सियासी चिंता से सबके सुर नरम
भाजपा अपने सहयोगी दलों जद (यू) और लोजपा को नाराज नहीं करना चाहती, ऐसे में बिहार में समान नागरिक संहिता लागू करने की उसकी राह मुश्किल. मुसलमानों में अलग-थलग पड़ने की भावना बिगाड़ सकती है चुनावी संतुलन

बिहार के सीएम सम्राट चौधरी और (बाएं ऊपर से नीचे) नीतीश कुमार, चिराग पासवान, प्रशांत किशोर और तेजस्वी यादव
पांच दिनों के अंतराल और करीब एक हजार मील से अधिक दूरी पर दिए गए दो बयान बिहार में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मसले को उजागर करते हैं. 13 सितंबर को बिहार से दूर मुंबई में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि साल 2029 तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के शासन वाले सभी 21 राज्यों में यूसीसी लागू हो जाएगा.
अब तक इसको लागू करने में कोई परेशानी नहीं आई है और एक राज्य में यह लागू हो चुका है तथा तीन राज्यों में इसकी प्रक्रिया जारी है. मगर, जरूरी नहीं कि बिहार सरीखे राज्यों में इसका क्रियान्वयन उतना ही सहज हो.
18 सितंबर को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस मामले की जटिलता का संकेत दे दिया. सवाल पूछे जाने पर उन्होंने शाह की बात का खंडन नहीं किया, मगर कहा, “हम सभी से बात करेंगे और उसके बाद फैसला लेंगे.”
पटना में इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में सम्राट इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि उनके गठबंधन सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) यूसीसी को लेकर सवाल उठा चुके हैं. सम्राट का यह सतर्क रुख सियासी हिसाब-किताब से जुड़ा हुआ है.
243 सदस्यों वाली विधानसभा में एनडीए के पास 202 सीटें हैं. मगर बांकीपुर सीट गंवाने के बाद भाजपा के पास केवल 88 सीटें हैं, जबकि जद (यू) के पास 85 और चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) के पास 19 सीटें हैं. बाकी सीटें हम और छोटे सहयोगी दलों के पास हैं. भाजपा अपने दम पर 122 के बहुमत के आंकड़े से काफी दूर है.
शुरुआती संकेत यही है कि वे फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहते हैं और इसकी वजह राज्य की जनसांख्यिकी है. बिहार की 2023 के जाति-आधारित सर्वे के मुताबिक, राज्य में मुस्लिम आबादी 17.7 फीसद है.
सीमांचल और उत्तर बिहार के कुछ हिस्सों में यह समुदाय अच्छा-खासा चुनावी असर रखता है. भाजपा को अपने सियासी आधार के लिए इनके समर्थन की जरूरत नहीं होती, मगर उसके सहयोगी दलों का सियासी समीकरण ऐसा नहीं है.
खासकर जद (यू) ने भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की कोशिश की है. उसके समीकरण में मुस्लिम समुदाय को ‘नजरअंदाज’ करने की गुंजाइश नहीं रही है. 14 सितंबर को जद (यू) के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने कहा कि जब ये बिल संसद में आया था तब हमारे नेता (नीतीश कुमार) ने बिल का समर्थन किया था लेकिन अपने राज्य में इसे लागू नहीं करेंगे. हम उस बात पर कायम हैं.
अगले दिन उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी ने जोर देते हुए कहा कि यूसीसी के प्रावधानों का अध्ययन किया जाएगा. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा इस मुद्दे पर चर्चा के लिए शाह से मुलाकात करेंगे. कुल मिलाकर, इन बयानों में इस मुद्दे पर सावधानी साफ नजर आती है.
वहीं, लोजपा (रामविलास) के नेता चिराग ने कहा, “भारत का सामाजिक ताना-बाना विविध है. हर समुदाय की अपनी नागरिक परंपराएं और रीति-रिवाज हैं. संविधान ने भी इसे स्वीकार किया है—पांचवीं-छठी अनुसूचियां, अनुच्छेद 371ए और 371जी तथा अब तक लागू हर संहिता में अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट इसके प्रमाण हैं.”
विविधता का तर्क
चिराग की बात अहम है. जिन अनुच्छेदों का उन्होंने जिक्र किया, उनकी भूमिका कुछ हद तक उस समय के अनुच्छेद 370 सरीखी है, जब वह लागू था. ये प्रावधान नगालैंड और मिजोरम के लिए विधायी सुरक्षा-व्यवस्था का काम करते हैं.
इनके तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि अगर कोई राष्ट्रीय कानून स्थानीय आदिवासी अधिकारों के अनुरूप नहीं माना जाता तो वह वहां अपने आप लागू न हो. चिराग ने कहा, “मेरी पार्टी समानता और विविधता के लिए प्रतिबद्ध है.” उन्होंने कहा कि किसी रुख पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों के “हितों को ध्यान में रखते हुए” विचार-विमर्श किया जाएगा.
दरअसल, दोनों दलों के पास यूसीसी के चुनावी असर को लेकर सतर्क रहने की वजहें हैं. मुस्लिम समुदाय में अलग-थलग पड़ने की भावना को भुनाने के लिए सियासी विकल्प मौजूद हैं. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) उनका एक पुराना विकल्प है.
प्रशांत किशोर (पीके) की जन सुराज भी नए विकल्प के रूप में उभरी है. मुसलमानों के राजद से दूर जाने की वजह से जद (यू) और लोजपा को फायदा होता रहा है. लेकिन अगर मुसलमान राजद या पीके के पीछे एकजुट होते हैं तो जद (यू) और लोजपा को नुक्सान उठाना पड़ सकता है.
मुसलमानों के लिए यूसीसी की बहस सिर्फ विरासत जैसे पहलुओं तक सीमित नहीं. यह धर्म के इर्द-गिर्द अपनी स्वायत्त जगह बनाए रखने के अधिकार में अंतिम दखल के रूप में देखी जाती है. बिहार में उनकी संख्या काफी मायने रखती है. शाह की समयसीमा ने दो सियासी लक्ष्यों को तय कर दिया है. पहला अगला लोकसभा चुनाव है, तो दूसरा उसके एक साल बाद होने वाला विधानसभा चुनाव.