आक्रोश से जीत तक : जंतर-मंतर आंदोलन के बाद आगे क्या?

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर आते ही जंतर मंतर का माहौल पूरी तरह से बदल गया. पहले यह सूचना एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल तक पहुंची फिर छात्रों के छोटे-छोटे समूहों में फैलनी शुरू हुई. शुरुआत में लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ कि यह सच है.

धर्मेंंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर मंतर पर अभिजीत दिपके और अन्य

नई दिल्ली का जंतर-मंतर कई हफ्तों तक इंतजार की जगह बना रहा. यहां छात्र अपने हाथों में फाइलें, झंडे और हाथ से लिखे पोस्टर लेकर पहुंचते रहे. उनके चेहरों पर उस लंबे इंतजार की थकान साफ दिखाई दे रही थी जो बार-बार जवाब मिलने का भरोसा देकर भी खाली हाथ रहता था. उनकी मांग बेहद साफ थी. परीक्षा व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों की जिम्मेदारी तय की जाए और इसके लिए शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय हो.

25 जुलाई को जब यह खबर जंतर-मंतर पहुंची कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है तब तक प्रदर्शन स्थल भाषणों, वार्ताओं, बैरिकेड्स और अनिश्चितताओं के लंबे दिनों से गुजर चुका था. इसलिए इस घोषणा ने आते ही माहौल पूरी तरह से बदल गया.

पहले यह सूचना एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल तक पहुंची. फिर छात्रों के छोटे-छोटे समूहों में फैली. शुरुआत में लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ कि यह सच है. लेकिन जैसे ही खबर की पुष्टि हुई, पूरा जंतर-मंतर नारों से गूंज उठा. छात्रों ने जीत के नारे लगाए. कई लोग खुशी से झूम उठे और वहीं नाचने लगे.

समर्थकों ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके को अपने कंधों पर उठा लिया. कई लोगों ने हाथ ऊपर उठाकर उनका स्वागत किया. "जय हिंद" के नारे लगाए गए. यह सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि उन आरोपों का जवाब भी था, जो आंदोलन को अव्यवस्थित या राजनीतिक बता रहे थे.

हालांकि, इस खुशी के बीच आंदोलन के सामने सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी था. सीजेपी ने जिस इस्तीफे की मांग की थी, वह पूरी हो गई थी. लेकिन अब यह सुनिश्चित करना था कि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने, आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने, परीक्षा सुधार लागू करने और दिल्ली पुलिस व रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) से सार्वजनिक माफी की मांग जैसे वादे भी पूरे हों.

किसी भी आंदोलन की असली चुनौती जीत के बाद शुरू होती है. घोषणा को सरकारी आदेश में बदलना और वादों को लोगों के जीवन पर असर डालने वाले फैसलों में बदलना सबसे कठिन काम होता है.

इस दौरान लाउडस्पीकर पर राष्ट्रगान बजाया गया. भीड़ में मौजूद लोग एक साथ खड़े हो गए. कुछ राष्ट्रगान गा रहे थे, कुछ हाथों में तिरंगा लिए हुए थे और कई लोग अपने मोबाइल फोन से इस पल को रिकॉर्ड कर रहे थे. लोगों में मिठाइयां बांटी गईं. गुस्से की जगह अब हैरानी और फिर खुशी ने ले ली थी. पेपर लीक और छात्रों के भविष्य को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब एक बड़े सार्वजनिक जश्न में बदल चुका था.

प्रदर्शन स्थल के बाहर अब भी भारी पुलिस बल, बैरिकेड और पिछले दिनों हुई झड़पों के निशान मौजूद थे. लेकिन जंतर-मंतर के भीतर माहौल पूरी तरह उत्सव जैसा था. वही युवा, जो कई दिनों से सरकार के जवाब का इंतजार कर रहे थे, अब जश्न मना रहे थे कि उनकी आवाज आखिरकार सुनी गई.

सीजेपी समर्थकों ने पिछले कई हफ्तों में 'कॉकरोच' जैसे अपमानजनक शब्द को अपनी पहचान बना लिया था. आम तौर पर तिरस्कार का प्रतीक माने जाने वाले कॉकरोच को उन्होंने संघर्ष और जिद का प्रतीक बना दिया. उनका कहना था कि उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है. जंतर-मंतर पर यह प्रतीक अपने सबसे बड़े प्रभाव के साथ दिखाई दिया.

भीड़ ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को सिर्फ एक मंत्री के पद छोड़ने के रूप में नहीं देखा. उनके लिए यह उन लाखों छात्रों के दर्द और गुस्से को स्वीकार करने जैसा था, जिनका भरोसा बार-बार परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों से टूटा है.

अभिजीत दिपके ने मंच से समर्थकों को संबोधित किया. जोरदार तालियों और नारों के बीच उन्होंने कहा, "हमने कर दिखाया." यह जीत सिर्फ नेतृत्व की नहीं बल्कि वहां मौजूद हर छात्र और युवा की मानी गई. इस आंदोलन को उन छात्रों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं ने आगे बढ़ाया था जिन्हें लगता था कि व्यवस्था की हर विफलता का सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं को उठाना पड़ता है.

भीड़ में एक प्रदर्शनकारी हाथ में संविधान की प्रति लिए खड़ा था. यह एक प्रतीक था कि आंदोलन केवल परीक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि सम्मान और जवाबदेही की मांग भी है. उसने कहा कि यह संविधान की जीत है और यह साबित करता है कि आज की युवा पीढ़ी न तो उदासीन है और न ही गैर-जिम्मेदार.

प्रदर्शनकारियों के लिए यह सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे की जीत नहीं थी. उनके मुताबिक यह युवाओं की बात सुने जाने के अधिकार की जीत थी. हालांकि इस्तीफे के बाद भी प्रदर्शन तुरंत खत्म नहीं हुआ. कुछ देर बाद सीजेपी के प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्रियों से बातचीत करके लौटे और एक बार फिर सबकी नजरें मंच पर टिक गईं. इस बार माहौल पहले जैसा उग्र नहीं था. लोग शांत होकर अंतिम घोषणा का इंतजार कर रहे थे.

सीजेपी नेताओं ने कहा कि सरकार ने आंदोलन की सभी प्रमुख मांगें मान ली हैं. इसके बाद उन्होंने भरोसे के साथ आंदोलन वापस लेने का ऐलान किया. साथ ही जंतर-मंतर पर मौजूद लोगों और देशभर से समर्थन देने वालों से शांतिपूर्वक अपने-अपने घर लौटने की अपील की.

सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा कि समर्थकों का संघर्ष, मेहनत और धैर्य आखिरकार सफल हुआ है. उन्होंने यह भी कहा कि अब समय आंदोलन को सम्मानजनक तरीके से समाप्त करने का है. जो भीड़ इतने दिनों तक अपनी आवाज बुलंद कर रही थी, अब वही शांतिपूर्वक वापस लौट रही थी.

इस तरह 25 जुलाई की रात जंतर-मंतर सिर्फ जीत का जश्न नहीं थी. वहां गीत थे, मिठाइयां थीं, झंडे थे और नारे थे और इसके साथ ही एक अनुशासित विदाई भी थी जिसमें संदेश साफ था कि घर लौटने का मतलब संघर्ष खत्म होना नहीं है. असली काम अब उन वादों को जमीन पर उतरते देखने का है.

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