भोपाल में अब कंक्रीट त्रासदी
बिल्डरों को लाभ पहुंचाने वाले नए मास्टर प्लान के मसौदे में विवादास्पद नियमों के उल्लंघनों को माफ करने और उन्हें कानूनी मान्यता देने का प्रस्ताव

रिहाइशी इलाकों में दुकान-धंधेवालों का विरोध करते स्थानीय निवासी
यह ऊपर से दूरदर्शिता के साथ तैयार आदर्श योजना नजर आती है. 26 सितंबर को मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल विकास योजना 2047 का मसौदा पेश किया. इस मार्गदर्शक दस्तावेज से तय होगा कि शहर में किस तरह के निर्माण और गतिविधियों की अनुमति होगी और किसकी नहीं. इसकी सख्त जरूरत थी क्योंकि शहर ने 1995 के बाद से अपना मास्टर प्लान अपडेट नहीं किया है.
सुप्रीम कोर्ट की भी इस पर नजर है. मसौदा तैयार करने की इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चल रहे लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य मामले से निर्णायक दिशा मिली, जिसमें कोर्ट ने देशभर के आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के इस्तेमाल पर कड़ा ऐतराज जताया. भोपाल जैसे खूबसूरत और शांत शहर से ज्यादा इसकी मार शायद ही कहीं और पड़ी हो. सो, लगा कि व्यवस्था पटरी पर लौट आएगी.
पर क्या वाकई ऐसा है? फिलहाल लागू मास्टर प्लान एक बिल्कुल अलग दौर में बना था. उसकी 10 साल की अवधि 2005 में खत्म हो चुकी है. उसके बाद आईं सरकारें 21 वर्षों तक नया मास्टर प्लान नहीं बना सकीं. इसकी मुख्य वजह बिल्डर-राजनेता-नौकरशाहों का गठजोड़ है जिससे सबके हित जुड़े हैं.
बीते 18 वर्षों में नया मास्टर प्लान मंजूर कराने की दो कोशिशें दबाव के चलते ठंडे बस्ते में डाल दी गई थीं. मूल समीकरण आज भी नहीं बदला. सरकार ने भरोसा दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बिना यह प्लान लागू नहीं करेगी, पर इस मसौदे के प्रावधान अदालती रुख से मेल खाते नहीं दिखते.
एक प्रमुख प्रस्ताव यह है कि किसी इमारत में होने वाली गतिविधियों की अनुमति उस सड़क की चौड़ाई से निर्धारित हो जहां पर इमारत स्थित है—यानी व्यावसायिक और आवासीय क्षेत्रों की अलग-अलग श्रेणी वाले सिद्धांत को ही खत्म कर दिया गया है. सड़क की चौड़ाई को तीन श्रेणियों में बांटा गया है—12 मीटर, 18 मीटर और 24 मीटर.
हर श्रेणी के हिसाब से स्वीकृत गतिविधियों की सूची बनाई गई है. मेट्रो के दोनों तरफ 500 मीटर के दायरे में ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) की अवधारणा लाई गई है. ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स (टीडीआर) की भोपाल में पहली बार शुरुआत हो रही है, जिसके तहत अपनी जमीन सौंपने वाले मालिक को क्षतिपूर्ति मिलेगी. यानी रियल एस्टेट ही अब नई सचाई है.
मगर आरजी-3 के रूप में चिह्नित जोन के नागरिक हैरान हैं. यह उन सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक है जो दशकों से आवासीय संपत्तियों के फर्जी और अवैध व्यावसायिक उपयोग से प्रभावित रहा है. आरजी-3 के तहत चिह्नित अरेरा कॉलोनी, चार इमली, गांधी नगर, चूनाभट्टी और श्यामला हिल्स जैसे इलाकों में भू-उपयोग को कागजों पर नाममात्र के लिए आवासीय रखा गया है.
सड़क की चौड़ाई वाला नियम यहां लागू नहीं होगा. इसके बजाए, मसौदे में एक ऐसा प्रावधान जोड़ा गया है जो उन अवैध निर्माणों को कानूनी मान्यता दे देगा जो इस इलाके का दम घोंटने का कारण रहे हैं. इन गतिविधियों को चलाने वाले शहर के रसूखदार लोगों के लिए सिर्फ एक बहुत छोटी रुकावट है, बस जुर्माना भरिए और पार्किंग जैसी कुछ शर्तें पूरी कर लीजिए. मगर पार्किंग के लिए जगह आएगी कहां से, इसका मसौदे में कोई जिक्र नहीं.
इसके अलावा, धारा 15.38 के तहत माफी का दावा करने के लिए उल्लंघन करने वालों को केवल व्यावसायिक संपत्ति के किराए की रसीदें और कमर्शियल बिजली बिल दिखाने होंगे. आम लोग नए प्रस्तावों से गुस्से में हैं. नागरिक कार्यकर्ता कमल राठी कहते हैं, “वर्षों से नागरिक जीवन की गुणवत्ता बर्बाद हो चुकी है. और अब सरकार कानून तोड़ने वालों को इनाम देने की योजना बना रही है.”
नजर न आने वाला नुक्सान
राठी एक अनदेखे नुक्सान पर भी ध्यान दिलाते हैं, “आरजी-3 में व्यावसायिक गतिविधियों पर या तो पूरी रोक लगनी चाहिए या फिर भोपाल के बाकी हिस्सों की तरह सड़क की चौड़ाई के आधार पर सभी को इसकी औपचारिक अनुमति मिलनी चाहिए. इससे निवासियों के पास अपनी संपत्ति बेचकर वहां से जाने का विकल्प होगा. मगर अभी के हिसाब से आम निवासियों को भीड़, हवा और ध्वनि प्रदूषण का सामना करना पड़ेगा और उनकी संपत्ति के दाम भी गिरेंगे.”
प्लान में 51 किमी लंबे एक ग्रोथ कॉरिडोर का प्रस्ताव है जहां भूमि के सघन मिश्रित उपयोग की अनुमति होगी. योजना क्षेत्र को 601 वर्ग किमी से बढ़ाकर 1,016 वर्ग किमी कर दिया गया है, जिसमें शहर के आसपास के 254 गांव शामिल हैं और अनुमानित आबादी 45 लाख. हरित आवरण 16 फीसद से बढ़ाकर 27 फीसद करने का दावा किया गया है.
पर्यावरणविद् सुभाष पांडे इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखते, “1990 के दशक की शुरुआत में हरित आवरण 66 फीसद था. 2021 के मेरे नवीनतम अध्ययन के अनुसार, शहरी क्षेत्र में यह घटकर सिर्फ चार फीसद रह गया है. विनाश की रफ्तार को देखते हुए यह नया दावा एकदम अवास्तविक लगता है.”