यह है सब धान बाईस पसेरी

झारखंड में भर्ती विवाद ने एक नया संकट उत्पन्न कर दिया है, जिसमें धोखाधड़ी करने वालों की सजा भुगत रहे ईमानदार अभ्यर्थी

Jharkhand
भर्ती रद्द होने के बाद रांची में प्रदर्शन करते सरकारी कर्मचारी, 20 अगस्त  

जिंदगी मानो कभी खत्म न होने वाली परीक्षा बन गई है. झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल (जेएसएससी-सीजीएल) परीक्षा के माध्यम से चुने गए लगभग 1,932 कर्मचारी और 64 नए बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) 1 सितंबर को इस दुविधा के साथ काम पर लौटे कि जिस कुर्सी पर आज बैठे हैं, महीने के अंत तक वह उनकी रहेगी भी या नहीं.

18 अगस्त को राज्य सरकार ने 2014 से लेकर अब तक की भर्ती परीक्षाओं को पूरी तरह रद्द करने या उनकी समीक्षा का आदेश दिया, जिससे इन सभी नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा. हालांकि, 20-21 अगस्त को हाइकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाकर उन्हें थोड़ी राहत जरूर दे दी है पर यह एक अस्थाई राहत थी जो उनके मानसिक तनाव खत्म करने के लिए नाकाफी है. इन परीक्षाओं पर लटकी तलवार अभी तक पूरी तरह से हटी नहीं है.

अगस्त में झारखंड के युवाओं के बड़े आंदोलन में वैसे तो कई मांगें शामिल थीं, लेकिन एक मांग सबसे अहम थीः पेपर लीक के विवादित इतिहास के मद्देनजर उन सभी परीक्षाओं को रद्द किया जाए जिन पर सवाल उठे थे.

हेमंत सोरेन सरकार ने इस दबाव के आगे घुटने टेके तो 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द हो गईं, छह नई परीक्षाओं के शेड्यूल पर रोक लगा दी गई और 17 पुरानी परीक्षाएं जांच के दायरे में आ गईं. रद्द परीक्षाओं में 11वीं से 13वीं जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षाएं, खाद्य सुरक्षा अधिकारी भर्ती, सीडीपीओ परीक्षा और जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा शामिल थीं.

गेहूं के साथ घुन भी पिस रहे
यह कदम लोगों का भरोसा बहाल करने की हताश कोशिश थी, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या थी. इन परीक्षाओं से लोग पहले ही नौकरियां हासिल कर चुके थे. युवाओं ने अपने जीवन के बड़े फैसले ले लिए थे, नौकरियां शुरू कर दी थीं और खुद को सेटल कर चुके थे.

वर्षों की हाड़तोड़ मेहनत और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाद वे इस मुकाम तक पहुंचे थे. जाहिर है, उन सभी को एक ही तराजू में तोलकर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह पता लगाने का कोई जरिया नहीं कि किसने गलत तरीके से फायदा उठाया और किसने अपनी मेहनत से सफलता पाई.

कई युवाओं ने तो उस माहौल में ईमानदारी से सफलता हासिल की थी जहां दूसरे नकल कर रहे थे! लेकिन अब गाज सब पर गिरी है. इनमें से कुछ लोगों ने तो कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद ही नौकरी की शुरुआत की थी.

जेएसएससी-सीजीएल का यह मामला गड़बड़ी स्पष्ट तौर पर रेखांकित करता है. पेपर लीक विवाद के कारण पहली परीक्षा रद्द होने के बाद 2023 वाली परीक्षा सितंबर 2024 में दोबारा कराई गई थी. दूसरी बार भी धांधली के आरोप लगे.

लेकिन दिसंबर 2025 में जब राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि सीआइडी जांच में पेपर लीक का कोई सबूत नहीं मिला, तब कोर्ट ने परिणामों पर लगी रोक हटा दी. 30 दिसंबर 2025 को नियुक्ति पत्र बांट दिए गए. लेकिन यह खुशी आठ महीने भी नहीं टिक सकी.

तो क्या अब भी उनके पास नौकरी है? कानूनी तौर पर तो उनका पक्ष मजबूत है. हाइकोर्ट का मानना है कि इतने बड़े समूह में ईमानदारी से चुने गए लोगों को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता और दोषी व निर्दोष को अलग-अलग किए बिना सबको हटाना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ होगा.

हालांकि, यह राहत भी अस्थाई है; कोर्ट ने परीक्षाओं को पूरी तरह क्लीन चिट नहीं दी है और जांच अभी जारी है. आयोग के अध्यक्ष की हाइ-प्रोफाइल गिरफ्तारी के बाद झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) का पुनर्गठन होना अभी बाकी है, जिससे मुख्य सिविल सेवा परीक्षा समेत नौ लंबित परीक्षाओं का भविष्य अधर में है.

दूसरी तरफ, सचिवालय में भर्तियों का संकट इतना बढ़ गया है कि विभाग अब संविदा पर भर्तियां करने को मजबूर हो रहे हैं. पूरा मामला किसी प्रशासनिक ट्रेनिंग अकादमी के लिए मर्फी लॉ का एक सटीक उदाहरण बन सकता है-भले ही आप वहां तक अपनी ईमानदारी के दम पर पहुंचे हों.

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