प्रधान संपादक की कलम से
फ्रेशर्स का एक बैच ऐसे समय कॉलेज में प्रवेश करेगा, जब उनकी पढ़ाई के दूसरी तरफ नौकरी का बाजार लगातार कठिन हो रहा है और स्नातकों में बेरोजगारी चिंता का विषय बनी हुई है

- अरुण पुरी
इंडिया टुडे का सालाना बेस्ट कॉलेज सर्वे इस विशेष अंक के साथ अपने 30वें संस्करण में पहुंच रहा है. इस बार इसकी भूमिका सामान्य से ज्यादा अहम है क्योंकि यह ऐसे समय आया है जब छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं बहुत बढ़ी हुई हैं और बहस का माहौल गर्म है. कॉलेज दाखिले सुर्खियों में हैं, और जरूरी नहीं कि अच्छी वजहों से ही हों.
इस गर्मी में अंडरग्रेजुएट कोर्सों के लिए दो मुख्य राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं में व्यवधान आया. सीयूईटी-यूजी (कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जाम-अंडरग्रेजुएट), जिसके जरिए 250 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में दाखिले होते हैं, तकनीकी गड़बड़ी से प्रभावित हुआ और आंशिक रीटेस्ट कराना पड़ा. इसके नतीजे अभी 23 जून को जारी हुए हैं.
इस समय हर कोई यह देखने में जुटा होगा कि उसके सामने कौन-से विकल्प खुले हैं. मेडिकल स्ट्रीम्स के लिए ज्यादा विवादों में घिरे नीट-यूजी (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट-अंडरग्रेजुएट) के 21 जून के रीटेस्ट के नतीजे जुलाई में आएंगे. अगले कुछ दिनों और हफ्तों में लाखों छात्रों को ऐसा फैसला करना होगा जो उनकी जिंदगी बदल देंगे.
हमारा सर्वे चिंताओं को कम करने और भ्रम की धुंध हटाने में बेहद उपयोगी साबित होगा. वर्ष 2018 से प्रतिष्ठित मार्केट रिसर्च एजेंसी एमडीआरए के साथ किया जा रहा इंडिया टुडे बेस्ट कॉलेज रैंकिंग सर्वे लंबे समय से अपनी श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. अज्ञात का डर सूचना की कमी से पैदा होता और बढ़ता है. हम उस कमी को भरोसेमंद, व्यवस्थित और उपयोग में आसान जानकारी से भरते हैं.
इस अंक के पन्ने कॉलेज में दाखिले की तैयारी कर रहे छात्रों को बहुत जरूरी भरोसा देंगे. वे देखेंगे कि आज के भारत में गुणवत्तापूर्ण कॉलेज शिक्षा तेजी से ज्यादा लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत हो रही है. हम जिन 14 स्ट्रीम्स की रैंकिंग करते हैं, उनमें से हरेक के लिए 112 सूचकों-संकेतकों का इस्तेमाल करने वाली हमारी मूल्यांकन पद्धति आपको सर्वश्रेष्ठ विकल्प देने पर केंद्रित है. लेकिन हम 'सर्वश्रेष्ठ' को कई आधारों पर, संदर्भ के हिसाब से और उस वास्तविक मूल्य के रूप में परिभाषित करते हैं, जो छात्र को वास्तविक दुनिया में मिलता है.
लिहाजा, अब आपको सिर्फ कुछ चुनिंदा अभिजात संस्थानों की छोटी-सी सूची नहीं मिलती, जो ज्यादातर छात्रों की पहुंच से निराशाजनक रूप से बाहर हों. कई विषयों में शीर्ष नाम भले न बदले हों और यह भी सच है कि इनमें से कई अब भी कुछ महानगरों में केंद्रित हैं. मसलन, दिल्ली-एनसीआर के पास टॉप 10 रैंक में 44 स्थान, टॉप 25 में 96 और टॉप 50 में चौंकाने वाले 143 स्थान हैं, जो अगले दो शहरों को मिलाकर भी ज्यादा हैं. लेकिन अब भारतीय कॉलेजों को एक ही पिरामिड की तरह देखने की जरूरत नहीं, जिसके शीर्ष पर बहुत कम जगह हो.
यह सिर्फ इसलिए भी नहीं कि दक्षिण भारत नई ताकत बन रहा है, जहां बेंगलूरू शिक्षा की एक नई राजधानी के रूप में उभर रहा है और चेन्नै के साथ मिलकर टॉप 10 रैंकिंग में 34 स्थान हासिल कर रहा है.असल खबर इससे आगे के इलाकों में है. सर्वे की 'उभरते ठिकाने' सूची दिखाती है कि प्रतिभा अब बड़े शहरों की बपौती नहीं रही. छोटे शहर चुपचाप टॉप 30 कॉलेज दे रहे हैं. हमारा सर्वे दिखाता है कि लगभग हर कोर्स के लिए एक श्रेष्ठ शहर है और रैंकिंग में नए प्रवेश यह साबित करते हैं कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कोई बंद क्लब नहीं.
इसके अलावा पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के लिए जोनल रैंकिंग भी है, साथ ही शहरवार टॉप-थ्री भी. इसलिए चाहे कोई छात्र पटना या पटियाला में हो, शिलांग, शिरडी या श्रीपेरंबुदूर में हो, वह अपनी पहुंच के भीतर सबसे अच्छा विकल्प ढूंढ़ सकता है. भौगोलिक विस्तार संभावनाओं के फैलते दायरे की सिर्फ एक अभिव्यक्ति है.
आज शिक्षा ऐसी चीज भी है, जिसमें आर्थिक मूल्य का क्षैतिज फैलाव बहुत बड़ा है. खासकर मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून, डिजाइन और आर्किटेक्चर में सरकारी और निजी कॉलेजों की फीस के बीच फर्क बहुत ज्यादा हो सकता है. अभिभावकों को खर्च करने की अपनी क्षमता और इस बात को ध्यान में रखकर सावधानी से फैसला करना चाहिए कि कॉलेजों के प्लेसमेंट रिकॉर्ड फीस के खर्च को सही ठहराते हैं या नहीं. हमारा इनोवेशन पैसा वसूल कॉलेज जिसका रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (आरओआइ) इंडेक्स, इस कमी को बहुत उपयोगी तरीके से भरता है.
कोई शीर्ष निजी इंजीनियरिंग कॉलेज सालाना 35 लाख रुपए से ज्यादा का शुरुआती वेतन पैकेज दे सकता है, लेकिन शुद्ध आरओआइ के आधार पर कम फीस वाले सरकारी कॉलेज उससे आगे निकल सकते हैं. कोई 'सस्ता' लेकिन गुणवत्तापूर्ण कॉलेज एक अलग तरह की वास्तविक वैल्यू दे रहा होता है, जिसे हम पहचानते और रैंक करते हैं.
एक शुद्ध संख्यात्मक विस्तार भी है. 2018 के बाद से कुल भागीदारी चार गुना बढ़कर 2,016 हो गई है. ये कॉलेज कहीं ज्यादा गहरे प्रतिस्पर्धी मैदान से निकलकर आए सर्वश्रेष्ठ संस्थान हैं. इसलिए यहां छात्रों के सामने विकल्पों की तस्वीर किसी सुपरमार्केट शेल्फ जैसी है—विशाल और सुलभ लेकिन विश्लेषण की प्रासंगिक कसौटी पर गुणवत्ता के भरोसे के साथ. नए फ्रेशर्स का एक बैच ऐसे समय कॉलेज में प्रवेश करेगा, जब उनकी पढ़ाई के दूसरी तरफ नौकरी का बाजार लगातार कठिन हो रहा है और स्नातकों में बेरोजगारी चिंता का विषय बनी हुई है.
अर्थव्यवस्था खुद बदलाव के दौर में है और आज टेक्नोलॉजी कौशलों को नए सिरे से आकार दे रही है. ऐसे में पुराने तरीकों से विकल्पों का आकलन करने के बजाए लचीला और अनुकूल रहना उनके ज्यादा काम आएगा. इस संस्करण की सबसे अहम नई श्रेणी 'सर्वाधिक सुधार वाले कॉलेज' इसी जरूरत का जवाब देती है. यह पिछले पांच वर्षों में किसी कॉलेज की रैंक में हुए प्रतिशत सुधार को मापती है.
जब नजर स्थिर शिखर से हटाकर उस दिशा पर जाती है जहां रफ्तार है, तो हम पाते हैं कि अक्सर इसका संबंध इस बात से होता है कि कोई कॉलेज एआइ युग के प्रति कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दे रहा है. ऐसे गहरे और बारीक रुझानों का हमारा विश्लेषण ही इस संस्करण को बेस्ट कॉलेज की तलाश करने वाले छात्रों के लिए एक बेहद उपयोगी फील्ड गाइड बनाता है.
आपकी खोज सफल हो, इसके लिए ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ.