राम राम करते हुआ बेड़ा पार
निकाय चुनाव में हासिल सफलता ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को खासी राहत दी है, जिसे विरोधियों और पार्टी के भीतर आलोचना करने वालों के लिए माना जा रहा एक बड़ा झटका

जयपुर में शहरी निकाय चुनाव के लिए लाइन में खड़े वोटर, 11 सितंबर
जब 14 सितंबर को नतीजे सामने आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीतने वाले उम्मीदवारों और पूरे भाजपा परिवार को बधाई दी. आखिरकार, राजस्थान के शहरों और कस्बों का सियासी मूड मोटे तौर पर पार्टी के पक्ष में जो नजर आ रहा था.
यह दिसंबर 2023 में सत्ता में आने के बाद से पार्टी की पहली बार परीक्षा थी और वह इसमें टिकी रही. फिर भी, माहौल में थोड़ी खींचतान और असहजता महसूस की गई. मोदी ने “झूठ की गूंज” को हराने की बात कही. आखिरकार, यह अनमनापन क्यों था?
दरअसल, आंकड़े उतने शानदार नहीं थे जितनी उम्मीद की जा रही थी. हालांकि, बहुत से लोगों की आशंकाओं से तो काफी बेहतर ही रहे. यह एक ऐसी नाजुक स्थिति है जहां विनम्रता (चीजें बेहतर हो सकती थीं) पर राहत (इससे बुरा भी हो सकता था) भारी पड़ती है.
यह पूरी तरह शहरी निकायों का चुनाव था, जिसमें 1.44 करोड़ मतदाता शामिल हुए. ये राज्य के कुल 5.15 करोड़ मतदाताओं का महज एक-चौथाई हिस्सा है और पारंपरिक रूप से इसे भाजपा का गढ़ माना जाता है. इसे आंकड़ों के नजरिए से देखिए, भाजपा ने 4,179 वार्डों पर जीत हासिल की.
प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को 3,613 वार्डों में जीत हासिल हुई और 2,449 वार्ड में निर्दलीय और अन्य जीते. कुल मिलाकर 309 नागरिक निकायों में भाजपा ने 85 पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 45 में सफलता मिली. बाकी जगह त्रिशंकु की स्थिति है.
सिर्फ इन आंकड़ों से पता नहीं चलता कि मुकाबला कितना कड़ा था. कांग्रेस को 34.24 फीसद वोट मिले, और वह भाजपा के 35.18 फीसद वोट शेयर की तुलना में बस थोड़ा ही पीछे रही.
सत्ताधारी पार्टी 10 नगर निगमों में से सिर्फ चार में स्पष्ट बहुमत हासिल कर पाई; चार जगह त्रिशंकु स्थिति बनी, जहां निर्दलीय उम्मीदवार किंगमेकर की भूमिका में आ गए हैं. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृहनगर भरतपुर में बाजी पूरी तरह निर्दलीयों के हाथ में रही, जिसने भाजपा और कांग्रेस दोनों को असहज कर दिया है.
ऐसी आशंका थी कि लोग शर्मा और उनकी कम-अनुभवी टीम को नकार सकते हैं. ऐसी अटकलें भी थीं कि पार्टी के भीतर ही भितरघात करके दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व को बदलाव के लिए मजबूर किया जाएगा. लेकिन फिलहाल तो ऐसा होने की गुंजाइश नहीं दिखती.
मामूली बढ़त
2019-20 के चुनाव के दौरान तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस ने 196 में 123 निकायों पर कब्जा जमाया था. मौजूदा नतीजे उस दबदबे के जैसे नहीं हैं लेकिन 2014-15 से तुलना करें तो चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है.
2013 में वसुंधरा राजे की विधानसभा चुनाव में जीत और आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार भाजपा ने 46.49 फीसद वोट हासिल किए थे, जबकि कांग्रेस 30.73 फीसद पर सिमट गई थी. भाजपा आज उस दमदार स्थिति के आसपास भी नहीं फटकती है.
अगर विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए तो तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है. भाजपा का मौजूदा वोट समर्थन करीब 50 में केवल 20 सीटों में ही तब्दील हो पाएगा. जबकि 2023 के चुनाव में पार्टी ने इनमें से 35 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की थी. भाजपा के कई गढ़ों में भी कांटे की टक्कर देखने को मिली.
जयपुर जिले और नगर निगम में भाजपा ने वार्ड ज्यादा जीते लेकिन उसे कांग्रेस से कम वोट मिले. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में यहां कांग्रेस काफी पीछे रही थी. लेकिन केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के गढ़ बीकानेर में कांग्रेस ने एकतरफा जीत दर्ज की.
पूरा घटनाक्रम किसी विधानसभा चुनाव से कम गहमागहमी वाला नहीं था. दोनों दलों को पहले से ही अंदाजा था कि तोड़फोड़ से अंतिम फैसला होगा. लगभग 21,000 उम्मीदवारों को रिजॉर्ट्स और होटलों में ठहराया गया.
नतीजों ने कई लोगों के प्रवास को और लंबा कर दिया. खुलेआम खरीद-फरोख्त पर पैसा पानी की तरह बहाया जाना भी शुरू हो गया है. यह स्थिति तब है, जब राज्य के शहरी इलाकों में गड्ढों भरी सड़कें, कचरे के ढेर, उफनते नाले, जलजमाव और भीषण ट्रैफिक जाम आम बात है. इसके बावजूद मुख्यमंत्री शर्मा खुश हैं. उन्होंने आगे बढ़कर नेतृत्व संभाला और बेदाग बाहर निकले.
बहरहाल, अगली परीक्षा जल्द सामने है. दिसंबर में उनके तीन साल के कार्यकाल का पड़ाव पूरा होने से पहले पंचायत चुनाव होने वाले हैं.