बिना चेतावनी, बस पानी

पड़ोसी राज्य नगालैंड में तेज बारिश से अचानक आई बाढ़ ने असम में इस कदर तबाही बरपाई कि आम तौर पर सुरक्षित माने जाने वाले राज्य के ऊपरी जिले भी डूब गए

जोरहाट जिले में बाढ़ का 22 जुलाई को लिया गया चित्र

- प्रियंका सहरिया

असम के शिवसागर जिले में नाजिरा कस्बे से कोई 12 किमी दूर नेपालीखुटी गांव में सन्नाटा पसरा है. सैकड़ों परिवार हफ्ते भर से भी ज्यादा वक्त से तिरपाल के नीचे रह रहे हैं. उनके घर कीचड़ में दबे हैं, हवा में मरे हुए मवेशियों की दुर्गंध है, और सड़कें बंद हैं.

नेपालीखुटी नगालैंड की सीमा से सटा असम का आखिरी गांव है. बाढ़ आने से पहले उसे कोई चेतावनी नहीं मिली. किसान विनोद शर्मा का कहना है कि 19 जुलाई को वे उफान पर बह रही डिखो नदी देखने गए थे, पर वह उतनी खतरनाक दिखाई नहीं दी. वे बताते हैं, “लेकिन बाढ़ का पानी अचानक आ गया. पानी का स्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि मुझे समझ ही नहीं आया कि क्या करूं.”

असम में बाढ़ हर साल आती है. राज्य ने ऐसे भी साल देखे जब बाढ़ से बड़ी तादाद में लोग मारे गए. इस साल की बाढ़ इलाकों और रफ्तार की वजह से अलग थी. शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी किनारे पर बसे हैं. यह जमीन ‘बाढ़ के सामान्य स्तर’ से ऊंची मानी जाती है.

ऊपरी असम के तीन पड़ोसी जिलों के 6,78,000 लोग, यानी राज्य में कुल प्रभावित लोगों के 94 फीसद से भी ज्यादा, 23 जुलाई को बाढ़ की चपेट में थे. 78 लोगों की मौत हो चुकी है और 40 का अब भी कोई अता-पता नहीं. पूरे असम में करीब 49,000 हेक्टेयर फसल भूमि पानी में डूबी थी, 88,000 से ज्यादा मवेशी प्रभावित थे और 26,500 से ज्यादा पशु मारे गए.

बाढ़ के अचानक आने की वजह असम से बाहर थी. असम कृषि विश्वविद्यालय के कृषि-मौसम विभाग के प्रमुख राजीव लोचन डेका कहते हैं, “यह अचानक बाढ़ 18-20 जुलाई को नगालैंड के मोन, वोखा, लाँलेंग और मोकोकचुंग जिलों में बहुत ज्यादा बारिश होने की वजह से आई. इससे निचले इलाकों की तरफ पानी का तेज बहाव शिवसागर, जोरहाट और चराइदेव में आ घुसा.” असम में भी भारी बारिश हो रही थी.

चराइदेव जिले के सोनारी कस्बे में अकेले 18 जुलाई की रात 190 मिमी बारिश हुई. जलभराव के क्षेत्र मॉनसून से पहले की बारिश से पूरी तरह भीग चुके थे और हालत यह थी कि वे पानी सोखने के बजाए छोड़ रहे थे. डेका बाढ़ की स्थिति बदतर होने की कुछ और वजहें भी बताते हैं. वे हैं जंगलों की कटाई, प्राकृतिक वेटलैंड या तरभूमि का खत्म होना और सड़कों का निर्माण.

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने सारा दोष बहुत ज्यादा बारिश पर मढ़ा. मोकोकचुंग में सामान्य से 493 फीसद और चराइदेव में सामान्य से 436 फीसद बारिश हुई. इसने उफान पर बह रही ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों के पानी को बाहर निकलने से रोक दिया. असम के कृषि, सिंचाई और संसदीय कार्य मंत्री पीयूष हजारिका ने 23 जुलाई को विधानसभा में कहा कि यह पूर्वी असम की 60 बरसों की भीषणतम बाढ़ थी.

नहीं सीखे सबक
क्या यह विनाश रोका जा सकता था? आइआइटी रुड़की में एडजंक्ट प्रोफेसर और नदी इंजीनियर नयन शर्मा को लगता है कि इतने बड़े पैमाने पर तबाही से शायद बचा जा सकता था. उनका कहना है कि बाढ़ का पहले से अनुमान न लगाकर चेतावनी जारी न कर पाना मुख्य नाकामी थी.

देश की उपग्रह व्यवस्थाएं मौसम की ऐसी प्रणालियों का पता अब घंटों और कभी-कभी दिनों पहले लगा सकती हैं. लेकिन असम का पूर्व चेतावनी नेटवर्क इतनी अच्छी तरह जुड़ा नहीं था कि इन जानकारियों का इस्तेमाल कर पाता.

शर्मा कई उपाय सुझाते हैं: जियोसिंथेटिक और आर्टिकुलेटेड कंक्रीट ब्लॉक से तटबंधों को मजबूत करें, प्राकृतिक निचले बिंदुओं पर जलनिकासी के रास्ते बनाएं, और बहुत ज्यादा गाद से भरी भोगदोई नदी को साफ करें. उनकी सबसे जरूरी सिफारिश यह है: जल- विभाजक क्षेत्रों में 100 फीसद जंगल उगाएं.

ये सिफारिशें नई नहीं हैं. भाजपा 2016 में असम को बाढ़ मुक्त बनाने के वादे के साथ राज्य की सत्ता में आई थी. 1990 के दशक में ‘लिविंग विद फ्लड्स’ नाम की एक योजना लाई गई थी, पर बाद में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद वापस ले ली गई.

विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा बड़ी समस्या उस नजरिए में है जो बाढ़ के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करता है और सारे संसाधन केवल उन्हीं क्षेत्रों में झोंक देता है. इसकी वजह से कम जोखिम वाले माने गए जिले उस वक्त कतई तैयार नहीं होते जब उन्हें अचानक बड़ी बाढ़ का सामना करना पड़ता है. 

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