पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा की भारत नीति काबिल-ए-तारीफ !

पाकिस्तान में लगातार तीसरे आम चुनाव की आपाधापी शुरू हो चुकी है. मुल्क के सबसे ताकतवर और अराजनैतिक सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा फिर सुर्खियों में हैं

गेट्टी इमेजेज
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पाकिस्तान में सैन्य छावनी वाले शहर रावलपिंडी में जनरल हेडक्वार्टर्स (जीएचक्यू) में 2014 की गर्मियों की एक रात प्रशंसकों की भीड़ ने घनी मूंछों वाले पाकिस्तानी सेना के 15वें सेना प्रमुख राहील शरीफ को घेर लिया. उस दिन डिफेंस डे था. सेना अभी मुशर्रफ दौर के राजनैतिक अटपटेपन और कयानी दौर वाले आतंकी खतरों के प्रतिबंधों की खोल से धीरे-धीरे बाहर आना शुरू कर रही थी.

दशक भर से ज्यादा समय के अवरोध के बाद सार्वजनिक परेड, जिसमें कुछ चुनिंदा लोग आला अफसरों से बात कर सकते थे, फिर से शुरू की जा रही थी. वहां से करीब 40 मिनट की ड्राइव की दूरी पर इस्लामाबाद में विपक्षी नेता इमरान खान चुनाव सुधारों की मांग को लेकर धरने पर बैठे हुए थे.

इमरान को उम्मीद थी कि उनके धरने में हजारों की भीड़ जुटेगी और तहरीर स्क्वायर जैसी स्थिति पैदा हो जाएगी जिसके बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को दबाव के आगे झुकना पड़ेगा और इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ेगा.

जीएचक्यू के आला जनरल इस बात पर बंटे हुए थे कि उन्हें उस सरकार का पक्ष लेना चाहिए जो सेना को नापसंद करती है या विपक्ष का साथ देना चाहिए जिसने उसका समर्थन किया था. जिस समय राहील के इर्दगिर्द जुटी भीड़ छंटने का नाम नहीं ले रही थी और जनरल के साथ सेल्फी लेने वालों का तांता लगा हुआ था, उसी समय थोड़ी दूरी पर चौड़े कंधे वाला लंबे कद का एक शख्स अकेला खड़ा हुआ था जिसे छोटे कद वाले सैनिकों की बातें झुककर सुनने की आदत थी.

वह अपना एक हाथ पीछे मोड़कर दूसरे हाथ में सेना की छड़ी से अपने पैर पर धीरे-धीरे थपकी दे रहा था. वह शख्स कोई और नहीं बल्कि लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा था, पाकिस्तान की सबसे बड़े मिलिट्री फॉर्मेशन एक्स कोर का तत्कालीन कमांडर.

जीएचक्यू के परेड मैदान में तमाम लोगों के विपरीत बाजवा किसी सेलिब्रिटी की तरह भीड़ से घिरे राहील शरीफ की तरफ नहीं, बल्कि काले ग्रेनाइट से बने शहीदों के स्मारक को निहार रहे थे. उस रात और आने वाले कुछ महीनों तक बाजवा के इस तरह भीड़ से अलग-थलग एकदम अकेले खड़े रहने की वजह भी थी.

जीएचक्यू में वे ऐसे कुछ ही लोगों में एक थे जो इस्लामाबाद में चल रहे गृह कलह जैसे हालात के समय लोकतंत्र और चुनी हुई सरकार को बनाए रखने की सलाह दे रहे थे और 111 ब्रिगेड की ताकत को फिलहाल हाशिये पर रखने के हिमायती थे.

हालांकि उन्हें एक्स कोर के प्रमुख के पद से हटाकर दफ्तर में बैठने वाले साधारण-सी जिम्मेदारी वाले पद पर भेज दिया गया. फिर भी वे सेना प्रमुख के सचिवालय से जुड़ी स्टार जैसी हैसियत के खिलाफ थे और उन्हें बस उनके कुछ करीबी दोस्त सहकर्मी ही जानते थे. लेकिन अंततः लोकतंत्र का पक्षधर होने की उनकी प्रतिष्ठा काम आई और उनकी वर्दी पर चौथा सितारा जुड़ गया यानी वे पाकिस्तान की जमीन पर सबसे ताकतवर पद पर आसीन हो गए.

साल भर से कुछ ज्यादा समय तक इस पद पर रहने और एक गैर-राजनैतिक सेना प्रमुख की प्रतिष्ठा हासिल करने की कोशिश के बाद मुल्क के सबसे बड़े सैनिक अधिकारी राजनैतिक विवादों के भंवर में फंस गए हैं.

देश जब किसी सैन्य या न्यायिक बाधा के बिना तीसरे ऐतिहासिक आम चुनाव की तैयारी कर रहा है, तभी अमेरिका की ओर से पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं और आगे भी कुछ और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जिसके कारण अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में कड़वाहट आ गई है.

ऐसे में जनरल बाजवा और उनकी 6 लाख जवानों की फौज—जिसे देश का सबसे ताकतवर संगठन माना जाता है—बचाव की मुद्रा में मालूम पड़ते हैं हालांकि वे तेजी से अपनी खोई हुई हैसियत पाने की कोशिश कर रहे हैं.

बलूच रेजिमेंट के इस 57 वर्षीय इन्फेंट्री के अफसर का नेशनल सिक्योरिटी प्लान "बाजवा डॉक्ट्रिन'' भारी विवाद का विषय बन गया है जो पाकिस्तान में नागरिक और मिलिट्री के बीच दरार को दर्शाता है. यह विवाद ऐसे समय आया है जब पक्षपातपूर्ण राजनीति और देश में सक्रिय न्यायपालिका और सत्तारूढ़—लेकिन सेना-विरोधी—शरीफ के शासन तंत्र और नौकरशाही व मीडिया में उनके सहयोगियों के बीच टकराव चल रहा है.

पिछले साल जुलाई में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की ओर से शरीफ की रवानगी के पीछे सेना का हाथ माना जा रहा था. सेना पर यह आरोप शरीफ खेमे की ओर से प्रचारित किया गया था. लेकिन सेना—जिसने आजादी के बाद से सात दशकों में से तीन दशक तक प्रत्यक्ष रूप से शासन किया है—इस आरोप को पुरजोर तरीके से खारिज करती है.

लेकिन 16 महीने तक लगातार पाकिस्तानी मीडिया के निशानों ने बचने के बाद बाजवा ने मार्च में पत्रकारों से अनाधिकारिक रूप से बात करके एक नई पर गलत शुरुआत की.

न ही इस बातचीत की गोपनीयता और न ही इसकी संवेदनशीलता को कायम रखा जा सका. जल्दी ही एक के बाद एक स्तंभकार ने इस चार सितारों वाले सैनिक अधिकारी की बातचीत को पूरी तरह से सार्वजनिक कर दिया.

भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाना, अफगानिस्तान के मामले में अमेरिकी दबाव के आगे न झुकना, जिहादियों को मुख्यधारा में लाकर चुनावी राजनीति में लाना, लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था की दशा, संविधान में खामियां, शरीफ के परिवार का संकट, कैबिनेट के कुछ मंत्रियों का समर्थन, और न्यायपालिका के प्रति सेना का पूरा समर्थन जैसे राजनैतिक रूप से ज्वलंत मुद्दे बातचीत का विषय थे और उन्हें बाजवा डॉक्ट्रिन के तौर पर देखा गया.

इसके बाद इस बातचीत के परिणाम सामने आ गए, संपादकीय लेखों में इसकी आलोचना की गई. सोशल मीडिया में खूब बहसें हुईं. पाकिस्तान के वामपंथ से सेना के आलोचक मैदान में आ गए. बाजवा को पक्षपाती बताया गया और अपने दायरे से बाहर जाने के लिए उनकी आलोचना की गई.

लेकिन एक ऐसे देश में जहां सेना को लोगों का भरपूर समर्थन हासिल रहा है (2017 के गैलप सर्वे के मुताबिक, सेना को 79 प्रतिशत लोगों का समर्थन हासिल है) जब बाजवा की भारत से संबंधित रणनीति—कश्मीर के मुद्दे को नफरत-आतंक या जंग से हल न करना—पर चर्चा हुई और लगभग पूरी तरह से उसकी तारीफ की गई तो उसके बाद सेना ने 23 मार्च को पाकिस्तान डे की परेड में भारत के डिफेंस अताशे और दक्षिण ब्लॉक के दूसरे मेहमानों को आमंत्रित किया.

पाकिस्तान की सेना के लिए ऐसा करने का यह पहला मौका है, जो भारत के साथ तीन जंग लड़ चुकी है. इंटरसर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) डायरेक्टरेट के पूर्व मेजर जनरल इस्फनदियार पटौदी जो बाजवा के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं कहते हैं, "सेना प्रमुख व्यावहारिक राजनीति की गहरी समझ रखते हैं और उन्होंने क्षेत्रीय रणनीति बनाने और अति क्षेत्रीय पार्टनरों से ज्यादा पड़ोसियों के रणनीति बनाने में इसका बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया है.'' 

इस डॉक्ट्रिन को सामने रखने के तुरंत बाद असामान्य ढंग से मीडिया में उदारवादी ताकतों—जिनमें जंग समूह सबसे आगे रहा है और जिसके अखबार और प्रसारणों पर सेना की ओर से संचालित कैंटोनमेंटों में प्रतिबंध लगा हुआ है (सेना के इस कदम को बाजवा का समर्थन हासिल है) ने जनरल की तारीफ की.

स्तंभकार सुहैल वराइच ने 70 वर्षों के उग्र राष्ट्रवाद को दरकिनार करने और पाकिस्तान को पड़ोसियों के साथ शांति स्थापित करने पर जोर देने वाले व्यावहारिकता के सिद्धांत की तरफ ले जाने के लिए बाजवा को धन्यवाद दिया.

लेकिन हर कोई इससे खुश नहीं था. सोशल मीडिया ने बाजवा की थ्योरी पर कड़ा रुख अपनाया. उनकी इस थ्योरी के तहत भारी हथियारों से लैस और अच्छी तरह से प्रशिक्षित कट्टरपंथी तत्वों को भूमिगत होने के लिए मजबूर होने से पहले मुख्यधारा में लाने का प्रयास करने की योजना है.

पटौदी फरमाते हैं, "कट्टरपंथियों को मुख्यधारा में लाने का गलत मतलब नहीं निकालना चाहिए कि आतंकवादियों को राजनीति में लाया जा रहा है...यह जरूरी है कि जो लोग कट्टरपंथी विचार रखते हैं उन्हें भी राजनैतिक अभिव्यक्ति का अवसर मिलना चाहिए. मुमकिन है, ऐसा करने से वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें.''

पाकिस्तान में सैनिक शासन के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए कुछ लोगों को सेना की मंशा को लेकर संदेह रहा है. जनरल हेडक्वार्टर्स में मीट ऐंड ग्रीट कार्यक्रम में आमंत्रित एक टीवी ऐंकर का कहना है, "ऐसा लगा जैसे हम एकदम नए बादशाह से मिल रहे थे.''

उसके मुताबिक, उनकी बॉडी लैंग्वेज और आत्मविश्वास को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बादशाह जो जरूरी सुधार करना चाहता है, रिटायरमेंट के बाद भी शायद कुछ समय तक रहेगा. लेकिन बाजवा का तंत्र इस बात को दोहराता है कि वे गैर-राजनैतिक सैनिक अधिकारी रहे हैं और सेना पूरा भरोसा दिलाती है कि आम चुनाव अपने निर्धारित समय पर होंगे जो गर्मियों के अंत में हो सकते हैं.

हालांकि वे उन थोड़े से लेफ्टिनेंट जनरलों में से एक रहे हैं जिसने 2014 में उथल-पुथल के दौरान अपने पूर्ववर्ती को सैनिक अधिग्रहण के खिलाफ सावधान किया था लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कमजोरी और राजनैतिक रूप से संवेदनशील वक्त में अपनी डॉक्ट्रिन सामने रखने पर डॉन अखबार ने अपने संपादकीय में इसकी आलोचना की थीः "लोकतंत्र की दिशा में बढ़ता कदम समय पर होने वाले लगातार तीसरे आम चुनाव की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन लोकतांत्रिक योजना किन्हीं रूपों में खतरे में हैं. इस तरह की अनिश्चितता के दौर में किसी सेना प्रमुख की टिप्पणी को लोकतंत्र की वैधानिकता पर सवाल उठाने के तौर पर देखा जा सकता है.''

जब से विवाद शुरू हुआ है सेना ने इन घोषणाओं के साथ अपनी प्रतिक्रिया दी हैः "बाजवा डॉक्ट्रिन'' सुरक्षा से संबंधित है राजनीति से बिल्कुल नहीं. पटौदी बाजवा की आलोचना को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, "वे नीति-निर्माताओं को सलाह देने के मामले में काफी परिपक्व व्यक्ति हैं और अपनी तरक्की या अपना नाम कमाने की चाहत नहीं रखते हैं.

पाकिस्तान के सामने बहुत सी समस्याएं हैं और किसी न किसी को मुश्किल सवाल पूछने की जरूरत है. जनरल बाजवा उन्हीं सवालों को उठा रहे हैं.'' यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुल्क में लोकतंत्र और सेना के रिश्ते आगे कैसे रहते हैं.

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