राजभवनों में वफादारों की एंट्री के साथ BJP में बड़े बदलाव की तैयारी
छह राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति से BJP के पुराने नेताओं को नई जिम्मेदारी मिली है. अब पार्टी के संसदीय बोर्ड, केंद्रीय मंत्रिमंडल और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों में भी बदलाव के संकेत हैं

पीएम मोदी अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ (फाइल फोटो)
12 अक्टूबर की देर शाम राज्यपालों में किए गए फेरबदल को नियमित प्रशासनिक बदलाव माना जा सकता है. लेकिन यह उससे कहीं ज्यादा है. राष्ट्रपति भवन के एक आदेश में दो मौजूदा राज्यपालों का तबादला किया गया और चार नए राज्यपाल नियुक्त किए गए. इसके तहत छह राज्यों - केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तराखंड, सिक्किम और ओडिशा के शीर्ष संवैधानिक पदों पर नेताओं को भेजा गया
नरेंद्र मोदी के दौर में राज्यपालों के हर फेरबदल को तीन कसौटियों पर देखा जाता है: नियुक्त किए गए लोग कौन हैं, उन्हें कहां भेजा गया है और अभी क्यों भेजा गया है. इन तीनों ही कसौटियों पर यह फेरबदल पिछले कई बदलावों से ज्यादा संकेत देने वाला लगता है.
मोदी सरकार ने इस बार आम तौर पर चुने जाने वाले सेवानिवृत्त नौकरशाहों, न्यायाधीशों और सैन्य अधिकारियों के बजाय BJP संगठनात्मक से नेताओं को चुना है. यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब पार्टी एक दशक में अपने सबसे व्यापक संगठनात्मक पुनर्गठन की कोशिश कर रही है. इस फेरबदल से केंद्र और राज्यों के संबंधों के बारे में भी कुछ संकेत मिलते हैं लेकिन यह BJP के बारे में कहीं ज्यादा बताता है.
इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत ऊपर से हुई. 20 जनवरी को बिहार के 45 वर्षीय और पांच बार विधायक रह चुके नितिन नवीन ने BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जे.पी. नड्डा की जगह ली. मई में उन्होंने राज्यों में पार्टी अध्यक्षों को बदलना शुरू किया. 17 अगस्त को उन्होंने राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई टीम घोषित की, जिसमें आठ महासचिवों में से सिर्फ दो को बरकरार रखा गया. 23 सितंबर को नवीन ने सभी राज्यों के लिए प्रभारियों के नाम घोषित किए.
संगठन में पीछे छूट गए कई नेताओं को अब राजभवनों में जगह मिली है. अगस्त में BJP की प्रमुख संगठनात्मक टीम से हटाए गए दुष्यंत गौतम अब सिक्किम के राज्यपाल हैं. कर्नाटक की नई राज्यपाल सुधा यादव BJP के संसदीय बोर्ड की सदस्य हैं. केरल के राज्यपाल बनाए गए ओम प्रकाश माथुर और उत्तराखंड के राज्यपाल बने पूर्व सांसद ढाल सिंह बिसेन उन नेताओं में शामिल हैं जिन्हें BJP अपने सक्रिय संगठनात्मक ढांचे से सम्मान के साथ बाहर कर रही है.
आगे इससे भी बड़े बदलाव हो सकते हैं. BJP सूत्रों के मुताबिक तीन और कदम उठाने की तैयारी है. अगस्त 2022 से अपरिवर्तित पार्टी के संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति का पुनर्गठन किया जाएगा. इसमें BJP शासित राज्यों के युवा मुख्यमंत्रियों को जगह दी जा सकती है. जून 2024 के बाद से केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी कोई बड़ा फेरबदल नहीं हुआ है. इसमें जल्द बदलाव होने की उम्मीद है. BJP के कम से कम तीन मुख्यमंत्रियों को भी बदला जा सकता है.
इस बीच, राज्यपालों की नियुक्तियों को संगठन के उस फेरबदल की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लक्ष्य 2027 के विधानसभा चुनाव हैं. इन चुनावों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं. इसके आगे 2029 के लोकसभा चुनाव भी हैं.
नए राज्यपाल
केरल में की गई नियुक्ति सबसे ज्यादा व्यक्तिगत संबंधों से जुड़ी है. 74 वर्षीय माथुर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक-दूसरे को 1970 के दशक के आखिरी वर्षों से जानते हैं. उस समय दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक थे.
मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान माथुर राज्य में पार्टी के कामकाज को संभालते थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने वडोदरा सीट पर मोदी के प्रचार अभियान की जिम्मेदारी भी संभाली थी. सिक्किम के अपेक्षाकृत शांत राजभवन से तिरुवनंतपुरम भेजे जाने का उनका तबादला अहम है.
केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की सरकार अब सत्ता में नहीं है. राजभवन के साथ कई मुद्दों पर उसके एक दशक तक गंभीर मतभेद रहे थे. माथुर ऐसे समय राज्यपाल बनकर आ रहे हैं जब राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार है और उसके साथ उनका कोई पुराना टकराव नहीं रहा है. हालांकि BJP के सबसे बड़े राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी की सरकार के सामने उन्हें केंद्र के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाएगा.
राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को तमिलनाडु भेजने का फैसला पहले से चल रही व्यवस्था को स्थाई रूप देता है. जनवरी 2025 से केरल के राज्यपाल रहे आर्लेकर को मार्च से तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था. तब आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल भेजा गया था. अब आर्लेकर तमिलनाडु के पूर्णकालिक राज्यपाल होंगे.
राज्य में पिछली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार ने विधेयकों को मंजूरी देने के मुद्दे पर राजभवन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी. अब यहां सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली नई तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) सरकार मई से कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन के साथ सत्ता में है.
BJP सूत्रों के मुताबिक सुधा यादव को मोदी की पसंद माना जा रहा है. उनके पति सुखबीर सिंह यादव सीमा सुरक्षा बल (BSF) में डिप्टी कमांडेंट थे. मई 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान उनकी मौत हो गई थी. इसके कुछ महीने बाद BJP ने सुधा यादव को हरियाणा की महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया जहां उन्होंने बड़े अंतर से जीत दर्ज की.
सुधा यादव 2004 और 2009 में चुनाव हार गईं. इसके बाद वे BJP की राष्ट्रीय सचिव बनी रहीं. अगस्त 2022 में उन्हें हरियाणा से पार्टी के संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया. उस समय उनका चयन चौंकाने वाला माना गया था. अब उन्हें कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया है. इस तरह कांग्रेस शासित राज्य में BJP की एक ऐसी नेता को भेजा गया है, जिनका पार्टी से पुराना जुड़ाव रहा है.
मध्य प्रदेश की बालाघाट लोकसभा सीट से 2019 से 2024 तक सांसद रहे ढाल सिंह बिसेन को BJP शासित उत्तराखंड का राज्यपाल बनाया गया है. छह नियुक्तियों में यह सबसे कम राजनीतिक मानी जा रही है. उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह की जगह ली है जिनका कार्यकाल पूरा हो गया था.
नड्डा की टीम में महासचिव रहे दुष्यंत गौतम पार्टी के दलितों तक पहुंच बनाने के अभियान में अहम भूमिका निभाते थे. 17 अगस्त को उन्हें तेजस्वी सूर्या, अमित मालवीय और अरुण सिंह के साथ पद से हटा दिया गया था. आठ हफ्ते बाद उन्हें राजभवन भेज दिया गया.
झारखंड की आरक्षित पलामू लोकसभा सीट से तीन बार सांसद रहे ब्रज मोहन राम को BJP शासित ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया है. उन्होंने हरि बाबू कंभमपति की जगह ली है. उनकी नियुक्ति से झारखंड में BJP के दलित संपर्क अभियान को भी ताकत मिलेगी. इसे सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के फैसले के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है. JMM ने पलामू-लातेहार क्षेत्र के एक अन्य दलित नेता और पूर्व BJP सदस्य बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजा है.
इन छह नियुक्तियों में एक बात समान है: सेवानिवृत्त नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों और न्यायविदों की गैर-राजनीतिक छवि के बजाय BJP ने अपने संगठन के पुराने और भरोसेमंद नेताओं को चुना है. कांग्रेस ने भी दशकों तक ऐसा किया था.
लेकिन यहां खास बात इस नीति को लगातार अपनाना है. मोदी सरकार अब पार्टी के वफादार नेताओं और विशेषज्ञों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश नहीं कर रही है. वह ऐसे लोगों को चुन रही है जिन पर उसे भरोसा है. खासकर उन राज्यों में ऐसे नेताओं को भेजा जा रहा है, जिन पर प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से भरोसा करते हैं.
मोदी का तरीका
जून 2024 में मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से राष्ट्रपति भवन ने कई राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति और तबादले से जुड़े पांच आदेश जारी किए हैं. इनके जरिए राज्यपालों के पदों पर 18 नए चेहरे आए हैं और करीब एक दर्जन राज्यपालों को एक राज्य से दूसरे राज्य भेजा गया है.
12 अक्टूबर का फेरबदल दो तरह की नियुक्तियों की नीति को आगे बढ़ाता है: मैदानी राज्यों में राजनीतिक नेताओं को भेजना और सीमावर्ती राज्यों में पेशेवर पृष्ठभूमि वाले लोगों को नियुक्त करना. हालांकि इस बार एक अपवाद भी है.
अब तक सामान्य माने जाने वाले राज्यों में हरिभाऊ बागड़े, संतोष गंगवार और रमन डेका जैसे पार्टी के पुराने नेताओं को राज्यपाल बनाया गया. संवेदनशील राज्यों में प्रशासनिक और सैन्य पृष्ठभूमि वाले लोगों को भेजा गया. इनमें मणिपुर में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला, मिजोरम में पूर्व सेना प्रमुख वी.के. सिंह, बिहार में लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन और दिल्ली में पूर्व राजनयिक तरनजीत सिंह संधू शामिल हैं.
12 अक्टूबर का आदेश मोदी सरकार का राज्यों से जुड़ा पहला ऐसा फेरबदल है जिसमें एक भी नौकरशाह या सैन्य अधिकारी को राज्यपाल नहीं बनाया गया. इतना ही नहीं, इसमें सीमावर्ती राज्य सिक्किम को सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील पद के बजाय राजनीतिक नियुक्ति वाला राज्य माना गया है.
यह फेरबदल राजभवनों को उन नेताओं के लिए जगह के तौर पर भी पेश करता है जिन्हें पार्टी संगठन में किनारे कर दिया गया है. 2024 में चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं मिलने के बाद संतोष गंगवार को दो महीने के भीतर झारखंड का राज्यपाल बना दिया गया था. अब बिसेन और गौतम को भी इसी तरह जगह मिली है.
BJP अपने पुराने नेताओं को पूरी तरह बाहर नहीं करती बल्कि उन्हें दूसरी जिम्मेदारी दे देती है. पार्टी भरोसेमंद नेताओं के एक छोटे समूह को अलग-अलग राज्यों में भेजने की नीति भी जारी रखे हुए है. उदाहरण के लिए, आर्लेकर पांच साल में चौथे राज्य में जा रहे हैं.
राज्यपालों की नियुक्तियों का समय भी चुनावी कैलेंडर से जुड़ा है. मार्च में हुई नियुक्तियां पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम के विधानसभा चुनावों से कुछ हफ्ते पहले की गई थीं. 12 अक्टूबर का फेरबदल उत्तराखंड के 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हुआ है लेकिन उसी दौर में चुनाव का सामना करने वाले उत्तर प्रदेश में राज्यपाल को नहीं बदला गया.
यह फेरबदल गठबंधन सहयोगियों को जगह देने की परंपरा से भी अलग है. मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में किसी सहयोगी दल को राज्यपाल का जो एक पद दिया गया वह गोवा का था. यह पद तेलुगु देशम पार्टी के अशोक गजपति राजू को मिला. महिला राज्यपालों के मामले में भी बदलाव दिखा है. सुधा यादव की नियुक्ति से पहले इस सरकार ने 28 महीनों तक किसी महिला को राज्यपाल नहीं बनाया था.
इस लिहाज से 12 अक्टूबर का फेरबदल पहले की नीति से अलग हटने के बजाय उसी नीति को और स्पष्ट करता है. यह पहला ऐसा आदेश भी है, जिसमें नियुक्त किए गए नेताओं के साथ मोदी के व्यक्तिगत संबंध चयन का सबसे स्पष्ट आधार नजर आते हैं.
विपक्ष की सरकार वाले तीन राज्य
विपक्ष शासित इन तीनों राज्यों में नए राज्यपालों के सामने अलग-अलग चुनौतियां होंगी. केरल में माथुर ऐसे राजभवन की जिम्मेदारी संभालेंगे जहां कुलपतियों की नियुक्तियों से लेकर विधेयकों को मंजूरी देने तक कई मुद्दों पर एक दशक से विवाद रहे हैं. लेकिन अब उनका सामना उस पुरानी सरकार से नहीं होगा जिसके साथ ये टकराव हुए थे. कांग्रेस की दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार के साथ वह अपने संगठनात्मक अनुभव का किस तरह इस्तेमाल करते हैं, इसी से उनकी नियुक्ति की दिशा तय होगी.
तमिलनाडु के राजभवन ने कानून से जुड़े घटनाक्रमों को प्रभावित किया है. अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने विधेयकों पर मंजूरी देने के लिए समय-सीमा तय की थी. नवंबर में राष्ट्रपति के संदर्भ पर आए फैसले ने उस व्यवस्था को बदल दिया.
हालांकि राज्यपालों को अब भी उचित समय के भीतर फैसला करना जरूरी है. आर्लेकर ऐसे कानूनी दायरे में काम करेंगे जहां नियम तय हैं लेकिन उनके इस्तेमाल की पूरी सीमा स्पष्ट नहीं है. उनके सामने पांच महीने पुरानी TVK सरकार होगी.
कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार सरकार को ऐसे लोक भवन का सामना करना होगा जिसका पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी को लेकर विवाद रहा है. अब राज्यपाल BJP के उस सर्वोच्च संगठनात्मक पैनल के सदस्य रह चुके हैं जिसमें नियुक्ति से पहले तक वे शामिल थे.
तीनों राज्यों में असली कसौटी यह होगी कि राज्यपाल अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कानून के अनुरूप, एकसमान तरीके से और अनावश्यक देरी के बिना करते हैं या नहीं.
BJP के बोर्ड में फेरबदल पर नजर
राज्यपालों की नियुक्ति से जुड़े आदेश में सबसे अहम संकेत शायद उस बात में छिपा है जिसका उसमें जिक्र नहीं है. सुधा यादव के राज्यपाल बनने से BJP के 11 सदस्यीय संसदीय बोर्ड और 15 सदस्यीय केंद्रीय चुनाव समिति में जगह खाली हुई है.
सूत्रों के मुताबिक दो नेताओं को इन निकायों में शामिल किया जाना लगभग तय माना जा रहा है: योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस. दोनों BJP के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं. 2022 में जब पार्टी के संगठनात्मक निकायों का पुनर्गठन हुआ था तब दोनों को संसदीय बोर्ड में जगह नहीं मिली थी. उस समय पद पर बने मुख्यमंत्रियों को जानबूझकर बोर्ड से बाहर रखा गया था.
एक तीसरा बदलाव भी हो सकता है. पंजाब से किसी सिख नेता को संसदीय बोर्ड में जगह दी जा सकती है. पंजाब में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं. यह नियुक्ति पूर्व IPS अधिकारी इकबाल सिंह लालपुरा की जगह हो सकती है जो 2022 में बोर्ड में शामिल होने वाले पहले सिख नेता बने थे.
राज्यपालों के फेरबदल से सुधा यादव और दुष्यंत गौतम को संगठनात्मक पदों से सम्मानजनक तरीके से हटाने का रास्ता खुला है. साथ ही इससे संसदीय बोर्ड को पार्टी की मौजूदा शक्ति संरचना के अनुरूप नए सिरे से गठित करने की गुंजाइश भी बनी है.
तो कौन बना रहेगा?
राज्यपालों की नियुक्ति से जुड़े सरकारी बयान में उन तीन राज्यपालों का जिक्र नहीं है जिन्हें पद छोड़ना पड़ा है: थावर चंद गहलोत, हरि बाबू कंभमपति और गुरमीत सिंह.
गहलोत की विदाई सबसे ज्यादा सवाल खड़े करती है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और दलित नेता गहलोत 2006 से 2014 तक कर्नाटक में BJP के प्रभारी रहे थे. उनका पूरा कार्यकाल समाप्त हो चुका था. जुलाई 2025 में जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद गहलोत को इस पद का संभावित उम्मीदवार माना जा रहा था.
इस प्रक्रिया से परिचित लोगों का कहना है कि BJP के बोर्ड ने सी.पी. राधाकृष्णन के नाम पर मुहर लगाने से पहले गहलोत के नाम पर भी विचार किया था. देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर पहुंचने का मौका चूकने के बाद 78 वर्षीय गहलोत अब उस पद से भी हट रहे हैं जिस पर वे थे.
यह भी अहम है कि इस फेरबदल में उत्तर प्रदेश के राजभवन को नहीं छुआ गया. आनंदीबेन पटेल जुलाई 2019 से राज्य की राज्यपाल हैं. उनका कार्यकाल जुलाई 2024 में समाप्त हो गया था और इस जुलाई में उन्होंने सात साल पूरे कर लिए. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें बदले जाने की व्यापक अटकलें थीं.
उनकी जगह किसी नए राज्यपाल की नियुक्ति नहीं होना दो संकेत देता है. या तो उनके उत्तराधिकारी का नाम बाद में घोषित किया जाएगा या प्रधानमंत्री आगामी चुनावों के दौरान लखनऊ में उसी महिला को बनाए रखना चाहते हैं जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उनकी जगह ली थी.
पटेल अकेली ऐसी राज्यपाल नहीं हैं जिनका कार्यकाल लंबा रहा है. आचार्य देवव्रत जुलाई 2019 से गुजरात के राज्यपाल हैं और 2015 से राज्यपाल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. मोदी के गुजरात मंत्रिमंडल में मंत्री रहे मंगुभाई सी. पटेल ने 7 जुलाई को मध्य प्रदेश के राज्यपाल के रूप में पांच साल पूरे किए. अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें मांग की गई है कि उत्तराधिकारी नियुक्त होने तक मुख्य न्यायाधीश को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए.
2021 में नियुक्त किए गए बाकी सभी राज्यपालों का या तो तबादला हो चुका है या वे पद छोड़ चुके हैं. हर दौर में पद पर बने रहने वाले राज्यपाल गुजरात से जुड़े BJP के भरोसेमंद नेता हैं.
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए दो बातों को अलग रखना जरूरी है. पुष्टि किए जा सकने वाले तथ्य यह हैं कि छह राज्यों में नए राज्यपाल नियुक्त किए गए हैं और BJP के शीर्ष संगठनात्मक ढांचे में एक जगह खाली हुई है.
राजनीतिक व्याख्या यह है कि प्रधानमंत्री अपने भरोसेमंद लोगों को राजभवनों में भेज रहे हैं जबकि BJP के युवा अध्यक्ष उनके नीचे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को नए सिरे से बना रहे हैं. नियुक्तियों का पैटर्न इस व्याख्या को आधार देता है, लेकिन अभी तक कोई सार्वजनिक फैसला इसकी पूरी पुष्टि नहीं करता.
नए राज्यपाल पद की शपथ लेने के बाद क्या करते हैं, पार्टी अपने संसदीय बोर्ड में किन नेताओं को जगह देती है, केंद्रीय मंत्रिमंडल में कितना बड़ा फेरबदल होता है और कौन-कौन से मुख्यमंत्री अपने पद पर बने रहते हैं, इन सवालों के जवाब ही आगे इस पूरी कवायद की असली तस्वीर साफ करेंगे.