जेन-ज़ी ने दिया जीवन
उद्धव ठाकरे जब अपनी पार्टी में मची भगदड़ के कारण करिअर के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे थे, तभी सीजेपी के आंदोलन ने पूरे सियासी नैरेटिव को बदलकर रख दिया. क्या वे इसका फायदा उठा पाएंगे?

मुंबई में 26 जून को हुए छात्रों के प्रदर्शन में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे शामिल हुए
महाराष्ट्र के सियासी परिदृश्य में अचानक दिलचस्प बदलाव दिख रहा है. बीते महीने भर की कुछ घटनाओं ने माहौल को गरमा दिया है. भले ऊपरी तौर पर कुछ बदलता न दिखे मगर भीतर ही भीतर अप्रत्याशित मोड़ आ रहे हैं. महाराष्ट्र के चार प्रमुख नेताओं में से कोई भी इससे अछूता नहीं रहा.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के दिल्ली जाने की संभावनाओं पर अचानक चर्चा तेज हो गई है. उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सियासी महत्वाकांक्षा इसी पर निर्भर करती है. इसमें 80 वर्ष की उम्र पार कर चुके शरद पवार की सत्ता पक्ष के खेमे में आने की इच्छा एक बड़ा फैक्टर थी.
मगर आखिरी वक्त में जेन-ज़ी ने इस समीकरण को बदलकर रख दिया. यह मोड़ ऐसे वक्त आया, जिससे संकट में घिरे उद्धव ठाकरे को मानो नई जिंदगी मिल गई है.
छब्बीस जुलाई को जब शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख मुंबई के शिवाजी पार्क में हजारों उत्साहित युवाओं के सामने मंच पर खड़े हुए, उस वक्त वे अपने सियासी करिअर के सबसे बुरे दौर से उबरने की कोशिश कर रहे थे. 2022 में उनसे मुख्यमंत्री पद एक तगड़े झटके के साथ छिन गया, जब मूल शिवसेना के तत्कालीन 19 लोकसभा सांसदों में से 12 शिंदे की बगावत में शामिल हो गए थे.
अगले वर्ष, शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न भी उनके हाथ से फिसल गया, जो अब तक उनके परिवार की पहचान था. उन पर फिर संकट के बादल मंडराए. गत जून में एक और फूट के कारण उनकी पार्टी के बचे-खुचे नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने पाला बदल लिया. अब हर कोई उनके सियासी अंत की कयासबाजी करने लगा था. ऐसा लगा कि ब्रांड ठाकरे का खेल एकदम खत्म हो चुका है.
मगर महीने भर बाद वे अपने चचेरे भाई राज के साथ एकदम विजयी अंदाज में यहां मौजूद थे. यह पारिवारिक एकजुटता थी जो महाराष्ट्र की कड़वी राजनीति के दौर में भी बची रह गई है. मंच पर उनके बेटे आदित्य और अमित भी मौजूद थे—दोनों ही जेन-ज़ी उम्र वाली दहलीज पार कर चुके हैं, और आदित्य सड़क के मुद्दों को उठाने में काफी माहिर हो गए हैं. सियासी मोड़ ऐसे रहे कि राज्य के सभी विपक्षी नेताओं में सिर्फ उद्धव ही ऐसे हैं जो बहुत कम विवादों और साफ-सुथरी छवि के साथ सही पाले में खड़े नजर आते हैं.
राष्ट्रीय मीडिया ने शायद इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया कि बोस्टन से लौटकर आए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके खुद एक मराठी हैं और पूर्ववर्ती औरंगाबाद के एक मध्यमवर्गीय दलित परिवार से ताल्लुक रखते हैं. इसलिए इस क्षेत्र में सीजेपी की ताजा सफलता का असर काफी गहरा है. जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के दौरान दीपके के परिवार ने बहुत तनाव झेला, उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिलीं, और सरकारी कार्रवाई तथा गिरफ्तारी के डर से कुछ समय के लिए उन्हें अपना घर छोड़कर कोंकण में शरण लेनी पड़ी. मगर तभी हवा का रुख बदलने लगा.
दीपके की मुहर
उन्नीस जुलाई को दीपके ने मराठी में एक इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि छह जून को भारत लौटने पर उद्धव ही पहले नेता थे जिन्होंने उनको फोन किया. उन्होंने कहा कि पूरे विरोध-प्रदर्शन के दौरान उद्धव ने उनसे एक पिता की तरह लगातार संपर्क बनाए रखा. पवार की बेटी और एनसीपी (एससीपी) की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले भी समर्थन देने दो बार जंतर-मंतर गईं.
मगर इस बीच उनकी पार्टी इस असमंजस से भी जूझ रही थी कि एनडीए में शामिल हों या नहीं. हाल के हफ्तों में सुले समर्थन के संकेत देने और उससे इनकार करने के बीच झूलती दिखीं. 27 जुलाई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाकात के बाद अटकलें फिर तेज हो गईं.
इसके उलट, जब सीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर नैतिक जीत मिली, तो उद्धव उसका हिस्सा बनने की स्थिति में थे. यूबीटी के एक वरिष्ठ नेता ने इंडिया टुडे से कहा, “राजनीति में एक महीना बहुत लंबा वक्त होता है. जो भाजपा अजेय लग रही थी, अब बैकफुट पर है. मुंबई में उमड़ी भीड़ में हमारे कार्यकर्ताओं की भी हिस्सेदारी थी. इस मौके का फायदा अब आदित्य जैसे युवा पीढ़ी के नेताओं पर निर्भर है.”
मगर अब जब उद्धव को ऊर्जा का एक नया स्रोत मिल गया है, तो क्या वे इसे अपने साथ बनाए रख पाएंगे? 22 जून को शिंदे ने मुस्कुराते हुए एक कड़वी सचाई सामने रखी थी, जब उन्होंने ऐलान किया कि “ऑपरेशन टाइगर सफल रहा.”
लोकसभा में टूट ने पार्टी में भगदड़ मचा दी थी, 30 जून को आदित्य के एक करीबी सहयोगी ने भी पार्टी छोड़ दी थी. यूबीटी के 20 विधायकों का समूह अब भी संशय की स्थिति में बना हुआ है. क्या अब उनके पास इस भगदड़ को रोकने की समझ और रणनीति है?