गरिमापूर्ण मृत्यु के लिए ‌जिंदा वसीयत

बेमतलब का इलाज? मरीजों के पास इसको पहले ही मना कर देने का कानूनी तरीका है

अपनी लिविंग वसीयत रजिस्टर कराने वाले डॉ. निखिल दातार

एक लंबे समय तक वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट पर पड़ा कोई अपना, जिसके ठीक होने की उम्मीद न के बराबर हो...यह ऐसी स्थिति है जिसकी कल्पना मात्र से ही परिवार सिहर उठता है. एक व्यक्ति जो सलाह या पैसों की जरूरत होने पर दौड़ पड़ता, आज मृत्युशय्या पर चुपचाप कष्ट सह रहा होता है.

लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि महाराष्ट्र लिविंग विल के ऑनलाइन पंजीकरण, सत्यापन और इसे सुरक्षित रखने की सुविधा देने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है. इन दस्तावेजों को राज्य सरकार की ओर से शुरू किए गए एकीकृत नागरिक सेवा पोर्टल महायूएलबी पर पंजीकृत किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के एक फैसले में कहा था कि किसी गंभीर या लाइलाज बीमारी से जूझते व्यक्तियों को इलाज से इनकार करने का अधिकार है. कोर्ट ने लोगों को एक अग्रिम ‌जिंदा वसीयत बनाने की अनुमति दी थी. इसे वे उन परिस्थितियों में लागू करने के लिए तैयार कर सकते हैं, जब जीवन केवल कृत्रिम रूप से बचाए रखना ही संभव हो. इसमें सामान्य तौर पर दी जाने वाली सेवाएं शामिल हैं: वेंटिलेटर सपोर्ट, ट्यूब से भोजन देना, डायलिसिस, सर्जरी आदि.

अपनी लिविंग विल पंजीकृत कराने वाले शुरुआती लोगों में से मुंबई के एक स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. निखिल दातार वसीयत के डिजिटलीकरण की वकालत करते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर इन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सके. 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल के लिए प्रशासनिक ढांचा न होने के कारण 2023 में उन्हें बंबई हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करनी पड़ी थी. इसके नतीजतन महाराष्ट्र में लिविंग विल की व्यवस्था देखने और उसे लागू करने के लिए 417 कस्टोडियन नियुक्त किए गए.

मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से स्थायी रूप से कोमा में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा का लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी थी. इसी मामले का हवाला देते हुए डॉ. दातार बताते हैं कि आखिर लिविंग विल की आवश्यकता क्यों हैं. वे कहते हैं, “ऐसे कई बुजुर्ग हैं, जो इसी तरह का कष्ट सहते रहते हैं, उनके रिश्तेदार कहते हैं कि या तो इन्हें ठीक कर दो या मुक्त कर दो, लेकिन हम दोनों में से कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं.” इसमें हर कोई पीड़ित होता है—मरीज, रिश्तेदार, और यहां तक कि डॉक्टर भी.

मुंबई निवासी यशवंत काजरोलकर के बड़े भाई गोविंद लिविंग विल के समर्थक थे और मई में उनका निधन हो गया. काजरोलकर बताते है कि उन्होंने अपने भाई की शोक सभा में लिविंग विल की जरूरत के बारे में बात की. काजरोलकर ने 2023 में खुद अपनी लिविंग विल भी पंजीकृत कराई थी और उनका दावा है कि डॉ. दातार के बाद ऐसा करने वाले वे दूसरे व्यक्ति हैं. काजरोलकर कहते हैं कि उनके प्रयासों से कुछ अन्य लोगों ने भी अपनी लिविंग विल तैयार की है.

माहिम में रहने वाले 80 वर्षीय उदय कार्णिक ने अपनी 76 वर्षीया पत्नी अंजना की तरह ही लिविंग विल बनाई है. वे कहते हैं, “अस्पताल के खर्चे बहुत ज्यादा हैं और कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है कि मरीज ठीक होने की किसी संभावना के बिना लाइफ सपोर्ट पर होता है, और परिवार के पास पैसे खत्म हो रहे होते हैं.” कार्णिक ने ऐसी शर्तें रखी हैं जिनमें स्पष्ट किया गया है कि उन्हें वेंटिलेटर पर न रखा जाए, न ही डायलिसिस कराया जाए और न कीमोथेरेपी दी जाए.

वसीयत बनाने का जज्बा

विल-जिनी सक्सेशन सर्विसेज के संस्थापक और सीईओ जतिन पोपट का कहना है, अस्पताल में भर्ती होने और इलाज के भारी खर्च के जोखिम का सामना कर रहे लोगों के लिए लिविंग विल जरूरी है. उन्होंने कहा, “जब किसी मरीज को लाइफ सपोर्ट पर रखा जाता है, तो अस्पताल के बिल बहुत बढ़ सकते हैं, और परिवार भावनात्मक कारणों से इलाज रोकने का फैसला नहीं ले पाता.” सेवानिवृत्त लोग ही नहीं, कामकाजी पेशेवर भी लिविंग विल को चुन रहे हैं.

लॉ फर्म लीगालॉजिक कंसल्टिंग के सह-संस्थापक, अधिवक्ता विवेक साधाले का कहना है कि लिविंग विल में इलाज की प्राथमिकताओं के संबंध में स्पष्ट और विशिष्ट निर्देश होने चाहिए. इसमें एक ऐसे प्रतिनिधि को नियुक्त किया जाना चाहिए जो यह देखने के लिए जिम्मेदार होगा कि इच्छाओं का सम्मान किया जाए और उन्हें पूरा किया जाए.

इस पर दो गवाहों की मौजूदगी में वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर होने चाहिए, और इसे ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से या स्थानीय नगर निगम कार्यालय जाकर पंजीकरण के लिए जमा किया जा सकता है. इसे जमा करने के बाद, राज्य सरकार की ओर से नियुक्त कस्टोडियन के समक्ष भौतिक सत्यापन अनिवार्य है. गरिमा के साथ मरने के अधिकार के लिए इतना तो किया ही जा सकता है.

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