100 अरब डॉलर का IPO ला रही एंथ्रोपिक, भारत के लिए क्या हैं सबक?
एंथ्रोपिक 100 अरब डॉलर का IPO लाने जा रही है. AI की बढ़ती ताकत के बीच भारत के लिए तकनीक और अनुसंधान पर खर्च बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है

IPO के बाद एंथ्रोपिक 2 ट्रिलियन डॉलर की कंपनी बन सकती है
AI स्टार्टअप एंथ्रोपिक ने हाल ही में कहा है कि वह शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने जा रही है. कंपनी का IPO लगभग 100 अरब डॉलर का होगा. इससे कंपनी का वैल्यूएशन लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर (2 ट्रिलियन डॉलर) हो जाएगा. एंथ्रोपिक का IPO अब तक का सबसे बड़ा IPO होने की उम्मीद है.
यह जून 2026 में अमेरिकी एयरोस्पेस निर्माता कंपनी स्पेसएक्स के 7500 करोड़ डॉलर के IPO और दिसंबर 2019 में सऊदी अरब की राष्ट्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस कंपनी सऊदी अरामको के IPO को पीछे छोड़ सकता है. सऊदी अरामको ने अपने IPO के जरिए 2560 करोड़ डॉलर जुटाए थे.
यह IPO ऐसे समय में आ रहा है जब दो महीने से भी कम समय पहले एंथ्रोपिक के पूर्व AI शोधकर्ता जैकब कॉक्सन ने कहा था कि AI के क्षेत्र में काम करने वाले लोग इसकी प्रगति की रफ्तार और मानवता पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर "वास्तव में डरे हुए" हैं. उन्होंने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "मेरा मानना है कि अगर हमने मौजूदा प्रगति की रफ्तार को धीमा नहीं किया तो इस बात की काफी आशंका है कि निकट भविष्य में हम सभी की जान जा सकती है."
एंथ्रोपिक के प्रमुख डारियो अमोदेई भी AI के विकास की रफ्तार धीमी करने की मांग कर चुके हैं. वहीं खबरों के मुताबिक, OpenAI के सैम ऑल्टमैन और xAI के एलन मस्क ने भी उद्योग जगत में AI के विकास की रफ्तार धीमी करने, नियमन लागू करने और AI मॉडल के विकास की स्वतंत्र निगरानी के अमोदेई के प्रस्ताव से सहमति जताई है.
इससे AI से जुड़े जोखिमों पर नए सिरे से ध्यान गया है. इनमें AI प्रणालियों पर नियंत्रण खोने, साइबर हमलों और जैव आतंकवाद के लिए इसके दुरुपयोग तथा आर्थिक उथल-पुथल जैसे खतरे शामिल हैं. इसके साथ ही भारत जैसे देश के लिए AI से पैदा होने वाले अवसरों पर भी ध्यान गया है. भारत में अभी AI का इस्तेमाल शुरुआती दौर में है.
AI और डेटा एनालिसिस क्षेत्र की कंपनी फ्रैक्टल एनालिटिक्स के उपाध्यक्ष और समूह मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीकांत वेलामाकन्नी ने इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में कहा है, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि AI के क्षेत्र में तेजी से प्रगति हो रही है. इसकी रफ्तार ने सबसे आशावादी लोगों को भी हैरान कर दिया है."
इस क्षेत्र में जिस बात पर खास ध्यान दिया जा रहा है, वह है कृत्रिम सामान्य बुद्धिमत्ता यानी AGI. यह AI का एक ऐसा संभावित रूप है जो लगभग सभी तरह के बौद्धिक कार्यों में इंसानों की क्षमता की बराबरी कर सकता है या उससे आगे निकल सकता है.
वेलामाकन्नी ने बताया कि जनवरी 2026 में गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हसाबिस और एंथ्रोपिक के अमोदेई के बीच बातचीत हुई थी. इस दौरान हसाबिस ने कहा था कि AGI का दौर 2029 में आएगा जबकि डारियो का मानना था कि ऐसा 2026 में ही हो जाएगा. वेलामाकन्नी ने कहा, "अब ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि हम AGI के दौर के काफी करीब पहुंच चुके हैं."
वेलामाकन्नी के मुताबिक AI के इस दौर में भारत को काफी फायदा हो सकता है, क्योंकि देश में अब तक तकनीक का इस्तेमाल विश्लेषण के स्तर पर बहुत अधिक नहीं हुआ है. उन्होंने कहा, "नई AI तकनीक के साथ हम देख रहे हैं कि अब हमें ज्यादा पूंजीगत निवेश करने की जरूरत नहीं है. इसके बजाय किसी मॉडल को काम पर लगाकर तेजी से जवाब हासिल किया जा सकता है. भारत में इस्तेमाल या हर लेनदेन के आधार पर काम करने वाली कोई भी चीज सफल हो सकती है. AI मॉडल के लिए भारत अच्छी जगह है, क्योंकि यहां हम इनका इस्तेमाल कम लागत पर कर सकेंगे."
इससे अवसर भी पैदा होते हैं और खतरे भी. वेलामाकन्नी ने कहा, "अगर हमारे पास शक्तिशाली AI है और वह हमारे लक्ष्यों के अनुरूप नहीं है तो क्या होगा? यहां मूल रूप से दो पहलू हैं. पहला, AI कितना सक्षम है और दूसरा, क्या वह हमारे लक्ष्यों के अनुरूप काम कर रहा है. अगर उसकी क्षमता बहुत अधिक है लेकिन वह हमारे लक्ष्यों के अनुरूप नहीं है तो समस्या पैदा होगी."
उन्होंने कहा, "जब आप AI से कोई काम करने को कहते हैं और वह आपकी सोच से बिल्कुल अलग काम कर देता है तो इसका मतलब है कि उसमें आपके लक्ष्यों के अनुरूप काम करने की समस्या है."
इन खतरों से निपटने के लिए भारत को अपनी बैंकिंग और लेनदेन प्रणालियों को अधिक सुरक्षित बनाना होगा. साथ ही, तकनीक में निवेश बढ़ाना होगा. वेलामाकन्नी ने कहा, "तकनीकी कंपनियों को भी अनुसंधान एवं विकास पर अपना खर्च बढ़ाना होगा. मुझे नहीं लगता कि हम केवल कानून बनाकर इसे रोक सकते हैं. कानूनों में बदलाव की रफ्तार तकनीक की प्रगति के साथ नहीं चल पाएगी."
भारत का अनुसंधान एवं विकास पर खर्च अब भी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के एक फीसदी से कम है. वित्त वर्ष 2021-22 में यह 0.8 फीसदी था. वहीं चीन अपने GDP का 2.8 फीसदी और अमेरिका करीब 3.5 फीसदी इस मद पर खर्च करता है.
मानव इतिहास में एक बार होने वाला बड़ा बदलाव हो रहा है. जिस तरह बिजली सभी के लिए उपलब्ध है, उसी तरह बुद्धिमत्ता भी सबके लिए उपलब्ध होने जा रही है. वेलामाकन्नी ने कहा, "अगले पांच से दस वर्षों में हर कंपनी को नई दुनिया में सफल होने के लिए अपने कामकाज के पूरे ढांचे को बदलना होगा."
उन्होंने कहा, "हमें ऐसे लोगों की पूरी टीम चाहिए, जो AI की तकनीकी संरचना को समझ सके और उसका सबसे उत्पादक तरीके से इस्तेमाल करना जानती हो. कंपनियों के लिए सबसे बड़ा अवसर ऐसे कुशल लोगों की बड़ी टीम तैयार करना है जो इस तरह की समस्याओं का समाधान कर सके. जो कंपनियां ऐसी प्रतिभाशाली टीम तैयार कर पाएंगी, वही टिक पाएंगी."
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) में जोखिम प्रबंधन और डेटा साइंस के पार्टनर एवं निदेशक दीप मुखर्जी के मुताबिक, AI को पूरी मानवता के लिए खतरा बताना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना है. उन्होंने कहा, "दूसरा खतरा सभी उद्योगों के लिए व्यावहारिक स्तर पर है. इससे दुनिया भर के उद्योगों में जोखिम बढ़ेगा. खासकर वहां, जहां बड़े पैमाने पर आंकड़े एकत्र किए जाते हैं."
मुखर्जी के मुताबिक, AI से पैदा होने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए भारत को उन्नत तकनीक विकसित करने की क्षमता हासिल करनी होगी. उन्होंने कहा, "इसके लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) की शिक्षा को शुरुआती स्तर से ही फिर मजबूत करना होगा. यह काम अलग-अलग विश्वविद्यालयों से डिग्रियां बांटने तक सीमित नहीं होना चाहिए."
मुखर्जी ने AI के क्षेत्र में अनुसंधान केंद्र स्थापित करने और अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के लिए सिंगर विंडो क्लियरेंस की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया.