प्रशांत किशोर को नया जीवन

भगवा गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर के उपचुनाव में हैरतअंगेज जीत हासिल करके चुनावी रणनीतिकार पीके की जन सुराज पार्टी ने अपनी नई सियासी साख कायम की

पटना में 3 अगस्त को अपने विजय मार्च के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं का अभिवादन करते प्रशांत किशोर

बिहार की राजनीति में हाल के दिनों का सबसे बड़ा उलटफेर करने के चंद मिनट बाद ही प्रशांत किशोर ने संकेत दे दिए कि उनकी नजरें बांकीपुर से कहीं आगे टिकी हैं.

अपनी पहली चुनावी जीत का जश्न मना रहे जन सुराज पार्टी (जेएसपी) के प्रमुख ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक “विनम्र आग्रह” किया कि बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की जगह “एक ईमानदार, निष्पक्ष नेता को जिम्मेदारी सौंपें जिस पर राज्य गर्व कर सके.”

संदेश एकदम साफ था कि प्रशांत किशोर, जो पीके के नाम से लोकप्रिय हैं, खुद को चौधरी के सामने एक चुनौती के रूप में पेश कर रहे थे.

इससे भी अहम बात यह है कि वे बिहार में विपक्ष की जगह पर दावेदारी जता रहे थे, और एक तरह से खुद को न सिर्फ भाजपा, बल्कि राज्य की दूसरी मुख्य पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे थे.

3 अगस्त का नतीजा बहुत कुछ स्पष्ट करता है. एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र, जो करीब तीन दशकों से भाजपा का अभेद्य किला था और जिसे पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने खाली किया था, किशोर की जादुई जीत का गवाह बना. जेएसपी प्रमुख ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव निर्णायक रूप से जीता और भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को लगभग 19,324 मतों से हराया. राजद की रेखा कुमारी की तो जमानत ही जब्त हो गई.

यह नतीजा भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में भारी जीत के ठीक नौ महीने बाद आया. यह सीएम चौधरी के लिए शुरुआती झटका है, जो अप्रैल में नीतीश कुमार की जगह लेने के बाद अपनी पहली परीक्षा का सामना कर रहे थे.

जेएसपी के लिए यह ऐसी सफलता थी जिसके लिए वह विधानसभा चुनाव में शर्मनाक हार के बाद से बेताब थी. सबसे अहम बातः इसने बता दिया कि 49 वर्षीय पीके भारत के सबसे चर्चित चुनाव रणनीतिकार क्यों हैं. अब वे ऐसे राजनेता भी हैं जो पूरे दावे के साथ कह सकता है कि उसने रणनीति को वोटों में बदला है.

एक गढ़ का ढहना

बिहार और भाजपा के लिए इसके निहितार्थ नजरअंदाज करना असंभव है. भगवा पार्टी के बिहार में बड़ी ताकत बनकर उभरने से पहले से ही बांकीपुर उसका ‘गढ़’ रहा है. पार्टी 1995 से यहां लगातार जीत रही थी; लगातार नौ बार की चुनावी फतह से यह शहरी पटना निर्वाचन क्षेत्र पार्टी की सबसे भरोसेमंद सीटों में से एक बन गया था.

उपचुनाव की जरूरत इस सीट से पांच बार के विधायक नवीन के राज्यसभा जाने के कारण पड़ी. इसलिए यह एक ऐसा मुकाबला था जिसमें सत्ताधारी पार्टी आसान जीत की उम्मीद कर रही थी.

जब कोई पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट बरकरार रखने में विफल रहती है तो सांगठनिक अनुशासन, प्रत्याशी चयन और सियासी प्रबंधन पर सवाल उठना लाजिमी है.

इन सबके अलावा, यह हार पीके के लंबे वक्त से दिए जा रहे इस तर्क को भी पुख्ता करती है कि बिहार के मतदाताओं का एक अहम हिस्सा वैचारिक दृढ़ता के बजाए राजद की सत्ता में वापसी रोकने के लिए एनडीए को वोट देता है. बांकीपुर संकेत देता है कि मतदाताओं को एक विश्वसनीय तीसरा विकल्प मिले तो रणनीतिक समर्थन हासिल करना आसान हो सकता है.

तथ्य यह भी है कि भाजपा ने अपनी पूरी सियासी मशीनरी लगा दी थी. सीएम चौधरी, कई कैबिनेट मंत्री, स्वयं नवीन और भोजपुरी अभिनेता-नेता मनोज तिवारी तथा पवन ‌‌सिंह जैसे स्टार प्रचारकों समेत करीब 200 नेताओं ने यहां जीत के लिए ताकत झोंक दी थी. फिर भी पार्टी सीट नहीं बचा सकी. इसलिए यह थ्योरी और भी अहम हो जाती है.

पीके के लिए जीत आसान न थी. भाजपा ने उनका अभियान पटरी से उतारने के लिए अपने सारे कस-बल झोंक दिए थे. जेएसपी प्रमुख के नामांकन दाखिल करने के कुछ ही दिनों बाद, भाजपा ने 15 जुलाई को पिछले विधानसभा चुनाव में पटना जिले से मैदान में उतरे उनकी पार्टी के तीन उम्मीदवारों और कई अन्य पार्टी पदाधिकारियों को शामिल करने में तेजी दिखाई.

जानबूझकर यह समय चुना गया था, ताकि यह धारणा बनाई जा सके कि किशोर की नई-नवेली पार्टी बिखर रही है और नेता उनका साथ छोड़ रहे हैं. मगर वह कदम बहुत सार्थक साबित नहीं हुआ.

किशोर के लिए जीत के कई गहरे मायने हैं. करीब दो वर्षों से आलोचक उनकी पार्टी को खारिज कर रहे थे. 2025 के विधानसभा चुनाव में एक साल पुरानी जेएसपी—जिसे उन्होंने राज्य में हजारों किलोमीटर पैदल यात्रा कर बड़ी मेहनत से बनाया था—एक भी सीट जीतने में नाकाम रही. पार्टी को 3.4 फीसद वोट मिले; उसके 238 उम्मीदवारों में से सिर्फ दो अपनी जमानत बचा पाए.

कई लोगों को सोचने में आया कि उनकी सियासी अपील सिर्फ टीवी स्टुडियो और वॉर रूम तक ही तो सीमित नहीं थी! बांकीपुर ने संदेह करने वालों को करारा जवाब दे दिया है.

(बाएं से क्रमशः) चुनाव प्रचार के दौरान सीएम सम्राट चौधरी, उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन

किशोर की जीत के कई कारण रहे. उनमें पहला तो विश्वसनीयता ही है. फिजूल के वादे करने के बजाए, उन्होंने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, जवाबदेही और गंभीरता के वादे पर प्रचार किया. वह संदेश पारंपरिक राजनैतिक बयानबाजी से थके शहरी मतदाताओं के बीच जगह बनाने में कारगर रहा. फिर उन्होंने लक्ष्य बनाकर अभियान चलाया और घर-घर जाकर संपर्क साधा. बाद में पीके ने खुद ही टिप्पणी की, “भाजपा का 30 साल पुराना किला सिर्फ 30 दिनों में ढह गया.”

नतीजों के बाद, पीके ने घोषणा भी की, “यह चुनाव बांकीपुर के नालों और गलियों को लेकर नहीं लड़ा जा रहा. यह इस बारे में है कि बिहार का नेतृत्व किसे करना चाहिए. अगर भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में एक और कुशवाहा (सीएम चौधरी की जाति) चाहती है, तो ठीक है...लेकिन वह कोई ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए.” दरअसल, जेएसपी प्रमुख ने इस चुनाव को सीएम चौधरी के खिलाफ जनमत संग्रह ही बना दिया था. उनका तर्क है कि नतीजा भाजपा नेतृत्व के लिए अपना तरीका सुधारने का एक मैसेज है.

अभियान के समय ने भी पीके के पक्ष में काम किया. देशभर में जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों की लहर स्थापित सियासी ढांचे के प्रति बढ़ती अधीरता को दर्शाती है. चुनाव में इसका कितना असर रहा, यह कहना मुश्किल है मगर जो जनभावना उभरी, उसने कहीं न कहीं जन सुराज की मदद ही की, खासकर युवा शहरी मतदाताओं का रुख निर्णायक बना.

इस बीच, भाजपा ने अपनी मुश्किलें खुद बढ़ा लीं. उसका अभियान शुरू होने से पहले ही लड़खड़ा गया. पार्टी ने पहले राज्य के भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के उपाध्यक्ष अभिषेक कुमार को उम्मीदवार बनाया मगर उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए नाम फौरन वापस ले लिया. फिर एक और भाजयुमो नेता नीरज कुमार सिन्हा आए, जिनके लिए सांगठनिक साख के बावजूद किशोर के कद और संचार कौशल की बराबरी करना आसान नहीं रहा.

असामान्य रूप से 34.3 फीसद के बेहद कम मतदान—हाल के चुनावी इतिहास में बांकीपुर में सबसे कम—ने भी नतीजों में अहम भूमिका निभाई. उपचुनावों में अक्सर सबसे बड़े गठबंधन नहीं, उन दलों की जीत होती है, जिसके मतदाता सबसे ज्यादा उत्साहित होते हैं. जन सुराज पार्टी अपने समर्थकों को ऊर्जावान बनाने में सफल रही, जबकि भाजपा के पारंपरिक शहरी मतदाताओं का कुछ हिस्सा या तो घर पर रहा या फिर चुपचाप उसने अपना पाला बदल लिया.

एक तीसरा विकल्प

करीब एक दशक से बिहार की सियासत एनडीए बनाम राजद की अगुआई वाले गठबंधन के इर्द-गिर्द घूमती रही है. बांकीपुर ने इसे पहली बार एक सार्थक चुनावी मुकाबले में चुनौती दी है. अगर भाजपा विरोधी मतदाताओं को यह विश्वास होने लगता है कि जन सुराज राजद को मजबूत किए बिना भगवा ताकतों को हरा सकती है, तो सियासी गणित बदलते देर नहीं लगेगी. उस संभावना की एक राह बांकीपुर ने खोल दी है.

फैसला राज्य कांग्रेस के भीतर एक पुरानी बहस फिर से शुरू कर सकता है. वर्षों से बिहार नेतृत्व के एक तबके ने निजी तौर पर सवाल उठाया है कि क्या कांग्रेस को स्थायी रूप से राजद के साथ बंधे रहना चाहिए और अपनी स्थिति को कमजोर मानकर ही बातचीत करनी चाहिए. किशोर की जीत इस तर्क को एक बार फिर हवा देती है. एक निर्वाचन क्षेत्र में राजद को हाशिए पर धकेलकर और भाजपा के लिए मुख्य चुनौती के तौर पर उभरकर पीके ने ऐसी चुनावी अपील दिखाई है, जिसे हासिल करने की कोशिश की मांग कांग्रेस के भीतर लंबे समय से उठती रही है.

पीके सभी मौकों का फायदा उठाने के लिए पूरी तरह तैयार दिखते हैं. 243 सीटों वाले सदन में एनडीए के 201 सदस्य हैं. ऐसे में पीके एनडीए विधायकों से भरी बिहार विधानसभा में प्रवेश कर रहे हैं. मगर बांकीपुर की अप्रत्याशित जीत ने उन्हें संख्याओं से कहीं अधिक मूल्यवान तोहफा दे दिया है, जो है एक राजनैतिक वैधता. जन सुराज अब केवल एक सियासी प्रयोग नहीं, यह जीत पीके को पार्टी संगठन को मजबूत करने, विश्वसनीय चेहरों को साथ लाने और विस्तार में गति देगी.

जेएसपी को भाजपा और राजद दोनों से अलग एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में स्थापित करने की उनकी रणनीति में बदलाव के आसार नहीं हैं. साथ ही, उन मतदाताओं और नेताओं को लुभाना भी इसमें शामिल है जो कभी जनता दल (यूनाइटेड) को बिहार की स्वाभाविक मध्यमार्गी ताकत के रूप में देखते थे.

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