बस खत्म हनीमून?
मुख्यमंत्री सतीशन सबसे मोर्चा लेते हुए अपनी पार्टी के कई लोगों को भी नाराज कर रहे. उधर वाम मोर्चा खुद अपनी निराशा में डूबा हुआ

केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन
इस समय केरल मॉनसून की तबाही का सामना कर रहा है. 2017 से हर मॉनसून में यह संकट लौट आता है. मगर इस बीच राज्य के दोनों सियासी ध्रुव अपनी ही खड़ी की गई मुश्किलों से घिरे नजर आ रहे हैं.
कांग्रेसी मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने अपनी सियासी चतुराई से तमाम प्रतिद्वंद्वियों को मात देकर कुर्सी हासिल की थी. मगर अब लगता है कि कई मोर्चे एक साथ खोलकर वे अपने अच्छे दिनों का जल्दी ही अंत कर रहे हैं.
जनता के बीच उनकी प्यारी ‘पूकी सीएम’ वाली छवि के विपरीत फैसले लेने का सतीशन का टकराव और अपनी मर्जी से चलने वाला अंदाज उनके समर्थकों के एक हिस्से को भी उनसे दूर कर सकता है.
उधर, वाम के आखिरी गढ़ माने जाने वाले केरल में करारी हार के बाद जख्म सहला रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) दिशाहीन नजर आ रही है. पार्टी अब भी यह तलाशने में जुटी है कि लोगों के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं का भी भरोसा और समर्थन फिर से कैसे हासिल किया जाए.
दोनों पक्ष एक-दूसरे की मुश्किलों में ही थोड़ी राहत महसूस कर सकते हैं. वाम को यह देखकर संतुष्टि हो सकती है कि सतीशन की पार्टी के ही नेता उनकी “तानाशाही कार्यशैली” के खिलाफ बगावत पर उतर आए हैं. आखिर ऐसे आरोप क्यों लग रहे हैं? इसकी वजह उनकी छाप वाले कई विवादास्पद फैसले हैं. वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने अपनी पार्टी और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) से बिना सलाह-मशविरा लिए कम अल्कोहल वाले पेय पर उत्पाद शुल्क आधा कर दिया.
उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पहल ‘रेयर अर्थ ऐंड क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर’ के लिए 100 करोड़ रुपए का आवंटन भी किया. फिर, कानून मंत्री के रूप में उन्होंने राज्य इकाई या यूडीएफ से राय लिए बिना अपनी पसंद के लोगों को हाइकोर्ट में लोक अभियोजक और जिला अदालतों में सरकारी अधिवक्ता नियुक्त कर दिया. इतना ही नहीं, उनकी सूची में माकपा, भाकपा और भाजपा के प्रति निष्ठा रखने वाले कई लोगों के नाम भी शामिल थे.
दुर्लभ तत्वों की तपिश
कम अल्कोहल वाले पेयों पर उत्पाद शुल्क में कटौती ने शराब-विरोधी रुख रखने वालों को नाराज कर दिया है. इनमें कांग्रेस की प्रदेश इकाई के पूर्व अध्यक्ष वी.एम. सुधीरन सरीखे लोग शामिल हैं. उनका मानना है कि यह फैसला पार्टी के घोषणापत्र के विपरीत है. वहीं, रेयर अर्थ कॉरिडोर की आलोचना केवल कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ही नहीं कर रहे, जो तटीय अलप्पुझा से सांसद हैं. लैटिन कैथोलिक चर्च और मछुआरा समुदाय का कहना है कि वे केरल के तट पर दुर्लभ मृदा तत्वों की खनन गतिविधियां नहीं होने देंगे.
मगर मुख्यमंत्री ने परियोजना पर फिर से विचार करने की उनकी मांग खारिज कर दी है. उधर, कांग्रेस के छात्र संगठन केरल स्टुडेंट यूनियन (केएसयू) का नेतृत्व भी नाराज है. उसका कहना है कि अहम कानूनी पद ‘सियासी’ दुश्मनों को सौपें जा रहे हैं, जबकि पार्टी से जुड़े कई वकील हाशिए पर हैं.
केएसयू अध्यक्ष डॉ. अलोशियस जेवियर ने खुलकर मोर्चा खोल दिया. मगर मुख्यमंत्री अपने फैसले पर अड़े रहे. उनका कहना था कि नियुक्तियों की सूची योग्यता पर आधारित है और उसे महाधिवक्ता के साथ विचार-विमर्श तथा राज्य कांग्रेस के लॉयर्स विंग की सिफारिश के आधार पर तैयार किया गया है. मगर लॉयर्स विंग ने तुरंत उनके दावे का खंडन करते हुए कहा कि उनमें से कई लोगों के नाम उनकी सिफारिश सूची में थे ही नहीं. मुख्यमंत्री का जवाब भी आक्रामक और दोटूक था.
उन्होंने कहा, “लोक अभियोजकों या सरकारी वकीलों की नियुक्ति में केएसयू की कोई भूमिका नहीं. यह उनका काम नहीं है.” जब जेवियर ने मुख्यमंत्री से मिलने का वक्त मांगा तो उन्होंने इनकार कर दिया. 17 जुलाई को एक कार्यक्रम में केएसयू अध्यक्ष कॉलेज के पूर्व छात्रों की भीड़ में मुख्यमंत्री से मिलने का इंतजार कर रहे थे, तब भी सतीशन उन्हें नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गए.
मुख्यमंत्री को केरल की धर्मनिरपेक्ष राजनीति में शायद सबसे तीखा तंज उस वक्त झेलना पड़ा, जब कांग्रेस के प्रवक्ता वी.आर. अनूप ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि “मुख्यमंत्री ने शॉर्ट नोटिस पर ही हिंदू यूनाइटेड फोरम के नेताओं से अपने कार्यालय में मिलने का समय निकाल लिया.”
आलोचनाओं का सिलसिला और गहरा हो गया, जब महाधिवक्ता ने हाइकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर उन याचिकाओं का समर्थन किया जिनमें केरल वक्फ बोर्ड को गैर-मुस्लिम को शामिल नहीं करने के कारण ‘अवैध’ बताया गया था.
उन याचिकाओं में भाजपा की याचिका भी शामिल थी. उसी आधार पर 15 जुलाई को हाइकोर्ट ने वक्फ बोर्ड की गतिविधियों पर रोक लगा दी. इससे इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) बेहद नाराज है, जिसके समर्थन ने सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. अन्य मुस्लिम संगठनों में भी नाराजगी है.
किसने खोला भगवा द्वार?
दिलचस्प बात यह कि भाजपा के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप माकपा पर भी लगा है और वह भी उसकी अपनी केंद्रीय समिति की ओर से. समिति ने 11 से 13 जुलाई को दिल्ली में पार्टी की हार की समीक्षा की. उसकी रिपोर्ट में अधिकांश बातें अपेक्षित थीं. उसमें उम्मीदवारों के चयन में गलतियां, पूरे अभियान को पिनाराई विजयन के इर्द-गिर्द केंद्रित कर देने और ‘एलडीएफ के अलावा कौन’ सरीखे आत्ममुग्ध चुनावी नारे को हार की प्रमुख वजहों में गिनाया गया.
मगर, माकपा के वोट शेयर के “40 वर्षों में सबसे निचले स्तर” पर पहुंच जाने का कारण पार्टी ने अल्पसंख्यकों की नाराजगी को माना और समिति ने एक हैरान करने वाली घटना का जिक्र किया. वह यह कि 20 सितंबर 2025 को पंपा में आयोजित ग्लोबल अयप्पा मीट में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संदेश उस समय के एक मंत्री और राज्य सचिवालय के सदस्य ने पढ़कर सुनाया था.
समिति की रिपोर्ट में कहा गया, “वह पार्टी की धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए बड़ी शर्मिंदगी का कारण बनी. उस कदम से जनता के बीच गलत संदेश गया और धारणा बनी कि हम हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतों के प्रति नरम रुख अपना रहे हैं.” वह धारणा और मजबूत हुई जब प्रभावशाली एझावा समुदाय के संगठन एसएनडीपी के नेता वेल्लापल्ली नटेसन के मुस्लिम विरोधी बयानों का राज्य नेतृत्व ने असरदार ढंग से जवाब नहीं दिया.
समिति के दखल को काडरों का भरोसा फिर से हासिल करने की कोशिश माना जा रहा है. मगर केंद्रीय नेतृत्व लंबे समय तक केरल के पार्टी मामलों में मूकदर्शक बना नजर आया. उसने तीन दशकों तक विजयन को पूरी छूट दे रखी थी. वह तब तक संतुष्ट रहा जब तक केरल इकाई पार्टी के खर्चों का बोझ उठाती रही.
पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. सेबस्टियन पॉल कहते हैं, “यह महज डैमेज कंट्रोल की कवायद है और इससे शायद माकपा केरल में अपनी पुरानी साख फिर से हासिल नहीं कर पाएगी. उन्हें अपनी उम्मीदें अब कांग्रेस की गलतियों पर टिकानी होंगी.” उसके लिए राहत की बात है कि कांग्रेस की गलतियों का सिलसिला फिलहाल थमता नहीं दिख रहा.