चीन का नया दांव
जब नेपाल में सरकार अस्थिर थी तब नेपाल के शीर्ष राजनेताओं के साथ यान्की की बैठकों ने सबकी भौंहें टेढ़ी कर दी

मई तक नेपाल में चीन की राजदूत होऊ यान्की को उनकी 'सोशल मीडिया कूटनीति' के लिए जाना जाता था. प्रस्तावित पर्यटन अभियान 'विजिट नेपाल ईयर 2020' के लिए शुभकामनाएं देते हुए यान्की ने ट्विटर पर नेपाल की विरासत स्थलों में घूमते हुए अपनी तस्वीरें शेयर की थीं, और इसकी वजह से नेपालियों के बीच उनकी खासी साख जम गई थी.
मई में हालात बदल गए जब यान्की सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के तीन शीर्ष नेताओं—प्रधानमंत्री के.पी. ओली, पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' और माधव कुमार नेपाल—से मिलीं ताकि पार्टी में संभावित विभाजन टाला जा सके. तब से, वे नेपाल में लोगों की निगाहों में आ गईं, खासकर जब इस महीने की शुरुआत में एनसीपी में अंदरूनी सत्ता संघर्ष के बाद यान्की एक दफा फिर इसके नेताओं से मिलीं. काठमांडू पोस्ट के पूर्व संपादक और काठमांडू के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इंटीग्रेटेड डेवपलमेंट स्टडीज के सीनियर फेलो अखिलेश उपाध्याय कहते हैं, ''चीन एनसीपी को एकजुट देखना चाहता है क्योंकि इसने इन (वाम) पार्टियों को एकीकृत करने में बहुत सियासी पूंजी लगाई है.''
काठमांडू से पहले, यान्की बीजिंग में विदेश मंत्रायल के एशियाई मामलों के महकमे में उप-महानिदेशक थीं और दक्षिण एशियाई मामलों की कर्ता-धर्ता भी. इससे पहले वे लॉस एंजेलिस वाणिज्य दूतावास और पाकिस्तान में सेवा दे चुकी हैं. एनसीपी के अंदरूनी सूत्र संकेत देते हैं कि विदेशी राजदूत, जिनमें भारत के राजदूत भी शामिल हैं, नेपाल की राजनीति में हमेशा से दिलचस्पी लेते रहे हैं. एनसीपी के विदेशी मामलों के डिप्टी चीफ विष्णु रिजाल कहते हैं, ''लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राजदूत यान्की हमारी राजनीति को निर्देश दे रही हैं. अन्य राजदूतों की ही तरह वे भी नेपाल में स्थिरता चाहती हैं.''
फिर भी, अस्थिर सरकार के समय नेपाली राजनेताओं के साथ यान्की की बैठक ने सबकी भौंहें टेढ़ी कर दी हैं, खासकर तब, जब चीन ने हाल ही में नेपाल के मामलों में सक्रिय रूप से दिलचस्पी जाहिर करनी शुरू की है. उपाध्याय कहते हैं, ''एक समय था जब चीनी राजदूत नेपाली लोगों के साथ बात करने के लिए अनुवादकों का इस्तेमाल करते थे. पिछले तीन राजदूत ऐसे हुए हैं जिन्होंने अंग्रेजी बोलना शुरू कर दिया है. वे नेपाल और दुनिया को एक स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं—चीन को अब महाशक्ति मानना होगा.''
नेपाल के सबसे बड़े एफडीआइ स्रोत के रूप में चीन उभरा है और इसके नए निवेश आधा से ज्यादा पर्यटन क्षेत्र में है. 2019 में 1,70,000 चीनी लोगों ने नेपाल की यात्रा की और इससे ज्यादा सिर्फ भारत से पर्यटक वहां गए. हालांकि भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है, लेकिन चीन के साथ उसका व्यापार बढ़कर 1.5 अरब डॉलर का हो गया है और वह नेपाल के विदेशी मदद देने वाले साझेदारों में पहले पायदान पर है. चीनी कंपनियों की ओर से नेपाल में विकसित किए जा रहे प्रमुख इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 21.5 करोड़ डॉलर का पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भेरी-बबई डाइवर्जन मल्टीपरपस इरिगेशन प्रोजेक्ट और रसुवागढ़ी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट शामिल हैं. वैसे, चीन के बेल्ट ऐंड रोड पहल के तहत सूचीबद्ध नौ में से किसी भी परियोजना में कोई खास प्रगति नहीं देखी गई है.
चीन के नए नजरिए की एक मिसाल फरवरी, 2019 में दिखी जब दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए अमेरिका के उप-सहायक रक्षा मंत्री जो फेल्टर ने कहा कि नेपाल में चीनी निवेश से 'नेपाल का हित भी सधना चाहिए, सिर्फ चीन का नहीं.' नेपाल के चीन के 'कर्ज-जाल कूटनीति' में फंसने की आलोचना का जवाब देते हुए यान्की ने एकप्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ''चीन ने जिस सहायता का प्रस्ताव दिया है उसके साथ कोई राजनैतिक सूत्र नहीं है और (चीन) घरेलू मामलों (नेपाल के) में दखल भी नहीं है.'' नेपाल में यान्की की नई दिलचस्पी को एनसीपी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के बीच पार्टीस्तरीय गठजोड़ की रोशनी में देखा जा रहा है. भारत और चीन के बीच तनाव चरम पर था तब सीसीपी के साथ जून में उसकी एक वर्चुअल बैठक ने सबका ध्यान खींचा.
इसी साल फरवरी में यान्की की नेपाली मीडिया में काफी आलोचना हुई थी क्योंकि तब चीनी दूतावास ने एक बयान जारी करके एक लेख के दोबारा प्रकाशित करने पर काठमांडू पोस्ट निंदा की थी. लेख में इस महामारी को बदतर बनाने में 'चीन की गोपनीयता बरतने' को जिम्मेदार ठहराया गया था. बयान में, पोस्ट के प्रधान संपादक को 'कुछ चीन विरोधी ताकतों का तोता' बताया गया. ऐसा पहली बार हुआ कि चीन ने नेपाली मीडिया के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयान दिया. यान्की की इन गतिविधियों की वजह से उनकी तुलना अब 2008 से 2015 के नाकेबंदी के दौरान नेपाली सियासत में अति सक्रिय रहे भारतीय राजदूतों से की जाने लगी है.
भारतीय मीडिया की यान्की की सनसनीखेज और सेक्सिस्ट कवरेज को परे रख दें, तो भी नेपाली नेताओं के साथ उनकी बैठकों ने नेपाल में चीन की अति सक्रियता पर मुहर लगा दी है. उपाध्याय कहते हैं, ''भारत के उलट चीन नेपाल में दखल न देने वाली ताकत के तौर पर मौजूद था. अब यह स्पष्ट तौर पर अपनी ताकत का इजहार करना चाहता है.''
अमिश राज के लेख अल जजीरा, रोड्स ऐंड किंगडम्स और हिमाल साउथएशियन में प्रकाशित हो चुके हैं. वे नेपाल-चीन संबंधों के इतिहास पर एक किताब लिख रहे हैं