शुभेंदु का बस एक ही मंत्र

भाजपा की हुकूमत में पहली बार की इस दुर्गा पूजा पर मुख्यमंत्री अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं, चाहे वह मोदी का भव्य शो हो या कुछ राक्षसों का वध

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कोलकाता में 2025 में दुर्गा पूजा का एक पंडाल

कह सकते हैं, ‘पूजो’ बस आ ही गई है. यह वह समय है जब बंगाल की हवा में सुहानापन उतर आता है और त्योहार के माहौल में उमंग और उल्लास घुल जाता है. इस साल मौसम की रिपोर्ट में एक और बदलाव है: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हुकूमत में यह पहली दुर्गा पूजा है.

वामपंथ के दिनों से ही इस इलाके में संस्कृति की बागडोर राजनीति के हाथों में रही है. तृणमूल कांग्रेस की निगहबानी में यह चलन और गहरा गया. इसीलिए सारी निगाहें इस पर हैं कि शुभेंदु अधिकारी की सरकार राज्य के सबसे भव्य उत्सव को कैसे लेती है. वे चाहते हैं कि अब पूजा बदलाव के प्रमुख वाहक के रूप में दिखाई दे. प्रशासनिक और विचारधारात्मक फ्रेम से आगे निकलकर यह भव्य तमाशे का रूप ले रहा है.

सबसे बड़ा पंडाल शायद ईडन गार्डन्स का निकले, जहां 10 अक्तूबर को महालय के जोरदार कार्यक्रम की तैयारी की जा रही है. आतिशबाजी होगी, ड्रोन होंगे, और जीत का जश्न मनाने के लिए शंख फूंके जाएंगे. सत्ता की धुरी बदलने के संकेतस्वरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं उपस्थित होंगे.

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह कार्यक्रम दुनिया भर में दिखाया जाएगा. लंदन के टाइम्स स्क्वायर और दुबई के बुर्ज खलीफा पर लाइव विजुअल चलाए जाएंगे. टेंडर गुजरात की एक इवेंट मैनेजमेंट फर्म की झोली में गया है. करीब 150 करोड़ रुपए का खर्च आएगा. बंगाल की खराब माली हालत को देखते हुए शुरुआत में इस पर एेतराज उठाए गए, लेकिन फिर सनातन के प्रदर्शन के लिए इसे वाजिब खर्च मान लिया गया.

सनातन का जोरदार प्रदर्शन शुभेंदु की सरकार के लिए जोर देने का नया सबब बन गया है, फिर भले ही वे अनुभव के आधार पर और गलतियां करके सीखने की राह आगे बढ़ रहे हैं. एक प्रयोगधर्मी शुरुआत दुर्गा पूजा के सेक्युलर पर्याय बन चुके ‘शरदोत्सव’ के उलट की गई. यह शरद ॠतु का पारंपरिक उत्सव माना जाता है.

पंडालों में बुकस्टॉलों की स्थापना करते हुए 10 सितंबर को उन्होंने वामपंथियों के इस बहाने की आड़ लेने की चीरफाड़ की. उन्होंने कहा, “आप इस त्योहार को महज सांस्कृतिक मानते हैं? अगर ये कम्युनिस्ट अपने स्टॉलों पर ‘दुर्गा पूजा’ न लिखें, तो उन्हें स्टॉल मत दीजिए.” कुछ ही दिनों बाद उनका स्वर नरम पड़ गया. उन्होंने कहा वे सिर्फ इतना चाहते थे कि भव्य और रंगारंग आयोजनों के बीच “शास्त्रों के अनुसार पूजा” को भुला न दिया जाए.

संघ परिवार की सांस्कृतिक राजनीति दो दूसरे मोर्चों पर भी उजागर हुई. विश्व हिंदू परिषद ने पंडालों की भड़कीली थीमों पर तीखी और सख्त नजर डाली, जो दुर्गा प्रतिमाओं तक पहुंच गई. उसने कहा कि देवी को परंपराओं के अनुरूप नहीं दिखाना बरदाश्त नहीं किया जाएगा.

मांसाहारी दुकानें

दूसरा मोर्चा ज्यादा आगे नहीं बढ़ा. विहिप ने पंडालों के नजदीक खाने की मांसाहारी चीजों की बिक्री की आलोचना की और चेतावनी दी कि वह उल्लंघनों के खिलाफ “दखल” देगी. हावड़ा के एक आयोजन में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में चर्चित युवा धर्मप्रचारक धीरेंद्र शास्त्री उर्फ ‘बागेश्वर बाबा’ ने पूजा के दौरान नॉन-वेज खाने के लिए बंगालियों की तीखी आलोचना की.

फिर उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया ने सरकार और विहिप दोनों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया. उन्होंने सफाई दी कि बंगाल की खानपान की परंपराओं में दखल देने का कोई सवाल ही नहीं. शराब की दुकानें अलबत्ता अष्टमी पर बंद रहेंगी. शांत और धीर-गंभीर बंगाली जिस बात को सुधार मानकर स्वीकार कर लेंगे, वह है पंडालों में और मूर्ति विसर्जन के दौरान डीजे पर पाबंदी.

निचले स्तर पर ‘राजनीति’ का मतलब है पूजा समितियों पर कब्जा करना, जिसमें नेता विशाल पूजाओं को संरक्षण देते हैं. “दुर्गा पूजाओं को राजनैतिक नेताओं से अलग करने” के घोषित इरादे को छोड़ भी दें, तो 2026 में लेनदेन के उस समझौते में केवल आका बदले हैं.

कई बार तो यह बदलाव जबरन करवाया गया, जैसा कि दक्षिण कोलकाता की हरिदेवपुर पूजा में हुआ, जहां आयोजकों ने कथित तौर पर भाजपा से जुड़ी तोड़फोड़ और धमकियों के बाद पुलिस से सुरक्षा की मांग की. मुख्यमंत्री को चेतला अग्रणी क्लब की पूजा में देखा जाएगा, जिसकी कमान तृणमूल कांग्रेस के बागी फरहाद हकीम के हाथ में है. इतना तो बंगाल में आम और अपेक्षित ही है.

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