मुखिया बहुत, पद खाली

छत्तीसगढ़ कांग्रेस साल 2028 के चुनाव में अगुआई के लिए नया अध्यक्ष खोजने की जद्दोजहद में

Chhattisgarh
अंबिकापुर में 16 सितंबर को (बाएं से) प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बैज, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. ‌सिंहदेव

साल 2023 के चुनाव नतीजे बुरी तरह चौंकाने वाले थे, इसलिए कांग्रेस के शीर्ष नेता अगले चुनावों की तैयारी में अभी से जुट गए हैं, भले ही वे दो साल से ज्यादा दूर हों. उनकी पहली प्राथमिकता अहम पदों और खासकर राज्य कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर अच्छे लोगों को लाने की है. 

मौजूदा अध्यक्ष पूर्व सांसद दीपक बैज तीन साल से ज्यादा वक्त से इस पद पर हैं और अब नेतृत्व में बदलाव की आहट सुनाई दे रही है. मगर अभी आम सहमति नहीं बन पाई है. इसमें देरी हुई क्योंकि राज्य प्रभारी सचिन पायलट को सुखदेव भगत से बदल दिया गया.

भूपेश बघेल 2018 के चुनावों से पहले राज्य इकाई के प्रमुख थे. उस चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के 15 साल लंबे शासन का अंत किया था. उसने राज्य की 90 में से 68 सीटें जीत ली थीं, जो 2013 के चुनाव के मुकाबले 39 ज्यादा थीं. उस वक्त नेता विपक्ष टी.एस. सिंहदेव के साथ बघेल—यानी क्षत्रिय और कुर्मी ओबीसी चेहरे—की जोड़ी खासकर कारगर रही थी.

मुख्यमंत्री बनने के छह महीने बाद बघेल ने पीसीसी प्रमुख की जिम्मेदारियों से मुक्ति चाही और आदिवासी विधायक मोहन मरकाम को अध्यक्ष बनाया गया. 2019 से 2023 के बीच उथल-पुथल भरे दौर में जब बघेल और सिंहदेव में मतभेद हुए, मरकाम ने बघेल के लिए संगठन का मोर्चा संभाले रखा.

निराशाजनक दौर
अहं शांत करने की गरज से 2023 के मध्य में पार्टी ने सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाया और मरकाम की जगह उस वक्त बस्तर के सांसद दीपक बैज को ले आई. उसके फौरन बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने प्रतिद्वंद्वी भाजपा को 2018 की 15 सीटों से 54 की जोरदार छलांग लगाकर वापसी करते, 2024 में रायपुर का उपचुनाव जीतते, और 2025 के शहरी निकाय चुनावों में भारी जीत हासिल करते देखा.

इस पृष्ठभूमि में नए प्रमुख की जरूरत महीनों से महसूस की जा रही है. सूत्रों का कहना है कि पायलट की देखरेख में युवा ओबीसी चेहरे को लाने पर सहमति बन गई थी. 42 वर्षीय विधायक उमेश पटेल और 36 वर्षीय विधायक देवेंद्र यादव ऐसे नामों के तौर पर सामने आए जो सामाजिक हकीकतों को ध्यान में रखते हुए उस पीढ़ीगत बदलाव के परिचायक हो सकते थे. छत्तीसगढ़ आदिवासी राज्य के तौर पर जाना जाता है, मगर यहां 40 फीसद से ज्यादा आबादी ओबीसी है.

राज्य इकाई का एक धड़ा आदिवासी चेहरा लाना चाहता है ताकि वोटरों के करीब 32 फीसद आदिवासियों के बीच पार्टी की पकड़ 2018 के स्तर पर लाई जा सके जब उसने उत्तर और दक्षिण में एसटी आरक्षित सभी सीटें जीत ली थीं. दूसरे धड़े को लगता है कि चुनाव लोकप्रियता के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी जाति या समूह के दबाव में.

उनका कहना है कि दिग्गज ओबीसी चेहरे चरणदास महंत को नेता विपक्ष और झारखंड के आदिवासी भगत को राज्य प्रभारी बनाकर प्रतिनिधित्व देने की जरूरत पूरी हो चुकी है.

सूत्रों का कहना है कि सिंहदेव ने भी अपना दावा पेश कर दिया है. यह साफ नहीं है कि बघेल उनके नाम पर तैयार होंगे या नहीं. उनका यह भी कहना है कि बघेल के जोर देने की वजह से ही अभी तक किसी को अध्यक्ष नहीं बनाया गया. राज्य युवा कांग्रेस के प्रमुख के पद पर भी अपना आदमी लाने के लिए बघेल जोर लगा रहे हैं.

2023 की स्तब्धकारी हार में भी पार्टी ने भाजपा के 46.27 फीसद वोटों के खिलाफ अपने 42.23 फीसद बरकरार रखे थे. इसलिए वह अपने को मुकाबले में देख रही है, मगर देरी और टालमटोल उसे भारी पड़ सकती है.

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