सामाजिक सुधार या ध्रुवीकरण?
विधानसभा चुनाव से पहले बिना मान्यता वाले मदरसों को सील करने और समान नागरिक संहिता के तहत नए निकाहनामा मॉडल के जरिए ध्रुवीकरण की कवायद

उत्तराखंड के एक मदरसे में पहुंचा सरकारी अमला
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मदरसों पर कार्रवाई और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के तहत नए निकाहनामे की कवायद ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है. सरकार इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार, कानून के अनुपालन और महिला अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है.
विपक्ष और मुस्लिम संगठनों की नजर में यह चुनाव से पहले सामाजिक ध्रुवीकरण की रणनीति है. यानी मुद्दा सिर्फ मदरसों या निकाहनामे का नहीं, बल्कि उस सियासी संदेश का भी है जो इन फैसलों के जरिए समाज तक पहुंचाया जा रहा.
राज्य सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के मुताबिक, निर्धारित मान्यता और शैक्षिक मानकों का पालन न करने वाले मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है. देहरादून, उधमसिंह नगर और नैनीताल के हल्द्वानी क्षेत्र में अब तक 17 मदरसों को सील किया गया है. तीन के संचालकों ने उन्हें बंद करने की लिखित सूचना दी है.
देहरादून की आजाद कॉलोनी में मदरसा जामिया-तुस-सलाम अल-इस्लामिया को सील किया गया, तो मदरसा दार-ए-अरकम और मदरसा दारुल उलूम रहीमिया के प्रबंधकों ने संचालन बंद करने संबंधी अंडरटेकिंग दी.
हल्द्वानी और उधमसिंह नगर में भी ऐसी ही कार्रवाई हुई. बाजपुर में चार मदरसों को सील किया गया. प्रशासन का कहना है कि निरीक्षण के दौरान संचालक जरूरी दस्तावेज और मान्यता संबंधी कागजात पेश नहीं कर सके.
सरकार की दलील है कि यह कार्रवाई किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने 1 जुलाई, 2026 से उत्तराखंड मदरसा बोर्ड समाप्त कर उसकी जगह उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया है.
सरकार का उद्देश्य मदरसों को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से जोड़ना, एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू करना और विज्ञान, गणित तथा कंप्यूटर जैसी आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देना बताया गया है.
मगर यहीं से विवाद की दूसरी परत सामने आती है. कुछ मदरसा संचालकों का दावा है कि उन्होंने मान्यता या पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और इसके लिए शुल्क भी जमा किया था.
बाजपुर के मदरसा जामिया हनफिया रज़ाउल उलूम के संचालक इरशाद अली के अनुसार, उन्होंने अधिकारियों को आवेदन और शुल्क जमा करने की रसीद भी दिखाई, फिर भी संस्थान सील कर दिया गया. उनका दावा है कि एक बैठक में उन्हें रजिस्ट्रेशन के लिए 30 सितंबर तक वक्त दिए जाने की सूचना मिली थी.
कुछ मदरसा संचालकों ने नई मदरसा शिक्षा व्यवस्था और मान्यता संबंधी प्रावधानों को नैनीताल हाइकोर्ट में चुनौती दी है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नई व्यवस्था में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण और शिक्षा बोर्ड से मान्यता की अनिवार्यता के कारण कई संस्थानों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं. प्रारंभिक सुनवाई में अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है.
सरकार ने यूसीसी को लेकर भी एक नया संदेश देने की कोशिश की है. उत्तराखंड वक्फ बोर्ड और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग एक नए आधिकारिक निकाहनामा मॉडल पर काम कर रहे हैं. वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स के अनुसार, प्रस्तावित मॉडल में दूसरी, तीसरी और चौथी शादी के प्रावधान वाले कॉलम हटा दिए गए हैं. यूसीसी के तहत एक समय में एक ही विवाह को मान्यता देने की व्यवस्था लागू है.
प्रस्तावित निकाहनामे में पंजीकृत मौलवी या काजी के जरिए निकाह, पहचान संबंधी दस्तावेज और शपथपत्र जैसी औपचारिकताओं को भी महत्व दिया गया है. सरकार का तर्क है कि इससे विवाह के पंजीकरण में पारदर्शिता आएगी और पहचान छिपाकर या गलत जानकारी के आधार पर होने वाली शादियों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.
दूसरी ओर, मुस्लिम धर्मगुरुओं और कुछ संगठनों का आरोप है कि निकाहनामे के जरिए धार्मिक मामलों में दखल बढ़ाया जा रहा है. उनका तर्क है कि विवाह और पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानून की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि चुनावी माहौल में इन मुद्दों को प्रमुखता देकर सरकार ध्रुवीकरण को हवा दे रही है. उनका कहना है कि यदि कार्रवाई नियमों के उल्लंघन पर आधारित है तो सभी संस्थानों पर समान मानक और पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया लागू होनी चाहिए. अतिक्रमण हटाने के अभियान को भी इससे जोड़ा जा रहा है.
वहीं, सरकार के अनुसार, सरकारी और वन भूमि से अवैध कब्जे हटाने की कार्रवाई बिना भेदभाव की जा रही है. सरकार के दावों के मुताबिक, अब तक बड़ी संख्या में मजारों, मस्जिदों और मदरसों समेत धार्मिक ढांचों को अतिक्रमण की श्रेणी में कार्रवाई का सामना करना पड़ा है और हजारों एकड़ भूमि को कब्जे से मुक्त कराया गया है.
असल सवाल यही है कि इन कदमों को जनता कैसे देखती है. इन मुद्दों को सरकार ने एक साथ बहस में ला दिया है. अब देखना है कि यह एजेंडा सामाजिक सुधार की जमीन मजबूत करता है या चुनावी ध्रुवीकरण की.