी उस टीम में थे जो 25 साल की उम्र से ही उपाध्यक्ष रहे थे. 

इसके उलट, हेमंग जोशी की टीम में चंदादिह गांव के निखिल मणि तिवारी हैं, जो बलिया से आते हैं. उन्होंने युवा मोर्चे के अवध क्षेत्र के महासचिव के रूप में लखनऊ क्षेत्र में काम किया है लेकिन कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा. अयोध्या के हर्ष वर्धन सिंह राज्य महासचिव हैं. 2022 में अयोध्या विधानसभा सीट के टिकट के लिए उनके नाम पर विचार हुआ था लेकिन टिकट किसी और को मिला. वहीं, दीमापुर के मारवाड़ी संगठनकर्ता अरविंद दमानी हैं, जिन्होंने नागालैंड के युवा मोर्चे में एक दशक बिताया है. अब वह राष्ट्रीय स्तर पर एक आदिवासी राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

तेजस्वी सूर्या की 17 सदस्यीय टीम से सिर्फ अर्पिता अपराजिता बड़ाजेना अपनी जगह बचा पाई हैं. भुवनेश्वर की रहने वाली बड़ाजेना छात्रसंघ की पूर्व महासचिव और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की राज्य कार्यकारिणी की सदस्य रही हैं. 2017 तक वे ओडिशा BJP युवा मोर्चे की सचिव बन चुकी थीं. अब वे राष्ट्रीय महासचिव हैं. 

सूर्या के केंद्रीय कार्यालय की जिम्मेदारी संभालने वाले विनीत वत्स त्यागी कोषाध्यक्ष हैं. महाराष्ट्र की सचिव सायली कुलकर्णी मुंबई की मौजूदा नगरसेविका हैं. झारखंड में गुमला के सिसई प्रखंड से आने वाले अमन यादव को जगह मिली है. वे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से हैं और ऐसे आदिवासी बहुल जिले में आते हैं, जहां BJP को संघर्ष करना पड़ा है. 

इस बार नई बनाई गई नीति प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी अखिला बंडम को दी गई है. वे लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में एलएएमपी फेलो और शेवनिंग स्कॉलर रही हैं. दोनों सूचियों में वे अकेली तकनीकी विशेषज्ञ हैं. उन्हें राजनीतिक पद देने के बजाय कर्मचारियों जैसी भूमिका में रखा गया है.

पिछली बार दिल्ली को दो संगठनात्मक पद मिले थे लेकिन इस बार कोई नहीं मिला. कागजों पर 35 साल की उम्र सीमा कई साल से लागू नहीं की जा रही थी लेकिन इस बार इसका पालन हुआ है. 39 वर्षीय देसाई बाहर हो गए जबकि रॉय एक दिन से चूक गए. सूची भी तेजी से और शीर्ष नेतृत्व के स्तर से तैयार हुई. 

तेजस्वी सूर्या को अपनी टीम घोषित करने में 10 महीने लगे थे जबकि जोशी ने सात हफ्तों में सूची जारी कर दी. पत्र में कहा गया कि नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष के आदेश पर जारी किए गए हैं. अगस्त के बाद यह तीसरी ऐसी सूची है. उस महीने नवीन ने 11 राष्ट्रीय सचिवों में से सिर्फ एक को पद पर बनाए रखा था और हर मोर्चे तथा प्रकोष्ठ के प्रमुख को बदल दिया था. उनकी जगह ज्यादातर राज्य इकाइयों से आए नेताओं को जिम्मेदारी दी गई थी.

लेकिन यही पैमाना पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर लागू नहीं होता. नवीन की वरिष्ठ टीम में मनप्रीत सिंह बादल उपाध्यक्ष हैं जो अकाली दल और कांग्रेस से होते हुए BJP में आए. बैजयंत जय पांडा भी उपाध्यक्ष हैं जो पहले बीजू जनता दल (BJD) में थे. नवीन ने जिस एक सचिव को पद पर बनाए रखा वे कांग्रेस के एक रक्षा मंत्री के बेटे हैं. 

खुद नवीन 2006 में बिहार विधानसभा पहुंचे थे. उन्होंने उस सीट से चुनाव जीता था जिस पर उनके पिता लगातार सात कार्यकाल तक विधायक रहे थे. पार्टी के भीतर इसे काम का बंटवारा कहा जाता है. युवा मोर्चे में पद संगठन के लिए किए गए काम के आधार पर मिलते हैं जबकि वरिष्ठ पद उन लोगों को दिए जाते हैं जो चुनाव जिता सकते हैं. इस पर एक जवाब दबे स्वर में यह भी दिया जाता है कि सबसे सख्त कसौटी वहां लागू होती है जहां उसका महत्व सबसे कम है.

तो 30 साल की उम्र के शुरुआती वर्षों में पहुंचे किसी विधायक के लिए BJP के पास क्या है? अगर उसे संगठन में चुना जाता है तो उसे एक पदवी, संपर्कों का नेटवर्क और काम मिलता है. अगले साल सात राज्यों में चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश में तीन वरिष्ठ पद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पांच सीटें हैं. हेमंग जोशी की टीम सर्दियों में अपना ज्यादातर समय यहीं बिताएगी. 

सरकार में शामिल होने पर रास्ता अलग है और दोनों जगह एक साथ नहीं रहा जा सकता. लेकिन इनमें से किसी भी रास्ते पर आगे बढ़ने का तयशुदा मार्ग नहीं बताया गया है. हार्दिक पटेल इसका उदाहरण हैं. गुजरात के सबसे चर्चित युवा विधायकों में शामिल पटेल को विधायक बने चार साल हो चुके हैं. उनके पास अध्यक्षता करने के लिए एक समिति है लेकिन पार्टी में कोई पद नहीं. इस हफ्ते जारी सूचियों से भी उनकी स्थिति नहीं बदली.

एक आखिरी टीम पर भी गौर करना चाहिए. 2021 में तेजस्वी सूर्या की टीम को भी भविष्य के नेताओं की पौध के तौर पर पेश किया गया था. पांच साल बाद, उस टीम के सबसे चर्चित सदस्य वही हैं जो पहले से चर्चित थे. तेजस्वी सूर्या ने अगस्त में पद छोड़ दिया था. उस समय ऐसी खबरें आई थीं कि वे मंत्रिमंडल में जगह चाहते थे लेकिन उन्हें यह मौका नहीं मिला. 

नवीन ने युवा मोर्चे में जो बदलाव किए हैं, वे साफ नजर आते हैं. चर्चित चेहरे के मुकाबले संगठनकर्ता को प्राथमिकता, दूसरी पार्टी से आए नेता के मुकाबले पहली बार चुनाव जीतने वाले को तरजीह और गायिका को पदाधिकारी बनाने के बजाय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह. सूची में शामिल नेताओं के पास 2029 तक यह साबित करने का समय है कि पार्टी की इस प्राथमिकता का उन्हें कितना फायदा मिला.

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