हरियाली को लेकर राज्यों के कितने किंतु-परंतु
पश्चिमी घाट को बचाने के लिए माधव गाडगिल योजना का सातवां संस्करण हालांकि बहुत छोटा कर दिया गया है, फिर भी राज्य इस पर चला रहे कैंची

केरल के मुन्नार में एक चाय बागान
यह सौदा सीधा-सादा है. भारत के पूरे पश्चिमी तट पर पन्ने के रंग-सी हरी-भरी और साड़ी के पल्लू की तरह नीचे लहराती जाती जंगल की लंबी पट्टी है. कभी यह 1,60,000 किलोमीटर में फैली थी और कुदरत ने इस पर ऐसी कढ़ाई की थी जिसकी नकल नहीं की जा सकती.
अब यह सिकुड़कर आधी रह गई है. तो क्या आप बची हुई आधी पट्टी रखना चाहेंगे? या चाहेंगे कि यह पत्थर की खदानों, पवन चक्कियों, बागानों, आलीशान इमारतों और संपत्तियों, और बाइपासों से पट जाए ताकि विशाल एसयूवी के पहुंचने के लिए और ज्यादा बायपास बनाने पड़ें? तेरह साल और छह नाकाम हो चुके प्रारूपों के बाद भी भारत को अभी इस बारे में फैसला करना है.
सातवें मसौदे की अधिसूचना 25 सितंबर को खत्म हो रही है. छह राज्य सरकारों को अपनी राय बतानी है और कम से कम दो की मंशा तो इसकी धज्जियां उड़ा देने की दिख रही है. बाकी इससे बचकर निकल जाने के दांवपेंच वाले रास्ते खोज रहे हैं.
पर्यावरणविद हताशा में लोगों से गुहार लगाते घूम रहे हैं कि वे आगे आएं और भारत की जैवविविधता को बचाने में मदद करें. एक और पक्ष इसमें शामिल है जिसे अक्सर गिना तक नहीं जाता, और वह है इनसानी आबादी जो करीब 52 लाख आंकी जाती है.
वे हिमालय से भी पुरानी और गुजरात से लेकर केरलम तक फैली 1,600 किमी की पर्वतमाला के आम बाशिंदे हैं. पश्चिमी घाट को दुनिया में जैवविविधता के आठ 'सबसे ज्वलंत स्थलों' में से एक कहा जाता है. वह आबादी इसे घर कहती है.
हरा छत्र
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 2014 से पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) अधिसूचित कर बचाने की कोशिश की. इससे यह क्षेत्र पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत आ जाता. पारिस्थितिकी तंत्र को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक लग जाती या सख्त नियम-कायदे लागू होते.
नई खदान या बालू-पत्थर की खुदाई, तापबिजली संयंत्र बनाने, रेड कैटेगरी वाले प्रदूषक उद्योग लगाने या 20,000 वर्ग मीटर से ज्यादा निर्मित क्षेत्र के निर्माण की इजाजत नहीं होती. घाट केवल वहीं सुरक्षित है जहां जमीन का मालिकाना राज्य सरकार के पास है, यानी अभयारण्य, टाइगर रिजर्व और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज जंगल.
बालू-पत्थरों की खुदाई, पहाड़ियों की कटाई, होमस्टे...और भीषण भूस्खलन, ये सब निजी और राजस्व जमीन पर होते हैं. केवल केंद्र सरकार की ईएसए अधिसूचना ही इन बुरी तरह उजाड़ दिए गए हिस्सों तक पहुंच सकती है.
ईएसए लागू करने में मुख्य चुनौती क्या है? यह है छह राज्यों का अलग-अलग विरोध और कुछ हद तक सहमति. कर्नाटक ने ऐलान कर दिया है कि वह इस प्रारूप को कूड़े के ढेर पर फेंक देगा. उसके मलनाड इलाके के किसान मानव बस्तियों को बाहर रखने के लिए जमीनी सर्वे की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए.
घाट के सर्वाधिक संसाधन घेरने वाला केरल इडुक्की और कार्डेमन हिल्स (इलायची की पहाड़ियों) को बाहर रखकर इसकी सीमा घटाना चाहता है. गोवा को फिक्र है कि ईएसए का ठप्पा लगने से स्थानीय पर्यटन, खेती-किसानी और रीयल एस्टेट के विकास पर शिकंजा कस जाएगा.
वह चाहता है कि 21 गांवों को छूट दी जाए. बाकी तीन राज्यों ने ऊपर से तो प्रारूप स्वीकार कर लिया है पर कुछ किंतु-परंतु भी लगा दिए हैं. तमिलनाडु का नक्शा इस तरह बनाया गया लगता है कि नाजुक निजी/राजस्व जमीनों को चतुराई से बाहर रखा गया है. महाराष्ट्र 378 गांवों को बाहर रखना चाहता है जिससे ईएसए के फैलाव में तब्दीली आ जाएगी. वहीं, गुजरात इस इलाके के भीतर खुदाई की छूट मांग रहा है.
प्रारूप पर प्रारूप
आपत्तियों का निराकरण करने वाली विशेषज्ञ समिति का कार्यकाल एक साल जुलाई 2027 तक बढ़ा दिया गया है. पूर्व वन महानिदेशक संजय कुमार इसके अध्यक्ष हैं. मंत्रालय के एक सूत्र कहते हैं, “बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है. हमें उम्मीद है कि सभी छह राज्य साथ आ जाएंगे.” प्रस्ताव के मुश्किल और यंत्रणा भरे इतिहास को देखते हुए यह काफी महत्वाकांक्षी लगता है.
छह प्रारूप दो समितियों से निकले थे. पारिस्थितिकीविद माधव गाडगिल की अगुआई में बनी पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति ने 2011 में पूरी पर्वतमाला को—जो उस वक्त 1,29,037 वर्ग किमी मापी गई थी—संवेदनशील मानकर तीन भागों में बांटने की सिफारिश की और कहा कि सबसे नाजुक ईएसजेड-1 में सबसे सख्त नियंत्रण लागू हों.
उसने वैधानिक पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण और ग्राम सभा से शुरू होकर नीचे से ऊपर जाने वाले राजकाज का मॉडल बनाने का प्रस्ताव भी दिया था. सभी छह राज्य यह कहकर अड़ गए कि इससे विकास और रोजी-रोटी ठप पड़ जाएगी.
विद्रोह शांत करने के लिए केंद्र ने 2013 में यह फाइल इसरो के पूर्व अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन के मातहत उच्चस्तरीय समिति को सौंप दी, जिसने इसे हल्का कर दिया. उसने घाट को “सांस्कृतिक” और “प्राकृतिक” भूदृश्यों में बांट दिया और केवल प्राकृतिक हिस्सों के संरक्षण की सिफारिश की, जो मोटे तौर पर करीब 60,000 वर्ग किमी या 37 फीसद थे, और जिनसे बागानों, कृषि भूमि और बस्तियों को बाहर रखा गया. तब से हर प्रारूप इसी छोटे दायरे पर बनाया गया.
पहला प्रारूप 2014 में आया. छठे में 56,825.7 वर्ग किमी का दायरा तय किया गया और इलाकों की राज्यवार सीमाएं भी जोड़ दी गईं. यही वे सीमाएं हैं जिन्हें राज्य फिलहाल और छोटा करने की कोशिश में लगे हैं.
कर्नाटक को ईएसए का सबसे बड़ा हिस्सा करीब 20,668 वर्ग किमी दिया गया था, लेकिन उसने कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट को खारिज कर दिया. सरकार चाहे जिसकी हो, यह रुख जस का तस रहता है. राजनीतिक तौर पर दोफाड़ केरलम में दोनों ही पक्ष इसका विरोध करते हैं.
चेतावनी के संकेत
पहले प्रारूप से ही पारिस्थितिकीविदों का कहना है कि 56,000 वर्ग किमी बहुत कम है और हरेक पुनरीक्षण ने गाडगिल की योजना को खोखला किया है, जिसमें ग्राम सभाओं की वह भूमिका भी शामिल है जो उन्होंने फैसले स्थानीय स्तर पर लेने के लिए तय की थी.
हर प्रारूप के खत्म होने के साथ समाधान और दुश्वार—और इंतजार ज्यादा विकट—होता जा रहा है. वायनाड में 2024 के भूस्खलन और 2018-19 में केरलम की बाढ़ से बरपी तबाही, सभी का वास्ता इस नाजुक भूभाग में बेलगाम निर्माण और पत्थरों की खुदाई से रहा है—ठीक यही वे चीजें हैं जिन्हें गाडगिल समिति रोकना चाहती थी.
बेंगलूरू के भारतीय विज्ञान संस्थान में पारिस्थितिकी विज्ञान के प्रोफेसर रमन सुकुमार कहते हैं, “हमें बारीक संतुलन की जरूरत है. मूलभूत विकास और आजीविकाओं की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता. जैवविविधता के संरक्षण के लिए लोगों को प्रोत्साहन लाभ, कुछ न कुछ ग्रीन क्रेडिट मिलने चाहिए.”
दिसंबर 2024 में 18वीं भारतीय राज्य वन रिपोर्ट ने भ्रामक तस्वीर पेश की. उसने कहा कि 2013 और 2023 के बीच पश्चिमी घाट ने महज 58.22 वर्ग किमी शुद्ध वन क्षेत्र गंवाया. असलियत यह है कि केवल 10 फीसद हरियाली वाले हिस्से को वन गिन लिया जाता है. हकीकत में तमिलनाडु का नीलगिरि पर्वत 123 वर्ग किमी जंगल से हाथ धो बैठा. वह अब कभी वापस नहीं आएगा.