ई20 में नया मोड़: चावल की भी हेराफेरी

ई20 चावल-एथेनॉल की कड़ी में एक नया घोटाला सामने आया. ईंधन बनाने के लिए भेजे गए टूटे चावल फिर से पीडीएस में पहुंचा दिए जा रहे हैं

बाइक में E20 पेट्रोल भरवाता शख्स (फाइल फोटो)

हाल के दिनों में एथेनॉल लगातार सुर्खियों में बना हुआ था. ई20 मिश्रण के लिए चावल को वैकल्पिक कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल को लेकर पहले से विवाद चल रहा है. मगर मध्य प्रदेश में इससे जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है.

यहां एथेनॉल उत्पादन के लिए डिस्टिलरियों को भेजा गया चावल कथित तौर पर वापस सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में खपाया जा रहा था. बालाघाट पुलिस ने ऐसे घोटाले का खुलासा किया है, जिसमें डिस्टिलरी संचालकों, राइस मिल मालिकों और संभवतः कुछ सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत सामने आई है. इससे जुड़े लोगों ने मोटा मुनाफा कमाया.

इसकी परतें खुलनी शुरू हुईं, जब बालाघाट जिले के वारासिवनी कस्बे के संचेती राइस मिल से चावल से लदे तीन ट्रक जब्त किए गए. वह चावल छिंदवाड़ा के एवीजे एग्रिको नामक एथेनॉल निर्माण कंपनी को भेजा जाना था.

वह खेप भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) की ओर से विशेष रूप से एथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित चावल का हिस्सा थी. मगर उसकी बजाए उसे एक राइस मिल में भेज किया गया, जहां से उसे दोबारा पीडीएस में खपाने की तैयारी की जा रही थी.

मुनाफे का खेल
दरअसल, एफसीआइ ने उस खेप के चावल को रियायती दर 23,200 रुपए प्रति टन पर जारी किया था. मध्य प्रदेश में लगभग 22 एथेनॉल संयंत्र हैं जिन्हें सरकारी एजेंसियों से कच्चा माल मिलता है. नियमों के अनुसार, एफसीआइ को इन संयंत्रों को खराब गुणवत्ता वाला चावल देना होता है.

मगर इस मामले में एफसीआइ ने अच्छे चावल दिए. एथेनॉल संयंत्र ने उस चावल को एक राइस मिल को भेज दिया. राइस मिल ने उसे नए कस्टम-मिल्ड चावल के रूप में दिखाकर दोबारा एफसीआइ को बेच दिया. उधर, उस राइस मिल को पीडीएस चावल तैयार करने की खातिर अलग से धान आवंटित किया गया था. उसने उसे खुले बाजार में, संभवतः निर्यात बाजार में भी बेच दिया गया.

स्थानीय मीडिया और पुलिस इसे करीब “एक हजार करोड़ रुपए” का घोटाला बता रही है. एफसीआइ ने माना कि ऐसी हेराफेरी होती है मगर इतने बड़े घोटाले से इनकार किया है. उसका कहना है कि अब तक जब्त चावल की कीमत महज 5.5 लाख रुपए है.

बालाघाट के पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्र ने केस की जांच के लिए 25 सदस्यीय विशेष जांच दल बनाया है. इस घोटाले की कड़ियां कई जिलों से जुड़ी हैं और जांच का दायरा महाराष्ट्र तक पहुंच सकता है. अब तक चार लोगों की गिरफ्तारी हुई है, 13 लोगों पर धोखाधड़ी का केस दर्ज हुआ और चावल लदे 17 ट्रक भी जब्त हुए हैं.

एफसीआइ का कहना है कि 2024-25 के दौरान उसने डिस्टिलरियों को 22,500 रुपए प्रति टन की दर से 2.98 लाख टन चावल दिए थे. वहीं 2025-26 में 30 जून तक 22,300 रुपए प्रति टन की दर से 2.41 लाख टन चावल की सप्लाइ की गई. एफसीआइ के अनुसार, स्थानीय मीडिया ने 5.39 लाख टन चावल की सप्लाइ को उसके कुल मूल्य से गुणा करके 1,160 करोड़ रुपए के घोटाले का दावा कर दिया, जो तथ्यात्मक रूप से गलत है.

वैसे, उसने माना कि उसके निरीक्षण दल ने 24.25 टन चावल की हेराफेरी का पता लगाया था, जिसकी कीमत 5.63 लाख रुपए थी; संबंधित डिस्टिलरी के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई गई, जमा की हुई उसकी जमानत राशि जब्त कर ली गई और राज्य के खाद्य विभाग ने उस राइस मिल पर 44.12 लाख रुपए का जुर्माना लगाया.

मगर एक अहम कड़ी अभी साफ नहीं हुई हैः एक निश्चित मात्रा में चावल और उससे होने वाले उत्पादन को दो अलग-अलग जगहों पर एक साथ दर्ज नहीं किया जा सकता. यह भी कि डिस्टिलरी उस चावल से बनने वाले एथेनॉल के उत्पादन में आई कमी का हिसाब कैसे देती है, जबकि उसे उसी आवंटित चावल से एथेनॉल बनाना था?

सूत्रों के मुताबिक, डिस्टिलरी मालिक को उसके अनुपात में निर्धारित मात्रा में एथेनॉल पेट्रोलियम कंपनी को आपूर्ति करना होता है और इसके लिए प्रमाणपत्र भी जारी करना पड़ता है. जाहिर है, कुछ सवालों के जवाब अभी मिलने हैं.

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