हलफनामाः भीषण साइबर हमले का खतरा
2019 तक दुनिया की 57 फीसदी आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगी है. इसलिए अकाउंट हैक होने का खतरा सबके लिए समान रूप से बढ़ रहा है. इस लिहाज से कंपनियों और सरकारों को लोगों का डाटा सुरक्षित रखने के लिए कहीं ज्यादा संवेदनशीलता दिखानी होगी

28 अक्तूबर को जॉर्जिया में हुए भयंकर साइबर हमले ने दुनिया भर में खलबली मचा दी. इस हमले में यहां की 15 हजार वेबसाइट एकाएक ऑफलाइन हो गईं. देश के राष्ट्रपति से लेकर अदालत तक की वेबसाइट इससे बच नहीं सकीं. कुछ टीवी चैनलों का प्रसारण इस साइबर हमले से बंद हो गया. रिपोर्ट्स में बताया गया कि ये हमला एक इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर पर किया गया जिसमें उसका सर्वर ही ठप कर दिया गया. इस हमले का जिक्र इसलिए जरूरी है क्योंकि साइबर अटैक ही आतंकवाद का दूसरा रूप बनकर जल्द ही सबका चैन चुराने जा रहा है.
ताजा खबर ये है कि 13 लाख भारतीयों के क्रेडिट और डेबिट कार्ड का डाटा डार्क वेब पर बिकाऊ है. इसकी कीमत 13 करोड़ डॉलर लगाई गई है. तकनीकी वेबसाइट जेड नेट के मुताबिक, जोकर्स स्टैश नामक ऑनलाइन दुकान पर यह बिक रहा है. हर कार्ड के डाटा की कीमत 100 डॉलर रखी गई है. जाहिर है, हैकर इससे कितनी कमाई का मंसूबा बांधे हैं. जानकारी के लिए बता दें कि डार्क वेब, इंटरनेट का एक अंधा कोना है. गूगल सर्च में डार्क वेब की साइटों के नतीजे नहीं आते. दुनिया में ड्रग्स और हथियारों की तस्करी से लेकर तमाम काले काम इसी डार्क वेब से होते हैं. इस पर किसी देश की किसी सरकार का नियंत्रण नहीं हैं. ये हैकरों की जन्नत है.
2017 में साइबर हमलों से ग्लोबल इकोनॉमी को 600 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा. जाहिर है इसमें निजी कंपनियां भी शामिल हैं. साइबर हमलों से होने वाले नुकसान में हर साल 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी होती जा रही है. 2019 तक दुनिया की 57 फीसदी आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगी है, इसलिए खतरा सबके लिए समान रूप से बढ़ रहा है. इस लिहाज से कंपनियों और सरकारों को लोगों का डाटा सुरक्षित रखने के लिए कहीं ज्यादा संवेदनशीलता दिखानी होगी. अन्यथा बेहद गंभीर परिणाम भोगने पड़ सकते हैं.
आम लोगों की जानकारी के लिए कि वेबसाइट या एकाउंट हैक करने के लिए हैकर दो तिहाई से ज्यादा मामलों में फिशिंग ईमेल का इस्तेमाल करते हैं. लुभावने ऑफर वाले इन ईमेल को यूजर बिना सोचे समझे जब खोलकर क्लिक कर देत है तो उसका एकाउंट हैक हो जाता है. इसके बाद वायरस और रेनसमवेयर के जरिये अकाउंट हैक होते हैं. इसके लिए आप अवैध किस्म के सॉफ्टवेयर या वेबसाइट पर जब जाते हैं तो आपके कंप्यूटर का डाटा हैक हो जाता है. रिस्कआइक्यू वेबसाइट के मुताबिक दुनिया भर में एक मिनट में 29 लाख डॉलर साइबर अपराधियों की भेंट चढ़ जाते हैं और कंपनियां 25 डॉलर प्रति मिनट के हिसाब से साइबर सिक्योरिटी खतरे से निपटने पर खर्च कर रही हैं.
इस खतरे को खासकर भारत में या तो समझा नहीं जा रहा है या समझ में आ नहीं रहा है. भारत में आए दिन सरकारों और प्राइवेट कंपनियों के डाटा में सेंध लग रही है लेकिन साइबर सिक्योरिटी के मामले में लगभग शून्य प्रयास किए जा रहे हैं. कुछ साल पहले यूक्रेन में साइबर हमले के चलते 2 दिनों तक बिजली गायब रही. ऐसे हमलों के समाचार अक्सर आ रहे हैं लेकिन हमारे देश में अभी उस स्तर की सजगता नहीं अपनाई जा रही है.
साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ कहते हैं कि आम आदमी अपने ईमेल और एकाउंट की सुरक्षा के लिए कम से कम 12345, डेट ऑफ बर्थ, बच्चों या रिश्तेदारों के नाम पर आधारित पासवर्ड्स का इस्तेमाल न करें. इन्हें जटिल बनाएं और अपना डाटा सुरक्षित रखें. सरकार जब जागेगी तब जागेगी. भारत में साइबर क्राइम से निपटने के लिए कानून तो बन गए हैं लेकिन तकनीक की समझ वाले विशेषज्ञों का अकाल है. पुलिस और तंत्र साइबर अपराधियों से बहुत पीछे चल रहा है.
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