कोटे में लिपटा सवाल

दो अलग-अलग तबकों का चेहरा बनीं दो दलित पार्टियां आपस में भिड़ीं, तो इस बहस ने पुरानी कशमकश का पिटारा खोल दिया

Bihar
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान (बाएं); और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन

बिहार के मंत्री संतोष सुमन 13 सितंबर को तीखे शब्दों के साथ सोशल मीडिया पर नमूदार हुए. उन्होंने लिखा, “कौन यह झूठ फैला रहा है कि अनुसूचित जातियों का वर्गीकरण करने से आरक्षण खत्म हो जाएगा? जवाब पहले उन्हें देना चाहिए जो दलितों का मसीहा होने का दावा करते हैं.”

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे सुमन अंधेरे में तीर नहीं चला रहे थे. वे केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जवाब दे रहे थे, जिनका इस मामले में ऐसा ही जोरदार रुख है: आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक भेदभाव के जवाब में की गई थी, इसलिए न तो इसमें क्रीमी लेयर हो सकती है और न ही ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’.

इस भिड़ंत में ज्यादा व्यापक बहस की गूंज है. यह सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो सहयोगी दलों के बीच है. चिराग लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के प्रमुख हैं और सुमन के पिता, जो केंद्रीय मंत्री भी हैं, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के अगुआ हैं.

दोनों का प्राथमिक जनाधार दलितों के दो अलग-अलग धड़ों में है. लोजपा (राम विलास) का आधार अपेक्षाकृत प्रभावशाली पासवानों  (दुसाधों) में हैं, तो हम (एस) का महादलितों में, जिनमें मांझी का मुसहर समुदाय सामाजिक अधिकारों से वंचित होने का प्रामाणिक उदाहरण है.

अगस्त में चिराग ने यह कहकर ऊंचा दांव लगा दिया कि अगर मांझी और उनके बेटे अनुसूचित जातियों में क्रीमी लेयर लाना चाहते हैं तो पहले अपने पद छोड़ दें. सुमन ने चिराग के रुख की यह कहकर आलोचना की कि सब-कोटा उस अवधारणा से “कोसों दूर” है, क्योंकि यह जातियों का उपवर्गीकरण करता है, जबकि इसके विपरीत क्रीमी लेयर ज्यादा साधन-संपन्न लोगों को इससे बाहर करती है.

‘आरक्षण को खतरा नहीं’

इस विचारधारा के मुताबिक, क्रीमी लेयर आरक्षण खत्म करने का जरिया नहीं, बल्कि तय करती है कि सबसे वंचित लोगों को इसके भीतर उचित हिस्सा मिले. सुमन का कहना है कि जो लोग इसे आरक्षण के लिए खतरा बता रहे, वे लोगों को डराने की कोशिश कर रहे हैं.

राज्यों को अनुसूचित जातियों के उपवर्गीकरण की इजाजत देने वाले सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने सवाल किया कि बिहार इस दिशा में पहले कदम उठा चुके राज्यों हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु का अनुसरण क्यों नहीं कर सकता.

अगर संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व को सामाजिक न्याय का बड़ा सिद्धांत माना जाता है, तो सुमन का सवाल यह है: जातियों के तुलनात्मक पिछड़ेपन के आधार पर प्रतिनिधित्व को आरक्षण पर हमला क्यों माना जाना चाहिए?

महादलितों की पहेली

यह बात इस कशमकश के मर्म को छूती है. अदालत का आदेश कहता है कि वंचना का स्तर प्रतिनिधित्व में असंतुलन दूर करने का मार्कर है. यह प्राकृतिक न्याय भी है, खासकर जब बेहतर स्थिति में रही जातियों ने कोटे का बेहतर लाभ उठाया और अपनी आबादी से ज्यादा हिस्सा हड़प लिया. 

यह दलित आरक्षण में उसी आर्थिक आधार को लाने की पहल है जो अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के मामले में है. यह मकसद जातिगत कलंक का बहुत ज्यादा शिकार रही मुसहर सरीखी जातियों को आरक्षित हिस्सेदारी मिलने के साथ पूरा हो जाएगा. मगर इसमें वंचित होने का अर्थ संख्यात्मक हिस्सेदारी लगाया जाएगा और यह दूसरे दलितों की कीमत पर मिलेगा.

दलित 22 जातियों में बंटे हैं और बिहार की आबादी के 19.65 फीसद हैं.  इनमें दुसाध 5.31 फीसद, रविदासी 5.25 फीसद और मुसहर 3.08 फीसद हैं. बिहार के 2.56 करोड़ दलितों में से सिर्फ 1.13 फीसद यानी करीब 2.91 लाख लोग सरकारी नौकरियों में हैं, जिनमें से 99,830 दुसाध और 82,290 रविदासी हैं. राज्य के 40 लाख से ज्यादा मुसहरों में से 10,615—यानी महज 0.26 फीसद—इस सूची में है.

हम (एस) का कहना है कि वंचितों पर ध्यान नहीं देना गैरबराबरी को और बढ़ाता है. चिराग अपने दिवंगत पिता राम विलास की उस चेतावनी को दोहराते हैं जो उन्होंने पूर्व सीएम नीतीश कुमार के महादलित विचार के जवाब में दी थी: आप आरक्षण को बांटकर भलाई की खातिर एकजुट हुई दलित एकता को ही टुकड़े-टुकड़े कर देंगे.

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