पहचान बचाने की जद्दोजहद

ममता बनर्जी अपनी खुद की पहचान तृणमूल नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार के लिए लड़ाई लड़ रही हैं मगर आगामी उपचुनाव ने इस पूरे मामले को और उलझा दिया है

West Bengal
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यह ऐसा चिह्न है, जिसे मूलत: उन्होंने खुद अपने हाथों से बनाया था, जो 1998 में कांग्रेस से अलग होने के उनके जज्बे का प्रतीक भी है. घास वाली जमीन पर खिले दो फूल, जो मानो सीधे मिट्टी पर उगे हों...ममता बनर्जी का यह प्रतीक उत्साह से लबरेज हर उस लम्हे के साथ और गहरा होता चला गया, जिसकी उन्होंने अगुआई की. 

सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन में भी यह प्रतीक साथ था. इसने 2011 में वाम मोर्चे का दौर खत्म कर दिया. पार्टी का नाम भी इस बात को साबित करता है—तृणमूल यानी जमीन से जुड़ी कांग्रेस.

इस नाम और चिह्न की जोड़ी ने बंगाल की राजनीति पर ऐसा असर डाला कि अगले पंद्रह वर्षों तक सब कुछ इसी के रंग में रंग गया. उसके जादू से ज्यादा लंबा यह दौर इस गर्मी में टूट गया. और, अब बारिश उस पहचान के निशानों को मिटा रही है.

चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को एक अंतरिम आदेश में ममता गुट को पार्टी के मूल नाम और प्रतीक चिह्न दोनों के इस्तेमाल से रोक दिया. राहत बस यह रही कि बागी गुट के साथ भी यही हुआ. ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और चुनाव चिह्न के तौर पर फुटबॉल खिलाड़ी मिला, जिसका इस क्षेत्र में मजबूत इतिहास रहा है.

विरोधी धड़े को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और लिफाफा चुनाव चिह्न मिला, जिसका अपना अलग संदेश हो सकता है. ममता खेमे ने इस आदेश को “असंवैधानिक, अवैध” बताते हुए अदालत में चुनौती दी है. पार्टी ने “पूरी तरह पक्षपातपूर्ण बदले की कार्रवाई” का आरोप लगाया और नाम और चुनाव चिह्न पर दावेदारी जताई है.

मगर उन्होंने जब पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने कालीघाट स्थित घर के बाहर लगे जाने-पहचाने बोर्ड पर लगा कपड़ा हटाने का आदेश दिया, तब उनके बयान ने रणनीति में एक दिलचस्प मोड़ के संकेत दिए. जून के बाद अपनी इस पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता भारतीय राजनीति के अतीत में लौटीं. उन्होंने याद दिलाया कि कैसे इंदिरा गांधी ने भी चुनाव चिह्नों को लेकर ऐसा संघर्ष किया था.

1969 में ‘दो बैलों की जोड़ी’ खोई, फिर 1978 में ‘गाय और बछड़ा’ खोया, और अंत में ‘हाथ के पंजे’ पर जाकर टिकीं, जो आज तक कायम है. इसने इंदिरा के उस ऐतिहासिक वापसी की याद दिलाई तो ममता भी अभयमुद्रा में सुकून तलाशती दिख रही हैं. इसकी तात्कालिक वजह है: पांच विधानसभा सीटों पर 6 अक्तूबर को होने वाले उपचुनाव, जहां लड़ाई सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है.

चोट खाया खेमा
नंदीग्राम से ममता की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने 18 सितंबर को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अपना नामांकन वापस ले लिया. तब ममता ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन का ऐलान किया और बताया कि उन्होंने पिछली रात राहुल गांधी से बात की थी.

अगले दिन रेजीनगर में भी ऐसी ही अनिश्चितता दिखी. ममता के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने पहले तो यह कहते हुए नाम वापस लेने की बात कही कि चुनाव चिह्न न होने से कार्यकर्ता “दिशाहीन” महसूस कर रहे हैं. फिर उन्होंने यू-टर्न ले लिया.

बाहर माहौल सुरक्षित नहीं लग रहा था इसलिए बेलडांगा पुलिस थाने में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक के बाद रबीउल ने ऐलान किया, “दीदी ने मुझे फोन किया और लड़ाई में बने रहने के लिए हौसला दिया. इसलिए मैं चुनाव लड़ूंगा, भले मेरे साथ सिर्फ 10 कार्यकर्ता ही क्यों न आएं.”

बार-बार बदलते रुख से पार्टी में कोई उत्साह नहीं बचा. पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने फेसबुक पर एक तीखी पोस्ट लिखी, जिसे बाद में उन्होंने डिलीट कर दिया. मगर, वे अपनी बात से पीछे नहीं हटे. उनका तर्क था कि पार्टी को नई और अस्थायी पहचान के तहत चुनाव लड़ना नहीं चाहिए था और इसकी जगह हर जगह कांग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन देना चाहिए था.

कुणाल ने लिखा, “सिर्फ शुभेंदु या भाजपा को दोष देना सही नहीं होगा. उन्होंने जाल बिछाया था, हम उनके जाल में क्यों फंसे?” उन्होंने कहा कि ममता ने भी पहले कहा था कि ऐसे हालात में कांग्रेस को वोट ट्रांसफर करना ही व्यावहारिक रास्ता हो सकता है.

जाहिर तौर पर ममता ने कांग्रेस के प्रति ऐसी गर्मजोशी दिखाई है जो पहले कभी नहीं दिखी. राहुल गांधी ने भी वैसा ही रुख अपनाते हुए टीएमसी के नाम और चिह्न पर ममता के हक का समर्थन किया. मगर, अपने उस जाने-पहचाने चिह्न के बिना ममता जोखिम भरी चुनावी जंग में अकेली खड़ी हैं. क्या वे इंदिरा गांधी जैसा कमाल दोहरा पाएंगी, यह अभी एक बड़ा सवाल है.

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