कांग्रेस में खुल्लमखुल्ला जूतमपैजार
एक पूर्व विधायक के निलंबन के बाद चन्नी समर्थक और प्रदेश अध्यक्ष वड़िंग विरोधी एकजुट हो गए और गुटबाजी साफ दिखने लगी

अगस्त के पहले सप्ताहांत में पंजाब कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल राज्य में जिन-जिन कार्यक्रमों में गए, “चन्नी, चन्नी” के नारे उनका पीछा करते रहे. हर बूथ, कांग्रेस मजबूत अभियान का अभी-अभी आगाज ही हुआ था, मगर प्रदेश प्रभारी को यह शिकायत करने का मौका नहीं मिला कि पार्टी के भीतर कोई गुपचुप बगावत चल रही है.
असंतोष तो खुलेआम नजर आ रहा था. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों ने शोर-शराबा करते हुए बार-बार कार्यक्रमों की कार्यवाही में व्यवधान डाला. नतीजतन, संगठन को मजबूत करने के मकसद से शुरू किया गया यह अभियान गुटबाजी और शक्ति-प्रदर्शन का नजारा बनकर रह गया.
दरअसल, पहली अगस्त को पंजाब कांग्रेस ने घनौर के पूर्व विधायक मदन लाल जलालपुर को “पार्टी-विरोधी गतिविधियों” के आरोप में तीन साल के लिए निलंबित कर दिया. मगर उन्हें जिस तरह का समर्थन मिला, उसे देखते हुए लगा मानो पार्टी का बड़ा हिस्सा ही पार्टी-विरोधी हो गया हो. सबसे पहले चन्नी सामने आए.
उन्होंने जलालपुर पर की गई कार्रवाई वापस लेने की मांग की और विरोधस्वरूप बघेल और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की मौजूदगी वाले एक कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए. जल्दी ही, वड़िंग के विरोधी दूसरे नेता भी जलालपुर के समर्थन में एकजुट होने लगे.
इनमें पूर्व मंत्री भरत भूषण आशु, परगट सिंह और गुरप्रीत सिंह कांगड़ समेत कई विधायक और जिला स्तर के नेता शामिल थे. उन्होंने जलालपुर के निलंबन को वड़िंग के नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को निशाना बनाने की कोशिश के रूप में पेश किया.
उनके मातहत?
आखिर जलालपुर का कसूर क्या था? उन्होंने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने की वड़िंग की क्षमता पर सवाल उठाए थे. उन्होंने कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और बघेल की भी तीखी आलोचना करते हुए कहा था कि दोनों स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं और हकीकत को नजरअंदाज कर रहे हैं.
उधर प्रदेश अध्यक्ष वड़िंग का मानना था कि अगर अनुशासनहीनता पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उनके निर्देशों का क्या महत्व रह जाएगा. इसलिए उन्होंने कूटनीतिक नरमी बरतने की बजाए सख्त रुख अपनाने का फैसला किया.
मगर उस फैसले ने खुले टकराव की भूमिका तैयार कर दी. चन्नी खेमे का आरोप है कि वड़िंग के पीछे बिना सवाल किए खड़े होने से इनकार करने वाले नेताओं को किनारे लगाने की मुहिम के पहले शिकार जलालपुर बने हैं.
उनके निलंबन ने आलोचकों को एक साझा मुद्दा मुहैया करा दिया है. कई वरिष्ठ नेताओं ने निजी तौर पर पार्टी में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण पर सवाल उठाए थे. कुछ दूसरे नेताओं को यह चिंता सता रही थी कि 2027 में उम्मीदवारों के चयन की कमान आखिर किसके हाथ में होगी.
इस बीच, चन्नी खुद को एक स्वतंत्र और जनाधार वाले नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं. सितंबर 2021 में राहुल गांधी ने आखिरी समय में अमरिंदर सिंह की जगह चन्नी को अप्रत्याशित रूप से मुख्यमंत्री चुना था. मगर पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री के रूप में उनका छह माह का कार्यकाल करारी हार के साथ समाप्त हो गया. अब चन्नी को लगता है कि उनके पास फिर से एक मौका है.
वड़िंग के खिलाफ बढ़ती नाराजगी ने उनकी सियासी उड़ान को नई गति दे दी है क्योंकि यह अब साझा असंतोष में तब्दील होती जा रही है. विडंबना ही है कि वड़िंग की सख्त छवि हासिल करने की कोशिश ने ही चुनौती को और मजबूत कर दिया है. और बघेल की भूमिका शायद सबसे मुश्किल हो गई है, जो इस बीच एक बेबस मध्यस्थ बनकर रह गए हैं.