घाटे के बावजूद रेलवे AC फर्स्ट क्लास बंद क्यों नहीं करता?

'हनीमून सुइट' विवाद ने एक बार फिर फर्स्ट AC को चर्चा में ला दिया है. सवाल यह है कि घाटे में चलने के बावजूद भारतीय रेलवे इस प्रीमियम श्रेणी को खत्म करने के बजाय क्यों बचाए रखना चाहता है?

रेलवे के AC फर्स्ट कूपे में सजावट पर शुरू हुआ विवाद
रेलवे के AC फर्स्ट कूपे में सजावट पर शुरू हुआ विवाद

हाल ही में सोशल मीडिया पर 'हनीमून सुइट' के नाम से AC फर्स्ट क्लास का एक वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में एक ट्रेन की फर्स्ट AC कूपे को एक नवविवाहित जोड़े के स्वागत के लिए सजाया गया था. हालांकि, वीडियो वायरल होते ही रेलवे ने इस मामले की जांच के आदेश दे दिए.

ट्रेन में उस समय मौजूद टीटीई (ट्रैवलिंग टिकट एग्जामिनर) को निलंबित कर दिया गया और सजावट करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है. दरअसल, 6 जुलाई को नंदीग्राम एक्सप्रेस (11002) में हुई इस घटना ने भारतीय रेलवे की एक खास सेवा, फर्स्ट AC कूपे, की ओर सबका ध्यान खींचा.

भारतीय रेलवे की फर्स्ट AC कूपे दुनिया के सबसे सस्ते निजी रेल कमरों में से एक मानी जाती है. किसी भी दूसरे देश में रातभर के रेल सफर के लिए बुक होने वाले निजी कमरे का किराया इतना कम नहीं है.

यह भारतीय रेलवे की पुरानी सेवा है, जो आर्थिक रूप से घाटे का सौदा है. फिर भी इसे इसलिए जारी रखा गया है क्योंकि यह ऐसी सुविधा देती है, जो कम लागत वाली एयरलाइंस भी नहीं दे सकतीं, जैसे- चलती ट्रेन में अंदर से लॉक किया जा सकने वाला निजी कमरा.

महाराष्ट्र में मुंबई CSMT से बल्हारशाह के बीच चलने वाली नंदीग्राम एक्सप्रेस की इस फर्स्ट AC कूपे की सजावट रेलवे की किसी सरकारी सेवा के तहत नहीं, बल्कि बुकिंग के बाद प्राइवेट कंपनी के जरिए की गई थी. नवविवाहित जोड़े ने निजी संपर्कों और इंस्टाग्राम के जरिए जालना की एक छोटी इवेंट डेकोरेशन कंपनी 'राहत रूम डेकोरेशन' से संपर्क किया था. इसी कंपनी ने कूपे को जोड़े के बुकिंग के हिसाब से सजाया था. अजार शेख इस कंपनी के मालिक हैं.

विवाद शुरू होने पर शेख ने बताया कि उनकी टीम जालना स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ी, यात्रियों के आने से पहले फर्स्ट AC कूपे को सजाया और फिर ट्रेन से उतर गई. इसके बाद इस मामले में रेलवे ने सख्त कार्रवाई की. जांच में पाया गया कि सजावट करने वाले व्यक्ति या स्टाफ को ट्रेन में चढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी, लेकिन उस वक्त ट्रेन में मौजूद टीटीई ने उसे नहीं रोका.

इसके बाद दक्षिण मध्य रेलवे ने मौके पर मौजूद टीटीई को निलंबित कर दिया. रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत बिना अनुमति ट्रेन में प्रवेश, वैध टिकट के बिना यात्रा और आपराधिक अतिक्रमण जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया.

गौर करने वाली बात यह है कि रेलवे अधिनियम में फर्स्ट AC कूपे को सोशल मीडिया पर 'हनीमून सुइट' कहे जाने को लेकर कोई अलग से अपराध तय होने की बात नहीं है. आरोप केवल इस बात से जुड़े हैं कि सजावट करने वाला व्यक्ति फर्स्ट AC ट्रेन के कूपे में कैसे पहुंचा.

इस घटना में एक दिलचस्प विडंबना भी है. भारतीय रेलवे लंबे समय से किराये के अलावा दूसरी तरह की आय बढ़ाने के तरीके तलाश रहा है. इस बीच एक निजी डेकोरेटर ने यह दिखा दिया कि कुछ यात्री खास अनुभव के लिए अतिरिक्त पैसे देने को तैयार हो सकते हैं. हालांकि, यह प्रयोग कारोबारी अवसर बनने के बजाय अनुशासनात्मक कार्रवाई पर खत्म हुआ.

फर्स्ट AC सिर्फ इसलिए खास नहीं है कि इसमें निजी केबिन होते हैं. यूरोप, जापान और अमेरिका में भी ऐसी सुविधाएं मिलती हैं लेकिन भारतीय रेलवे इसे विदेशों की तुलना में बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराता है. रेलवे पूरे देश में दो बर्थ वाली लॉक होने वाली कूपे और चार बर्थ वाले केबिन उपलब्ध कराता है, जिससे यात्रियों को विदेशों के मुकाबले बहुत कम खर्च में निजता मिलती है.

हालांकि, इसकी कम कीमत के कारण रेलवे को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 में AC फर्स्ट क्लास को 139.39 करोड़ रुपये का परिचालन घाटा हुआ था, जबकि इसका किराया रेलवे नेटवर्क में सबसे ज्यादा है.

इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी क्षमता है. एक फर्स्ट AC कोच में सिर्फ 22 से 24 यात्री सफर कर सकते हैं, जबकि AC 2-टियर कोच में लगभग दोगुने और AC 3-टियर कोच में इससे भी अधिक यात्री बैठ सकते हैं. इंजन, ट्रैक, सिग्नल और स्टाफ जैसी अधिकांश लागतें तय होती हैं, इसलिए फर्स्ट AC में बैठने वाले यात्रियों को इन तमाम सुविधाओं से जुड़े बहुत कम खर्चे उठाने होते हैं.

इसके अलावा बंद केबिन, अलग परिचारक, मुफ्त बिस्तर और बेहतर रखरखाव जैसी सुविधाओं के कारण इसकी परिचालन लागत भी ज्यादा होती है. हर फर्स्ट AC कोच एक तरह से अवसर लागत भी पैदा करता है. उसी जगह AC 2-टियर या AC 3-टियर कोच लगाया जाए तो अधिक यात्री सफर कर सकते हैं और रेलवे की कमाई भी बढ़ सकती है.

अनुमान है कि AC 2-टियर में अगर कुल यात्री यातायात का 3 फीसद हिस्सा होगा, तो इससे कुल यात्री आय में हिस्सा करीब 9 फीसद होगा. वहीं AC 3-टियर में अगर कुल यात्री यातायात का 15 फीसद हिस्सा है, तो इससे कुल यात्री आय में लगभग एक-तिहाई यानी 33 फीसद का योगदान होता है.

हालांकि आंकड़े दूसरी तस्वीर भी दिखाते हैं. भारतीय रेलवे के 2026-27 के बजट अनुमान के मुताबिक, फर्स्ट AC गैर-उपनगरीय यात्री-किलोमीटर का सिर्फ 0.4 फीसद हिस्सा होगा लेकिन इससे गैर-उपनगरीय यात्री आय का लगभग 2 फीसद मिलेगा. यानी फर्स्ट AC के यात्री औसत नेटवर्क किराये की तुलना में प्रति किलोमीटर करीब पांच गुना ज्यादा भुगतान करते हैं. यह रेलवे का सबसे ज्यादा कमाई देने वाला यात्री वर्ग भी है और CAG के मुताबिक आर्थिक रूप से घाटे का सौदा भी है.

रेलवे के पूरे कोच बेड़े में फर्स्ट AC के सिर्फ 1,100 कोच हैं, जो एयर-कंडीशंड कोचों का बहुत छोटा हिस्सा हैं. फिर भी सरकारी अनुमान बताते हैं कि इस श्रेणी में यात्रियों की संख्या और आय दोनों बढ़ती रहेंगी. फर्स्ट AC इसलिए बचा हुआ है क्योंकि यह वह सुविधा देता है जो विमान नहीं दे सकते- रातभर का निजी सफर.

दिल्ली-मुंबई या दिल्ली-बेंगलुरु जैसे मार्गों पर कई बार हवाई यात्रा का किराया फर्स्ट AC के बराबर या उससे कम होता है और यात्री बहुत कम समय में पहुंच जाते हैं. एयरलाइंस गति पर प्रतिस्पर्धा करती हैं, जबकि फर्स्ट AC रातभर के आरामदायक सफर पर.

फर्स्ट AC का टिकट सिर्फ यात्रा की गारंटी नहीं देता, बल्कि इसमें अंदर से लॉक होने वाला निजी कमरा, बिस्तर, परिचारक और सुरक्षा मिलती है. कई यात्रियों के लिए इससे होटल का खर्च भी बच जाता है, जिनके लिए समय से ज्यादा आराम महत्वपूर्ण है, उनके लिए यह सौदा अब भी फायदेमंद है.

इसकी सबसे ज्यादा मांग उन लोगों में देखी जाती है जिन्हें फर्स्ट AC में यात्रा की पात्रता मिली हुई है. मौजूदा और पूर्व सांसदों की ओर से दो बर्थ वाली निजी कूपे की मांग अक्सर उपलब्धता से ज्यादा रहती है. उत्तर प्रदेश में उत्तरी रेलवे के एक पूर्व मंडल रेल प्रबंधक ने बताया, "एक बार उत्तर प्रदेश के एक सांसद ने हमारी टीम को अपने क्षेत्र के आम देने की पेशकश की ताकि उन्हें कूपे मिल जाए. हमने आम नहीं लिए और उनसे पूछा कि आपका क्षेत्र तो दिल्ली से सिर्फ आठ घंटे की दूरी पर है, फिर आपको कूपे की क्या जरूरत है?"

उनके मुताबिक, यह दिखाता है कि कई यात्रियों के लिए असली आकर्षण लग्जरी नहीं, बल्कि निजता है. वे ऐसा केबिन चाहते हैं जिसे उन्हें अनजान लोगों के साथ साझा न करना पड़े. फर्स्ट AC की एक और खास उपयोगिता है. रेलवे के नियमों के मुताबिक, यही एकमात्र यात्री श्रेणी है जिसमें यात्री अपने कुत्ते या बिल्ली को साथ ले जा सकते हैं. बशर्ते वे पूरी कूपे या पूरा केबिन बुक करें. बाकी सभी श्रेणियों में पालतू जानवर मालिक के साथ यात्रा नहीं कर सकते और उन्हें गार्ड के ब्रेक वैन में ले जाया जाता है.

इसलिए कई पालतू पशु मालिकों के लिए फर्स्ट AC कोई लग्जरी नहीं, बल्कि लंबी दूरी की सम्मानजनक और व्यावहारिक रेल यात्रा का एकमात्र विकल्प है. ऑनलाइन पेट बुकिंग की सुविधा शुरू होने से यह व्यवस्था और मजबूत हुई है.

आम धारणा है कि फर्स्ट AC धीरे-धीरे खत्म हो रहा है लेकिन रेलवे की नीति इससे उलट है. 2017 के बाद कई रेलवे जोनों ने फर्स्ट AC कोच बढ़ाए हैं. आने वाली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के डिजाइन में भी फर्स्ट AC कोच शामिल है. इससे साफ है कि भारतीय रेलवे इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है.

दुनिया के दूसरे देशों में भी भारत का तरीका अलग है. यूरोप में रातभर चलने वाली ट्रेनें अब यात्रा श्रेणियों की जगह केबिन बेचती हैं. अमेरिका में एमट्रैक स्लीपर का किराया एयरलाइंस की तरह मांग के हिसाब से तय करता है. जापान में इसकी सबसे नजदीकी सेवा अब सीमित और विशेष सेवा के रूप में बची है.

इसके उलट भारतीय रेलवे अब भी फर्स्ट AC को एक अलग यात्रा श्रेणी के रूप में चलाता है, जहां देशभर के सैकड़ों मार्गों पर किराये अपेक्षाकृत स्थिर और नियंत्रित रहते हैं. यह सिर्फ पुरानी प्रीमियम सेवा नहीं, बल्कि ब्रिटिश दौर की रेलवे श्रेणी व्यवस्था के बचे हुए आखिरी उदाहरणों में से एक है.

'हनीमून सुइट' विवाद एक और विडंबना भी दिखाता है. भारतीय रेलवे कई वर्षों से किराये के अलावा दूसरी आय बढ़ाने की कोशिश कर रहा है लेकिन ऐसी आय अब भी उसकी कुल कमाई का सिर्फ लगभग 3 फीसद है, जो दुनिया की कई प्रमुख रेलवे प्रणालियों से काफी कम है. कबाड़ की बिक्री अब भी रेलवे की सबसे भरोसेमंद गैर-किराया आय है.

वहीं, सामान पैकिंग कियोस्क, EV चार्जिंग स्टेशन और ऑक्सीजन पार्लर जैसे प्रयोग सीमित सफलता ही हासिल कर पाए हैं. अब नीति आयोग ने यह समझने के लिए रिसर्च शुरू कराया है कि रेलवे की गैर-किराया आय उम्मीद के मुताबिक क्यों नहीं बढ़ रही है?

सजी हुई फर्स्ट AC कूपे विवाद ने अनजाने में एक और बात साबित कर दी है. कुछ यात्री प्रीमियम कोचों के भीतर खास अनुभव के लिए अतिरिक्त भुगतान करने को तैयार हैं. हालांकि, ऐसे अनुभव रेलवे के नियमों के तहत सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से उपलब्ध कराए जा सकते हैं या नहीं, यह अलग सवाल है.

दशकों से यह सेवा चल रही है लेकिन अब तक कोई आधिकारिक सरकारी अध्ययन नहीं हुआ है जिसमें फर्स्ट AC यात्रियों की आय, पेशा या यात्रा के उद्देश्य का विस्तृत विवरण हो. आम धारणा यही है कि इसमें वरिष्ठ नौकरशाह, कॉरपोरेट अधिकारी, संपन्न परिवार, बुजुर्ग यात्री और निजता चाहने वाले लोग सफर करते हैं लेकिन यह धारणा ठोस आंकड़ों पर आधारित नहीं है.

यही वजह है कि फर्स्ट AC आज भी भारत की परिवहन व्यवस्था में एक अनोखी जगह रखता है. यह एक पुरानी सेवा है जिसे सामान्य आर्थिक तर्कों से सही ठहराना मुश्किल लगता है. हालांकि, फिर भी यह इसलिए कायम है क्योंकि यह आधुनिक यात्रा में तेजी से दुर्लभ होती जा रही एक सुविधा देता है. यह सुविधा रेल पर सस्ता निजी कमरे का है. 

Read more!