गायों के नाम करोड़ों गटके !

राजस्थान के गौशाला कार्यक्रम में कैग को मिलीं बड़ी गड़बड़ियांः गायें जमीन पर कहीं नहीं. उनके नाम पर करोड़ों रुपए डकारे गए

Rajasthan
असली-नकली राजस्थान के सांचौर की एक गौशाला

उन्नीस सौ पंचानब्बे की प्रसिद्ध फ्रेंच फिल्म ला हाइन का एक पात्र पेरिस की गलियों में भटकती एक गाय का सपना देखता है. फ्रांस में जो तस्वीर काल्पनिक लगती है, वह भारत में आम बात है. बल्कि अपने यहां तो लगता है कागजी गायें भी मौजूद हैं.

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की तरफ से उजागर की गईं गड़बड़ियां अगर सच हैं तो राजस्थान के सरकारी कागजों में करीब 1.31 लाख गायें ऐसी हैं जो असल में कभी थीं ही नहीं. इतना ही नहीं, मार्च 2024 को खत्म साल में ऐसी गायों के नाम पर 57.36 करोड़ रुपए का अतिरिक्त अनुदान (ग्रांट) भी लिया गया था.

यह योजना अपने आप में मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी है. राज्य का पशुपालन विभाग, विशेषकर इसका गोपालन निदेशालय उन पंजीकृत गौशालाओं को आर्थिक मदद देता है जो बेसहारा गायों को सहारा देतीं, उनकी देखभाल करती हैं.

इस योजना के लिए पैसा 2017-18 में शुरू हुए 20 फीसद गो-उपकर से आता है, जो स्टांप पेपर और शराब की बिक्री पर लगाया जाता है. यह कोई मामूली रकम नहीं.

राज्य सरकार ने 2023 से 2025 के दौरान इस उपकर से 2,661 करोड़ रुपए जुटाए, जिसमें से 2,339 करोड़ रुपए गायों के संरक्षण पर खर्च किए गए. अकेले 2023-24 में 1,227 करोड़ रुपए की वसूली नैतिक और धार्मिक कार्य पर खर्च के लिए ट्रांसफर की गई.

नियम के मुताबिक, पात्र गौशालाओं को प्रति वयस्क मवेशी 40 रुपए और बछड़े/बछिया के लिए 20 रुपए रोज दिए जाते हैं. यानी हर गौशाला में मौजूद पशुओं की संख्या ही उन्हें मिलने वाले अनुदान का आधार है. कैग के मुताबिक, दर्जनों मामलों में संख्याएं बढ़ाकर दिखाई गई हो सकती हैं.

21 अगस्त, 2026 को विधानसभा में पेश वित्तीय वर्ष 2023-24 की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, 38 गौशालाओं ने मिलकर 1.31 लाख मवेशियों की संख्या दर्ज कराई थी, जिनकी पुष्टि गौशाला के रजिस्टरों, टैग रिकॉर्ड, जमीनी निरीक्षण या सरकारी डेटाबेस से नहीं हो सकी.

लापता गायों के नाम पर
रिपोर्ट सीधे तौर पर साबित नहीं करती कि 1.31 लाख कागजी गाय सरकारी खजाने का चारा खा गईं. लेकिन ऑडिट में गौशालाओं के दैनिक रजिस्टरों और भारत पशुधन ऐप यानी राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन के तहत पशुओं के आधार कार्ड के डेटा में बड़ा अंतर पाया गया है. इसके अलावा, कई इयर-टैग अमान्य, निष्क्रिय या गैर-पंजीकृत पाए गए.

कुछ मामलों में तो उन पशुओं के नाम पर सरकारी मदद का दावा ठोंका गया जो मर चुकी थीं, कहीं और भेज दी गई थीं या निरीक्षण के दौरान गौशाला में पाई ही नहीं गईं. 2023 में बने नियमों के अनुसार, कानों के टैग, मौत, बिक्री, दान और हस्तांतरण के रजिस्टरों के साथ-साथ औचक निरीक्षण के जरिए इस सिस्टम पर नजर रखी जानी थी.

रिपोर्ट आने से तीन महीने पहले ही गोपालन निदेशालय ने 38 गौशालाओं को रिकवरी नोटिस जारी कर दिए थे. हालांकि, अभी तक कोई वसूली नहीं हुई है. ऑडिट के नतीजों की जांच पहले संबंधित विभाग और विधानसभा करेगी.

उसके बाद ही सरकार तय करेगी कि कितनी रकम वसूली जानी है. पशुपालन विभाग के प्रमुख सचिव विकास सीतारामजी भाले कहते हैं, “इस मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाएगा. हम व्यवस्था में सुधार करेंगे.”

गड़बड़ी में जो मामले सबसे बड़े माने जा रहे हैं, उनमें डीग स्थित श्री ब्रज कामद सुरभि वन रिसर्च इंस्टीट्यूट गौशाला (16.36 करोड़ रु.) और जालोर में पथमेड़ा स्थित श्री गोपाल गोवर्धन गौशाला (10.95 करोड़ रु.) का नाम शामिल है. सांगानेर की पिंजरापोल गौशाला में भी लगभग 1.81 करोड़ रु. की गड़बड़ी पाई गई है.

राजस्थान हाइकोर्ट ने अगस्त में वित्तीय अनियमितताओं, मवेशियों की उपेक्षा और पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाने वाली जनहित याचिका पर पिंजरापोल गौशाला को नोटिस जारी किए थे. इससे पूर्व 2025 के एक फैसले में अदालत ने कुछ गौशालाओं को जारी रिकवरी नोटिस बरकरार रखी थी.

राज्य में 2,800 से ज्यादा गौशालाएं हैं. संचालकों का कहना है कि वे धोखाधड़ी से पैसे नहीं ऐंठ रहे, बल्कि यह रिकॉर्ड रखने और टैगिंग से जुड़ी प्रशासनिक गलतियों का नतीजा है. राज्य की सड़कों पर भटकती बेसहारा गायों की भी कोई कमी नहीं.

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