महिला आरक्षण पर अनुप्रिया पटेल ने पार्टियों को कैसे घेरा?
इंडिया टुडे वुमन समिट 2026 में केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए सिर्फ आरक्षण काफी नहीं है. राजनीतिक दलों को टिकट देने का अपना तरीका भी बदलना होगा

भारत में महिलाओं के एक मजबूत राजनीतिक वर्ग के रूप में उभरने की खूब चर्चा हो रही है. लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल के मुताबिक, एक बुनियादी समस्या अब भी बनी हुई है.
उनके मुताबिक राजनीतिक दल महिलाओं को चुनाव लड़ने का मौका देने में अब भी हिचकिचाते हैं.
22 अगस्त को नई दिल्ली में ‘इंडिया टुडे वुमन समिट 2026’ में अपना दल (सोनेलाल) की अध्यक्ष पटेल ने कहा कि महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस संसद और विधानसभाओं में उनके लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने तक सीमित नहीं रह सकती. राजनीतिक दलों को चुनावी उम्मीदवार चुनने का अपना तरीका बदलना होगा.
अनुप्रिया पटेल ने कहा, "राजनीतिक दल काफी हद तक महिला उम्मीदवारों को टिकट देने से हिचकिचाते हैं." उनके मुताबिक, पार्टियों में यह धारणा काफी आम है कि महिलाएं जरूरी नहीं कि चुनाव जीतने वाली उम्मीदवार हों. उन्होंने कहा कि अगर कोई महिला किसी राजनीतिक रूप से स्थापित परिवार से नहीं आती है तो पार्टियां अक्सर उसे मौका देने में जोखिम महसूस करती हैं.
उनकी बात से यह सवाल उठता है कि भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अब भी इतना कम क्यों है. आरक्षण महिलाओं के लिए सीटें तय कर सकता है लेकिन इससे राजनीतिक संगठनों की वह संस्कृति अपने आप नहीं बदल सकती जो तय करती है कि किसे टिकट मिलेगा, किसे संसाधन मिलेंगे और किसे चुनाव जीतने में सक्षम माना जाएगा.
अनुप्रिया पटेल ने कहा, "अगर यह हिचकिचाहट नहीं होती तो हमें महिला आरक्षण की जरूरत ही नहीं पड़ती."
यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने की तैयारी कर रहा है. हालांकि पटेल का मानना है कि आरक्षण के साथ संसद में सीटों की कुल संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि मतदाताओं की संख्या काफी बढ़ चुकी है और मौजूदा लोकसभा सीटें अब देश की आबादी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.
पटेल ने यह भी माना कि ऐसा कदम राजनीतिक तौर पर असहज स्थिति पैदा करेगा, खासकर पुरुष सांसदों के बीच. अगर मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाती हैं तो कई मौजूदा पुरुष सांसदों को अपनी सीट गंवानी पड़ेगी.
अनुप्रिया पटेल ने कहा, "उनकी धड़कनें तेज हो रही हैं." उनका तर्क था कि संसद में सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण, दोनों पर एक साथ विचार किया जाना चाहिए
हालांकि पटेल ने राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी पर भी सीधे जोर दिया. उन्होंने कहा कि ज्यादा महिलाओं को उम्मीदवार बनाने के लिए पार्टियों को संवैधानिक आरक्षण का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. वे टिकट बांटने के अपने फैसलों के जरिए ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा सकती हैं.
उनकी यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि खुद उन्हें राजनीतिक विरासत, पार्टी में स्वीकार्यता और लैंगिक भेदभाव के जटिल माहौल से गुजरना पड़ा है.
अपना दल के संस्थापक पिता सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद अनुप्रिया पटेल ने राजनीति में कदम रखा. उन्होंने कहा कि सिर्फ उनकी बेटी होने से पार्टी में उन्हें अपने आप स्वीकार्यता नहीं मिल गई थी.
उन्होंने याद करते हुए कहा, "एक बड़ा वर्ग मुझे देखकर कहता था कि इन्हें आना चाहिए क्योंकि ये हमारे संस्थापक अध्यक्ष की बेटी हैं. लेकिन कुछ लोग मुझे आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे थे. इसलिए मुझे भी उस संघर्ष से गुजरना पड़ा और मुझे अपनी योग्यता साबित करनी पड़ी."
उनके मुताबिक, ऐसे राजनीतिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि के बिना आने वाली महिलाओं के लिए बाधाएं और भी ज्यादा हो सकती हैं. किसी महिला को पार्टी का टिकट हासिल करने से पहले अपनी चुनाव जीतने की क्षमता को लेकर उठने वाले संदेहों को दूर करना पड़ता है.
पटेल के मुताबिक इसके बाद उसे ऐसे माहौल में खुद को साबित करना होता है, जहां राजनीतिक नेटवर्क और स्थापित व्यवस्थाओं पर अब भी पुरुषों का दबदबा है.
हालांकि पटेल ने कहा कि भारत में महिलाओं की भागीदारी की व्यापक तस्वीर बदल रही है. उन्होंने सरकार की आर्थिक योजनाओं का जिक्र किया. इनमें जनधन खाते, स्वयं सहायता समूह, लखपति दीदी और नमो ड्रोन दीदी शामिल हैं.
उन्होंने इन्हें महिला-केंद्रित विकास से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर बदलाव के उदाहरण के तौर पर पेश किया. उन्होंने महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बुनियादी सुविधाओं से भी जोड़ा. उनके मुताबिक, घर तक पानी, शौचालय और रसोई गैस पहुंचने से महिलाओं का समय बचता है, जिसका इस्तेमाल वे काम और आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में कर सकती हैं.
उन्होंने कहा कि राजनीतिक बदलाव मतदाताओं के बीच भी दिखाई दे रहा है. महिलाएं अब चुनावी घोषणापत्रों और राजनीतिक मुद्दों को समझने और उनमें दिलचस्पी लेने लगी हैं. वे सिर्फ दूसरों के कहने पर एकजुट होकर वोट नहीं कर रही हैं.
हालांकि प्रतिनिधित्व के मामले में अब भी बड़ा अंतर है. 2026 में प्रकाशित एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के एक विश्लेषण के मुताबिक, देशभर में सांसदों और विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी ही है.
इसलिए पटेल का समाधान सिर्फ ज्यादा आरक्षण नहीं है. वे संस्थागत सुधार और राजनीतिक इच्छाशक्ति, दोनों को जरूरी मानती हैं.
बातचीत के दौरान Gen Z के बीच बढ़ती राजनीतिक बेचैनी का मुद्दा भी उठा. खासकर रोजगार, परीक्षा पेपर लीक और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर. पटेल ने इन प्रदर्शनों को सिर्फ चुनावी नजरिए से देखने से इनकार किया.
उन्होंने कहा कि युवाओं को सिर्फ पहली या दूसरी बार वोट देने वाले संभावित मतदाताओं के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. अनुप्रिया पटेल ने कहा, "युवा लोगों या बच्चों को किसी चुनावी नतीजे से मत जोड़िए. वे हमारे बच्चे और हमारे युवा हैं और उनकी कुछ जायज मांगें हैं. हमें उनकी बात सुननी होगी."
उन्होंने माना कि पेपर लीक की चिंता कई राज्यों में सामने आई है. उन्होंने कहा कि इसे किसी एक सरकार या राजनीतिक दल की समस्या नहीं माना जाना चाहिए. अनुप्रिया पटेल ने कहा, "एक देश के तौर पर हमें इसका समाधान करना होगा. हमें इस पूरे गठजोड़ को तोड़ना होगा." उन्होंने परीक्षा में धोखाधड़ी रोकने के लिए कड़े कानूनों की जरूरत के संदर्भ में यह बात कही.
सरकारों के खिलाफ युवाओं के प्रदर्शन के व्यापक सवाल पर पटेल ने कहा कि उनकी नाराजगी जरूरी नहीं कि नकारात्मक संकेत हो. उन्होंने कहा, "लोगों की अपनी आवाज होनी चाहिए." साथ ही उन्होंने कहा कि जब लोग सरकार के कामकाज से असंतुष्ट हों तो गलतियों को सुधारना सरकार का "नैतिक दायित्व" है.
बातचीत में अलग-अलग दलों की महिला सांसदों के बीच बढ़ते मेलजोल पर भी चर्चा हुई. पटेल ने कहा कि राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलना जरूरी नहीं है. सांसद संसद के भीतर एक-दूसरे के विचारों का विरोध कर सकते हैं और इसके बावजूद बाहर साथ बैठकर कॉफी पी सकते हैं, खाना खा सकते हैं और दोस्ती बनाए रख सकते हैं.
पटेल के मुताबिक, यह कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ही हिस्सा है. उन्होंने कहा कि अलग-अलग पार्टियां रास्ते को लेकर भले ही असहमत हों लेकिन देश को आगे बढ़ाने और बेहतर बनाने का व्यापक लक्ष्य सभी का एक हो सकता है.
समापन संदेश में पटेल ने कहा कि महिलाओं को सिर्फ मतदाता या सरकारी योजनाओं की लाभार्थी के तौर पर नहीं देखा जा सकता. उन्हें राजनीतिक फैसले लेने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनना होगा.
अनुप्रिया पटेल ने कहा, "महिलाएं हमारी आधी आबादी हैं. अगर आप देश को मजबूत बनाना चाहते हैं तो महिलाओं के बिना ऐसा नहीं कर सकते."
राजनीति में महिलाओं की भूमिका नए सिरे से गढ़ने के लिए क्या किया जाए
अनुप्रिया पटेल, केंद्रीय राज्य मंत्री, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक :
- "राजनीतिक दल काफी हद तक महिला उम्मीदवारों को टिकट देने से हिचकिचाते हैं. उन्हें लगता है कि वे चुनाव जीतने वाली उम्मीदवार नहीं हैं. जब तक आप किसी बड़े और राजनीतिक रूप से स्थापित परिवार से नहीं आतीं, वे हमेशा पुरुष उम्मीदवार को प्राथमिकता देंगे."
- "अगर यह हिचकिचाहट नहीं होती, तो हमें महिला आरक्षण की जरूरत ही नहीं पड़ती."
- "महिला राजनेता होने के नाते अतिरिक्त चुनौतियां सामने आती हैं. लोगों को आपकी क्षमता पर भरोसा करने में काफी मुश्किल होती है, इसलिए आपको अपनी योग्यता साबित करनी पड़ती है. उनका भरोसा जीतने के लिए आपको अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं."
- "युवा लोगों या बच्चों को किसी चुनावी नतीजे से मत जोड़िए. वे हमारे बच्चे और हमारे युवा हैं और उनकी कुछ जायज मांगें हैं. हमें उनकी बात सुननी होगी."
- "हम अपने नजरिए, राय और विचारों को लेकर अलग हो सकते हैं, लेकिन हम सभी इस देश के लिए हैं. हम सभी चाहते हैं कि यह देश आगे बढ़े और बेहतर बने. बस हमें लगता है कि इसके लिए अलग रास्ता अपनाया जाना चाहिए."